भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ९३७
१-जवाखार २ भाग और फटकरी ३ भाग इन दोनोंको एकत्र बछियाके मूत्रमें पीसकर धूपमें सुखालेवे । फिर इस कल्कको कपरोटी कियेहुए शीशेके बर्त्तनमें भर-देवे और ऊपरसे दूसरा शीशेका ढकना ढककर दोनोंके मुखको मिलाकर सन्धिस्या-नोंको अच्छे प्रकार बन्द करदेवे । पश्चात् नीचेके सीसेमें एक छिद्र करदेवे, फिर एक गढा खोदकर उसमें एक स्वच्छ पात्रको रक्खे । उस पात्रके ऊपर उक्त दोनों शीशेके पात्रोंको स्थापन करे और ऊपरसे आग जलादेवे । तदनन्तर जब अग्निके सन्तापसे सीसेके पात्रके द्रव्य पिघलकर नीचेके पात्रमें चले जायँ तब उस रसको निकालकर चिकने बासनमें भरकर रखदेवे ॥ ४५-४८ ॥
लवङ्गेन सह खादेदथवा मृतताम्रकैः ।
प्लीहादिस्थूलरोगेषु दापयेद्रक्तिकां भिषक् ॥
दूरीकरोति रोगं च महाद्रावकसंज्ञकः ॥ ४९ ॥
श्वित्रे च दद्रुरोगे च प्रलेपं द्रावकस्य च ।
वह्निवज्ज्वलनं तस्य दधि दत्त्वा प्रलेपयेत् ॥ ५० ॥
इस रसकी प्रतिदिन प्रातःकाल एक रत्ती मात्राको लौङ्गके चूर्ण अथवा ताँबेकी भस्मके साथ सेवन करे तो इससे प्लीहा, स्थूलतादि दारुण रोग अल्पकालमेंही द्रव अर्थात् गलकर नष्ट होजाते हैं । यह रस अत्यन्त कठिनतम रोगोंको द्रवीभूत करता है । इसलिये इसको महाद्रावक कहते हैं । यदि लेप करनेपर जलन मालूम हो तो पहले दही मललेवे बादमें इसको लगावे ॥ ४९ ॥ ५० ॥
वृषश्चित्रमपामार्गश्चिञ्चा कूष्माण्डनाडिका ।
स्नुही तालस्य पुष्पं च वर्षाभूवैतसं तथा ॥ ५१ ॥
एतेषां क्षारमाहृत्य निम्पाकस्वरसेन च ।
क्षालयित्वा क्षारतोयं वस्त्रपूतं च कारयेत् ॥ ५२ ॥
चण्डातापेन संशोष्य ग्राह्यं तल्लवणोचितम् ।
एतस्य द्विपलं ग्राह्यं यवक्षारपलद्वयम् ॥ ५३ ॥
स्फटिकारिपलं चैव नवसारपलं तथा ।
पलार्द्धं सैन्धवं ग्राह्यं टङ्कणं तोलकद्वयम् ॥ ५४ ॥
कासीसं तोलकं चैव मुद्रारशंखं च तोलकम् ।
दारुमोचं कर्षकं च तोलं सामुद्रफेनकम् ॥ ५५ ॥