भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
पृष्ठ 952, कुल 1416 में से
संदर्भ में पढ़ें९२० | भैषज्यरत्नावली । | [ प्लीहा-यकृत्-
पहले दिन १० पीपल और दूसरे दिन २० इस क्रमसे दूधके साथ सेवन करताहुआ दस दिनतक दस दस पीपलोंकी मात्रा बढाकर सौतक करलेवे । फिर इसी प्रकार प्रतिदिन दसदस पीपल घटाता जावे । एवं पूर्वोक्त नियमानुसार दूसरीवार प्रतिदिन दस दस पीपलोंकी वृद्धि करे । इसतरह न्यूनाधिकता करते करते एक हजारकी संख्या तक पीपलोंको सेवन करे ॥ ३४ ॥ ३५ ॥
दशपैप्पलिकः श्रेष्ठो मध्यमः षट् प्रकीर्त्तितः ।
यस्त्रिपिप्पलिपर्थ्यन्तः प्रयोगः सोऽवरः स्मृतः ॥ ३६ ॥
बृंहणं वृष्यमायुष्यं प्लीहोदरविनाशनम् ।
वयसः स्थापनं मेध्यं पिप्पलीनां रसायनम् ॥
पञ्चपिप्पलिकं चापि दृश्यते वर्द्धमानकम् ॥ ३७ ॥
पीपल सेवन करनेकी विधि तीन प्रकारकी हैं । जैसे-प्रतिदिन १० पीपल सेवन करना उत्तम, प्रतिदिन छः पीपल सेवन करना मध्यम और प्रतिदिन तीन पीपल सेवन करना कनिष्ठ मात्राविधि है । यह प्रयोग रसायन, पुष्टिकारक, वीर्य्यवर्द्धक, आयुको स्थापन करनेवाला, मेधाजनक तथा प्लीहा और उदररोगको नष्ट करनेवाला है । किसी किसी आयुर्वेदिक ग्रंथोंमें प्रतिदिन पांच पांच पीपलोंको वृद्धिकरनेका नियम वर्णन किया है ॥ ३६ ॥ ३७ ॥
“ पिष्ठा च बलिभिः पेया शृता मध्यबलैर्नरैः ॥
शीतीकृत्य ह्रस्वबलैर्देहदोषामयान्विति ॥ ”
“ बलवान् रोगीको पीपलका चूर्ण, मध्यम अवस्थावाले रोगीको पीपलका क्वाथ और दुर्बल रोगीको पीपलका क्वाथ शीतल करके सेवन करावे । ”
इसपर औषधिके जीर्ण होनेपर सांठीके चावल, दूध और घृतके साथ भक्षण करे । इसप्रकार वर्णन कियेहुए पीपलके प्रयोगको सेवन करनेकी प्रथा वर्त्तमानकालमें नहीं है, इसलिये एक रत्तीसे लेकर दो, तीन, चार, पाँच अथवा छःरत्ती परिमाणतक प्रतिदिन बढाकर दसदिनतक बढावे । फिर इसी क्रमसे घटाताजावे । इस तरह सेवन करनेसे अभीष्ट सिद्धि प्राप्त होती है ॥
गुडपिप्पली ।
तुलैकं गुडमादाय पिप्पलीं च तथैव च ।
हिङ्गु त्रिकटुकं मानं सैन्धवानां द्विकार्षिकम् ॥ ३८ ॥
चित्रकं च विडं चैव द्वौ क्षारौ शिखरी तथा ।