भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ९१७
विड्सौवर्चलक्षारपिप्पल्यश्चापि कार्षिकाः ।
एतच्चूर्णीकृतं सर्वं गोमूत्रस्याढके पचेत् ॥ १६ ॥
सान्द्रीभूते गुडीः कुर्याद्दत्त्वा त्रिपलमाक्षिकम् ।
यकृत्प्लीहोदरहरो गुल्मार्शोग्रहणीहरः ॥
योगः परिकरो नाम्ना ह्यग्निसन्दीपनःपरः ॥ १७ ॥
मानकन्द, चिरचिरेकी जडकी भस्म, गिलोय, अडूसेकी छाल, शालपर्णी, सेंधानमक, चीता, सोंठ और ताडके फूलोंका खार ये प्रत्येक तीन तीन तोले, विडनमक, कालानमक, जवाखार और पीपल ये प्रत्येक औषधि एकएक तोला लेवे । सबको एकत्र चूर्ण करके ८ सेरगोमूत्रमें पकावे । पकते २ जब गाढा होजाय तब उतारलेवे और शितल होजानेपर १२ तोले शहद डालकर गोलियाँ बनालेवे । यह गुटिका यकृत प्लीहा, उदररोग गुल्म, अर्श और संग्रहणी आदि रोगोंको नाश करती है एवं अग्निको दीपन करती है ॥ १५-१७ ॥
वह्निमानादिगुडिका ।
मानमार्गस्थिरावह्निस्नुहीनागरसैन्धवम् ।
तालरण्डं कृमिघ्नं च हबुषं चविका वचा ॥ १८ ॥
विड्सौवर्चलक्षारपिप्पलीशरपुङ्खकम् ।
जीरकं पारिभद्रं च प्रत्येकं कषकद्वयम् ॥ १९ ॥
सार्द्धाढके गवां मूत्रे पचेत्सर्वं सुचूर्णितम् ।
सान्द्रीभूते क्षिपेदेषां चूर्णकं कर्षसंमितम् ॥ २० ॥
अजाजी त्र्यूषणं हिङ्गु यमानी पुष्करं शठी ।
त्रिवृद्दन्ती विशाला च दत्त्वा त्रिपलमाक्षिकम् ॥
खादेदग्निबलापेक्षी बुद्ध्वा चानु पिबेन्नरः ॥ २१ ॥
पुराना मानकन्द, चिरचिरा, शालपर्णी, चीता, थूहरकी जड, सोंठ, सेंधानमक, ताडकी जटाओंकी भस्म, वायविडङ्ग, हाऊबेर, चव्य, वच, विडनमक, कालानमक, जवाखार, पीपल, शरफोंका, जीरा और फग्हद इन औषधियोंके दो दो कर्ष बारीक पिंसेहुए चूर्णको डेढ आढक गोमूत्रम पकावे । पकते २ जब गाढा पडजाय तब निम्नलिखित औषधियोंके उत्तम प्रकारसे पीसे हुए एक एक कर्ष पारमाण चूर्णकों डालदेवे । कालाजीरा, सोंठ, मिरच, पीपल, हींग, अजवायन, पोहकरमूल, कंचूर,