भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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पृष्ठ 966
९३४भैषज्यरत्नावली ।[ प्लीहा-यकृत्-

कहत! हूँ। इस लिये यह रस हर किसीको नहीं देवे, सदैव गुप्त रखे। शंखद्राव-नामवाला यह रस वैद्योंको अत्यन्त उपकारक है ॥ १२०-२५ ॥

शंखद्रावक।

अर्कः स्नुही तथा चिञ्चा तिलारग्वधचित्रकम् ।
अपामार्गभस्म समं वस्त्रपूतं जलं हरेत् ॥ २६ ॥
मृद्वग्निना पचेत्तत्तु यावल्लवणतां गतम् ।
लवणेन समौ ग्राह्यौ द्वौ क्षारौ टङ्कणं तथा ॥ २७ ॥
समुद्रफेनं गोदन्तं कासीसं सोरका तथा ।
द्विगुणं पञ्चलवणं मातुलुङ्गरसेन च ॥ २८ ॥
काचकुप्यां तु सप्ताहं वासयेदम्लयोगतः ।
शङ्खचूर्णपलं दत्त्वा वारुणीयन्त्रमुद्धरेत् ॥ २९ ॥
सर्वधातून् हरेच्छीघ्रं वराटीशङ्खकादिकान् ।
रोगानामुदरादीनां सद्यो नाशकरः परः ॥ १३० ॥

आक, थूहर और इमलीकी छाल, तिल, अमलतास, चीतेकी जड और चिरचिटा सबकी भस्मको समान भाग लेकर जलमें घोललेवे । फिर वस्त्रमें छानकर जलको ग्रहण करे । पश्चात् इस जलको मन्द मन्द अग्निद्वारा पकावे । जब पकते पकते खारीपन आजाय तब जवाखार, सज्जी, सुहागा, समुद्रफेन, गोदन्ती, हरिताल, कसीस और सोरा ये सब समान भाग और पञ्च लवण सबसे दुगुने लेकर एकत्र कूट पीसकर काँचकी शीशीमें भरदेवे और ऊपरसे बिजौरे नींबूका रस डालदेवे । इस प्रकार खट्टे रसको मिश्रित करके एक सप्ताह तक रखा रहनेदेवे । फिर उसमें ४ तोले शंखका चूर्ण डालकर वारुणीयन्त्रके द्वारा अर्क खींचे । यह रस धातुगत सर्वदोष तथा उदरादि रोगोंको तत्काल नष्ट करता है और यह द्राव, शंख अथवा कौडी, सीपी आदिको शीघ्र द्रवीभूत करता है ॥ १२६-१३० ॥

महाशंखद्रावक ।

चिञ्चाऽश्वत्थः स्नुही ह्यर्कोऽपामार्गश्च हि पञ्चमः ।
पृथग् भस्मजलं कृत्वा तूद्धृत्य लवणानि च ॥ ३१ ॥
टङ्कणं च यवक्षारं सर्ज्जं लवणपञ्चकम् ।
रामठं तालकं चैव लवङ्गं नरसारकः ॥ ३२ ॥