भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा । | गदाधरटीकासहिता । | ९२३
शूलरोग, खाँसी, श्वास, सूजन प्लीहोदर एवं सर्व प्रकारके रोगोंको शीघ्र नष्ट करता है । इसका नाम प्लीहान्तक रस है ॥ ५१ ॥
वासुकीभूषणरस ।
सूतेन वङ्गं तु समं नियोज्य तत्तुल्यशुल्बेन च गन्धकेन ।
विमर्द्दयेदर्कदलेन यामं मृदा च संलिप्य पुटं ददीत ॥ ५२ ॥
वासारसैरस्तं परिभावयेच्च रसो भवेद्वासुकिभूषणोऽयम् ।
प्लीह्रश्च गुल्मस्य च शान्तयेऽस्य वल्लं प्रदद्याद्रुसुचूर्णयुक्तम् ॥५३॥
शुद्ध पारा, वङ्गभस्म, ताम्रभस्म और शुद्ध गन्धक इन द्रव्योंको समान भाग लेकर आकके पत्तोंके रसमें एक प्रहरतक यथाविधि खरल करे । फिर गोलासा बनाकर मूषायन्त्रमें रखे और मृत्तिकासे लेपकर पुटपाक करे । जब शीतल होजाय तब निकालकर अडूसेके रसमें भावना देवे । इस प्रकार यह वासुकिभूषण नामवाला रस तैयार होता है । प्लीहा और गुल्मरोगको निवारण करनेके लिये इस रसकी दो रत्ती मात्राको सेंधेनमकमें मिलाकर सेवन करावे ॥ ५२ ॥ ५३ ॥
विद्याधररस ।
गन्धकं तालकं ताप्यं मृतं ताम्रं मनःशिला ।
शुद्धसूतं च तुल्यांशं मर्द्दयेद्भावयेद्दिनम् ॥ ५४ ॥
पिप्पल्याश्च कषायेण वज्रीक्षीरेण भावयेत् ।
वल्लं च भक्षयेत्क्षौद्रैर्गुल्मप्लीहादिकं जयेत् ॥
रसो विद्याधरो नाम गोदुग्धं च पिबेदनु ॥ ५५ ॥
शुद्ध गन्धक, हरिताल, सोनामाखी, ताँबेकी भस्म, मैनसिल, और शुद्ध पारा ये सब औषधियाँ बराबर बराबर लेकर एकत्र खरल करे । फिर पीपलके क्वाथ और थूहरके दूधमें अलग अलग एक एक दिन भावना देवे । इस रसको दो रत्ती प्रमाण शहदके साथ मिलाकर भक्षण करे तो इससे गुल्म प्लीहा आदि दूर होते हैं। इसका नाम विद्याधर रस है। इसके सेवन करनेपर गोदुग्ध पान करे ॥ ५४॥५५ ॥
लोकनाथरस १-२ ।
पारदं गन्धकं चैव समभागं विमर्द्दयेत् ।
मृताभ्रं रसतुल्यं च पुनस्तत्रैव मर्दयेत् ॥ ५६ ॥
रसत्रिगुणलौहं च लौहतुल्यं च ताम्रकम् ।
वराटिकाया भस्माथ पारदत्रिगुणं कुरु ॥ ५७ ॥