भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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पृष्ठ 970

९३८ भैषज्यरत्नावली । [ प्लीहा-यकृत-


सर्वमेकत्र सञ्चूर्णय बकयन्त्रेण साधयेत् ।
महाद्रावकमेतद्धि योज्यं च रसजारणे ॥ ५६ ॥
हन्ति गुल्मादिकाञ्रोगान् यकृत्प्लीहोदराणि च ॥ ५७ ॥

२-अड़ूसा, चीतेकी जड, चिरचिटा, इमली, पेठेकी डण्डी, थूहर, ताडके फूल, पुनर्नवा और बेंत इन सबकी भस्मको बराबर २ भाग लेकर जम्बीरीनींबूके रसमें घोलकर कपडेमें छानकर क्षारयुक्त जलको ग्रहण करे। फिर इस जलको तीक्ष्ण धूपमें सुखाकर इसके ८ तोले खारको लेवे। एवं जवाखार ८ तोले, फटकरी ४ तोले, नौसादर ४ तोले, सेंधानमक २ तोले, सुहागेकी खिलें २ तोले, कसीस १ तोला, मुद्राशंख, ( अरघा ) १ तोला, दारुमोच विष १ कर्ष और समुद्रफेन १ तोला लेवे। सबको एकत्र चूर्ण करके बकयन्त्रद्वारा चुवाकर अर्क ग्रहण करे। इस महाद्रावकको रसादिके जारणमें प्रयोग करे। यह गुल्म, यकृत, प्लीहा और उदरप्रभृति सम्पूर्ण विकारोंको नष्ट करता है ॥ १५१-५७ ॥

शुद्धं कांचनमाक्षिकं मृदुतरं कांस्याभिधं तत्तथा
सिन्धूत्थं विमलं रसाञ्जनवरं फेनः स्रवन्तीपतेः ।
क्षारौ सर्जिकसाम्भलौ सुविमलौ भागास्त्वमीषां समाः
सप्तानां सदृशं तु टङ्कणमिहाष्ट्र्यार्द्धों नृसारः सितः ॥५८॥
तत्तुल्या स्फटिकारिका त्रिसदृशः शुक्ला यवस्याग्रजः
कासीसत्रितयं यवाग्रजसमं सञ्चूर्ण्य सर्वं न्यसेत् ।
पात्रे काचमये मृदम्बरवृते यन्त्रे बकाख्ये भिषक्
ज्वालेन क्रमवर्द्धितान्यवहितोऽमीषां रसं पातयेत् ॥ ५९ ॥

३-शुद्ध सोनामाखी, कांस्यमाखी, सेंधानमक, रसौंत, समुद्रफेन, सज्जी और साँभरखार इन सातोंको समान भाग और सबके बराबर भाग सुहागा एवं सुहागेसे आधा भाग नौसादर और इतनीही फिटकिरी लेवे। फिर शुभ्रवर्णका जवाखार पूर्वोक्त तीनों वस्तुओंके समान, तीनों कसीस जवाखारके चूर्णके समान भाग लेवे। फिर सबोंको एकत्र अच्छे प्रकार कूटपीसकर चूर्ण बनालेवे। इस चूर्णको कपडमिट्टी की हुई काँचकी शीशीमें भरकर बकयन्त्रमें स्थापन करके अग्निके सन्तापसे द्रावकों निकाले अर्थात् उक्त औषधोंका अर्क खोंचे ॥ ५८ ॥ ५९ ॥

यो द्राग्भस्म वराटिकां प्रकुरुते सोऽयं महाद्रावकः
को वक्तुं प्रभवेदमूष्य नितरां सम्यग्गुणान्भूतले ।

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