भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ९१९
अजाजी त्र्यूषणं हिङ्गु यमानी पौष्करं शठी ॥
एतैरर्द्धपलैर्भागैश्चूर्णं कृत्वा प्रदापयेत् ॥ ३० ॥
फरहदकी छाल, ढाककी छाल, आक, थूहर, चिरचिटा, चीतेकी जड, वरनाकी छाल, अरणी, बकवृक्षकी छाल, गोखुरू, कटाई, कटेरी, दुर्गन्धकरञ्ज, आस्फोटलता ( कोरल इति महाराष्ट्रभाषा ), कुडेकी छाल, कडवी तोरई और पुनर्नवा इन सबको पञ्चाङ्गसहित समान भाग लेकर ओखलीमें कूटलेवे । फिर एक हाँडीमें रख उसका मुँह बन्द करके तिलोंकी लकड़ियोंके द्वारा भस्म कर लेवे । जब शीतल होजाय तब उसमेंसे नितारकर १ प्रस्थ खारको ग्रहण कर एक द्रोण ( ३२ सेर ) जलमें सुदृढ और नवीन पात्रमें भरकर पकावे । पकते पकते जब चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर पूर्वोक्त क्षारपाककी विधिके अनुसार इस जलको पकावे और इसमें सैंधानमक एक प्रस्थ, हरड ३२ तोले और गोमूत्र ८ सेर डालकर मन्द-मन्द अग्निद्वारा अच्छे प्रकारसे पकावे । जब पाक यथाविधि पककर तैयार होजाय तब उतार लेवे और भाफ उठतेहुए पाकमें कालाजीरा, त्रिकुटा, हींग, अजवायन, पोहकरमूल तथा कचूर इनके दो दो तोले चूर्णको खूब बारीक पीसकर मिलादेवे ॥
अभयालवणं नाम भक्षयेच्च यथाबलम् ॥ ३१ ॥
व्याधिं संवीक्ष्य मतिमाननुपानं यथाहितम् ।
ये च कोष्ठगता रोगास्तान्निहन्ति न संशयः ॥ ३२ ॥
यकृत्प्लीहोदरानाहगुल्माष्ठीलाग्निमान्द्यजित् ।
हन्याच्छिरोऽर्त्तिं हृद्रोगं शर्कराश्मरिनाशनम् ॥ ३३ ॥
रोगीके बलानुसार इस अभयालवणको भक्षण कराना चाहिये । एवं बुद्धिमान् वैद्य रोगको भलीभाँति विचारकर हितप्रद अनुपानकी कल्पना करे । यह अभयालवण कोष्ठस्थित रोगों तथा यकृत्, प्लीहा, उदररोग, आनाह, गुल्म, अष्ठीला, मन्दाग्नि, वमन, शिरोरोग, हृदयरोग, शर्करायुक्त प्रमेह और अश्मरीप्रभृति रोगोंको निस्सन्देह नष्ट करता है ॥ ३१-३३ ॥
वर्द्धमानपिप्पली ।
क्रमवृद्ध्या दशाहानि दशपिप्पलकं दिनम् ।
वर्द्धयेत्पयसा सार्द्धं तथैवापनयेत्पुनः ॥ ३४ ॥
जीर्णेऽजीर्णे च भुञ्जीत षष्टिकं क्षीरसर्पिषा ।
पिप्पलीनां सहस्रस्य प्रयोगोऽयं रसायनः ॥ ३५ ॥