भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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चिकित्सा ] भाषार्टीकासहिता । ९३३

रसः शङ्खद्रवो नाम शम्भुदेवेन भाषितः ।
गुह्याद् गुह्यतमं गुह्यमिदानीं कथ्यते मया ॥ १९ ॥

इसको बनानेसे प्रथम योगिनी और भैरवोंको बलिदान देवे पश्चात् यन्त्र बनावे, ऐसा महारानी पार्वती ने कहा है । यह शंखद्रावरस शिवजी महाराजका प्रकट किया हुआ है । यह रस गोप्य वस्तुओंमें भी अत्यन्त गोप्य है, अतः इसको गुप्त रखना चाहिये । अब मैं इस गुप्त रसका वर्णन करता हूँ ॥ १८ ॥ १९ ॥

शङ्खचूर्णं यवक्षारं सर्जिकाक्षारटङ्कणम् ।
समं च पञ्चलवणं स्फटिकारिर्निशादलः ॥ २० ॥
काचकुप्यां ततः क्षिप्त्वा वारुणीयन्त्रमुद्धरेत् ।
यामार्द्धे द्रावयत्येव शङ्खशुक्तिवराटिकाः ॥ २१ ॥
अर्शोसि नाशयेत्षट् च मूत्रकृच्छ्राश्मरीस्तथा ।
उदराष्टविधं हन्ति गुल्मप्लीहोदराणि च ॥ २२ ॥
अजीर्णं नाशयेच्छीघ्रं ग्रहणीं च विषूचिकाम् ।
भुक्तशेषे च भोक्तव्यो माषमात्रो रसोत्तमः ॥ २३ ॥
क्षणमात्राद्भवेद्भस्म पुनर्भोजनमिच्छति ।
प्रत्यहं भोजनान्ते च संसेव्योऽयं रसोत्तमः ॥ २४ ॥
न रुजायां भयं क्वापि सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ।
न देयं यस्य कस्यापि सदा गोप्यं च कारयेत् ॥
रसः शङ्खद्रवो नाम वैद्यानामुपकारकः ॥ २५ ॥

शंखका चूर्ण, जवाखार, सज्जी, सुहागा, पाँचों नमक, फटकरी और नौसादर इन सबोंको समान भाग लेवे । फिर एकत्र कूट पीसकर इस चूर्णको काँचकी शीशी में भरकर वारुणीयन्त्रमें द्रवीभूत करे । यह—शंख, सीपी और कौडीको आधे प्रहरमें ही गलादेता है । इसको भोजनके पश्चात् एक मासा प्रमाण सेवन करे तो तत्क्षण भोजन भस्म होजाता है और फिर भोजन करनेकी इच्छा उत्पन्न होती है । इससे छः प्रकारके अर्श, मूत्रकृच्छ्र, पथरी, ८ प्रकारके उदररोग, गुल्म, प्लीहोदर अजीर्ण, संग्रहणी और विषूचिका आदि रोग बहुत जल्द नष्ट होते हैं । इस उत्तम रसायनको प्रतिदिन प्रातःकाल और भोजनके पश्चात् सेवन करे । इसको सेवन करनेवाले मनुष्यको फिर कभी रोग आक्रमण नहीं करते, मैं बिल्कुल सत्य