भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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चिकित्सा०] भाषाटीकासहिता । ९२९

लोहभस्म दो कर्ष, अभ्रकभस्म दो तोले, ताँबेकी भस्म एक कर्ष, विहारी नींवूकी जडकी छाल ४ तोले और मृगछालाकी भस्म ४ तोले इन सबको एकत्र जलमें खरल करके नौ नौ रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे ॥ ९० ॥ ९१ ॥

यकृत्प्लीहोदरं चैव कामलां च हलीमकम् ।
कासं श्वासं ज्वरं हन्ति बलवर्णाग्निवर्द्धनम् ॥ ९२ ॥
यकृद्दरिनाम लौहं सर्वव्याधिनिषूदनम् ॥ ९२ ॥

यह यकृद्दरिनामक लौह यकृत, प्लीहा और उदरके रोग, एवं कामला, हलीमक, खाँसी, श्वास, ज्वर तथा अन्य सर्वप्रकारकी दुस्तर व्याधियोंको नष्ट करनेवाला और बल, वर्ण एवं जठराग्निको बढानेवाला है ॥ ९२ ॥

महामृत्युञ्जयलौह ।

शुद्धं सूतं समं गन्धं जारिताभ्रं समं तथा ।
गन्धस्य द्विगुणं लौहं मृतताम्रं चतुर्गुणम् ॥ ९३ ॥
द्विक्षारं सैन्धवविडं वराटीशंखभस्मकम् ।
चित्रकं कुनटी तालं रामठं कटुकं तथा ॥ ९४ ॥
रोहीतं त्रिवृता चिञ्चा विशाली धवलाङ्कठः ।
अपामार्गं तालरण्डमम्लिका च निशाद्वयम् ॥ ९५ ॥
प्रियंग्विन्द्रयवं पथ्या चाजमोदा यमानिका ।
तुत्थकं शरपुङ्खा च यकृन्मर्दो रसाञ्जनम् ॥ ९६ ॥
प्रत्येकं शाणमानेन भावयेदार्द्रकै रसैः ।
गुडूच्याः स्वरसेनापि मधुनः कुडवार्द्धकम् ॥ ९७ ॥
वटिकां कारयेद्वैद्यो गुञ्जाष्टप्रमितां पुनः ॥ ९८ ॥

शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक और अभ्रकभस्म ये प्रत्येक औषधि एकएक भाग, लोहभस्म दो भाग, ताम्रभस्म ४ भाग एवं जवाखार, सज्जी, सेंधानमक, बिडनमक कौडीकी भस्म, शंखकी भस्म, चीता, मैनासिल, हरिताल, हींग, कुटकी, रोहिडावृक्षकी छाल, निसोत, इमलीकी भस्म, इन्द्रायनकी जड, सफेद ढेरा वृक्षकी छाल, चिरचिटेका खार, ताडकी जडका खार, अमलवेत, हल्दी, दारुहल्दी, फूलप्रियंगु, इन्द्रजौ, हरड, अजमोद, अजवायन, तूतिया, शरफोंका, रोहेडेकी छाल और रसौंत ये प्रत्येक चार चार माशे लेवे । फिर सबको एकत्र चूर्ण करके अदरख और गिलो-

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