भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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पृष्ठ 964

९३२ भैषज्यरत्नावलीं । [ प्लीहा-यकृत्-

रसेन बहुपुत्राया द्विगुणक्षीरसंयुतम् । लौहमय्या पचेद् दर्व्या पात्रे चायसि मृन्मये ॥ १३ ॥ अभ्रकं निहितं शुद्धं पारदं च सुमूर्च्छितम् । अयसोऽर्द्धमितं चूर्णमादौ पाके विनिक्षिपेत् ॥ १४ ॥ लोहा एक तोला, अभ्रकभस्म आधा तोला, शुद्ध रससिन्दूर अभ्रकसे आधा भाग और लोहेके चूर्ण तथा अभ्रकसे तिगुना त्रिफला लेवे। इन सबको एकत्र कर १६ गुने जलमें पकावे। पकते पकते जब अष्टम भाग रहजाय तब उतारकर छान लेवे। फिर इस क्वाथके साथ समान भाग गौका घी, शतावरका रस घीके बराबर और रससे दुगुना दूध मिलाकर विधिपूर्वक लोहेके या मिट्टीके पात्रमें करके मन्दमन्द अग्निसे पाक करे और लोहेकी करछीसे चलाता जाय ॥

कन्दं कपालिकां चव्यं विडङ्गं सबृहद्दलम् । शरपुङ्खा च पाठा च चित्रकं समहौषधम् ॥ १५ ॥ लवणानि च सर्वाणि सक्षारं वृद्धदारकम् । दीप्यकं च तथा स्नूहीं लौहाभ्रकसमां क्षिपेत् ॥ १६ ॥ फिर इसमें जिमीकन्द, कपालिका (कन्दविशेष), चव्य, बायविडङ्ग, लोध, शरफोंका, पाठ, चीता, सोंठ, पाँचों नमक, जवाखार, बिधारा, अजवायन और थूहकी जड इन सब औषधियोंको अलग अलग लोहे और अभ्रककी बराबर लेकर एकत्र मर्दन करके उपर्युक्त पाकमें डालकर उत्तम प्रकारसे पाक करे ॥ १५॥१६ ॥

प्लीहोदरयकृद्गुल्मान् हन्ति शस्त्राग्निभिर्विना । प्रयोज्योऽयं महावीर्यो लौहो लौहविदां वरैः ॥ प्लीहोदरविनाशाय दद्याद् द्वे द्वे पुटे पृथक् ॥ १७ ॥ इस प्रकार सिद्ध किया हुआ यह यकृत्प्लीहोदरहरनामक लोह सर्व प्रकारकी प्लीहा, उदररोग, यकृतरोग और गुल्मादिरोगोंको बिना शस्त्र व अग्निके नष्ट करता है। यह प्रयोग अत्यन्त वीर्यवान् और सर्व लोहोंमें उत्तम लोह है। इसमें औषधि सिद्ध होनेपर दो बार पुटपाक करलेवे तो प्लीहा और उदरविकार अवश्य शमन होते हैं ॥ १७ ॥

शङ्खद्रावरस ।

योगिनीभैरवाभ्यां च बलिमादौ प्रदापयेत् । पश्चाद्यन्त्रं प्रकर्त्तव्यमाहैवं परमेश्वरी ॥ १८ ॥