भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ९३१

सम्पूज्य भास्करं विष्णुं गणनाथं द्विजोत्तमम् ।
माषमात्रं च मधुना कृत्वा शीतलजलं पिबेत् ॥ १०७ ॥

शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक और अभ्रकभस्म प्रत्येक चार चार तोले, ताम्रभस्म १२ तोले, सोनामाखी २ तोले एवं जमालघोटा, चीता, मानकन्द, जिमीकन्द, घंटाकर्णक ( क्षुद्रक्षुपविशेष ), पीपलामूल, त्रिफला, त्रिकुटा, निसौत, चिरचिटा, श्वेतदण्डोत्पल, बिछूटीवृक्षकी जड, हडसंकरी, हाथीसुँडा और हुलहुल ये प्रत्येक दो दो तोले लेकर एकत्र चूर्ण करलेवे । प्रथम इस चूर्णको अदरखके रसमें अच्छे प्रकार खरल करले पश्चात् इसमें १२ तोले लोहेकी भस्म डालकर फिर खरल करे । तद्नन्तर प्रतिदिन प्रातःकाल पवित्र होकर गणेश, सूर्य और विष्णुभगवान्‌को पूजकर तथा ब्राह्मणों को प्रसन्नकर इस लोहकी एक मासाप्रमाण मात्राको शहदमें मिलाकर सेवन करे और ऊपरसे शीतल जल पान करे ॥ १०३–१०७ ॥

चूर्णं सर्वेश्वरं नाम सर्वरोगहरं पिबेत् ।
कठोरप्लीहनाशाय गुल्मोदरहरं तथा ॥ १०८ ॥
कामलां पाण्डुमानाहं यकृत्कृमिकृतामयान् ।
विचर्चामम्लपित्तं च कण्डूं कुष्ठं विनाशयेत् ॥ १०९ ॥
प्लीहानमस्रपित्तं चाप्यग्निमान्द्यं सुदुस्तरम् ।
श्रीकरं कान्तिजननं शुक्रायुर्बलवर्द्धनम् ११० ॥

यह सर्वेश्वरनामक लोह सर्वप्रकारके रोग, कठिनतर तिल्ली, गुल्म, उदरविकार, कामला, पाण्डु, आनाह, यकृत, कृमिरोग, विचर्चिका, अम्लपित्त, खुजली, कुष्ठ, प्लीहा, रक्तपित्त और दुस्तर मन्दाग्नि आदि व्याधियोंको नष्ट करनेवाला तथा शोभावर्द्धक, कान्त्युत्पादक, बल, वीर्य और आयुकी उन्नति करनेवाला है ॥ १०८–११० ॥

यकृत्प्लीहोदरहरलौह ।

लौहार्द्धमभ्रकं शुद्धं सूतमप्यर्द्धभागिकम् ।
त्रिगुणामयसश्चूर्णात् त्रिफलामभ्रकात्तथा ॥ ११ ॥
द्विरष्टं वारिणो भागमवशिष्टं तु कारयेत् ।
तेन चाष्टावशिष्टेन समेनाज्येन यत्नतः ॥ १२ ॥