भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ९४४ | भैषज्यरत्नावली । | [ शोथ- |
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आमजनित शोथमें लंघन और पाचन क्रिया करे । किन्तु दोषोंकी अधिकता होनेपर संशोधकद्रव्य प्रयोग करे । शिरोगतशोथमें नस्य प्रदान करे, शरीरके अधोभागस्थित शोथमें विरेचन और ऊर्ध्वभागस्थित शोथमें वमनक्रिया करे । तेल और घृतादि स्नेहद्रव्योंके सेवन करनेसे उत्पन्नहुए शोथमें रूक्षक्रिया करे । एवं रूक्षक्रिया द्वारा उत्पन्न शोथमें स्निग्ध क्रिया प्रयोग करे ॥ ३ ॥
दशमूलं सदा शस्तं वातशोथे विशेषतः ।
वातजे तैलमेरण्डं विड्ग्रहे पयसा पिबेत् ॥ ४ ॥
वातजशोथमें दशमूलका काढा पीवे । विशेषकर उक्त रोगमें मलबद्धता होनेपर अण्डीके तेलको दूधमें डालकर पीवे ॥ ४ ॥
गोमूत्रस्य प्रयोगो वा शीघ्रं श्वयथुनाशनः ।
यवागुर्मानकन्दस्य प्रायशश्चातिशोथजित् ॥ ५ ॥
गोमूत्रको सूजनवाले स्थानपर मलनेसे अथवा पान करनेसे सूजन तत्काल दूर होती है एवं पुराने मानकन्दकी यवागू सेवन करनेसे अत्यन्त प्रवृद्ध सूजन दूर होती है ॥ ५ ॥
बिल्वपत्ररसं पातुं सोषणं श्वयथौ त्रिजे ।
विट्संगे चैव दुर्नाम्नि विदध्यात्कामलासु च ॥ ६ ॥
बेलपत्रोंके रसमें मिरचोंका चूर्ण डालकर पान करे तो त्रिदोषजन्य सूजन, कोष्ठबद्धता, बवासीर और कामलारोग नष्ट होते हैं ॥ ६ ॥
भूनिम्बविश्वकल्कं जग्ध्वा पेयःपुनर्नवाक्वाथः ।
अपहरति नियतमाशु शोथं सर्वाङ्गिकं नृणाम् ॥ ७ ॥
चिरायता और सोंठ इनके कल्कको भक्षण कर ऊपरसे पुनर्नवेका क्वाथ पान करे । इससे सर्वशरीरगत शोथ शीघ्र दूर होता है ॥ ७ ॥
शोथनुत्कोकिलाक्षस्य भस्म मूत्रेण वाऽम्भसा ।
तालमखानेकी भस्मको, कफजन्य शोथमें गोमूत्रके साथ एवं पैत्तिक शोथमें जल के साथ पान करनेसे शोथरोग नष्ट होता है ॥
स्थलपद्ममयं कल्कं पयसाऽऽलोड्य पाययेत् ।
प्लीहामयहरं चैव सर्वाङ्गेकाङ्गशोथजित् ॥ ८ ॥
स्थलकमल अथवा पुराने मानकन्दके कल्कको दूधमें मिलाकर पान करानेसे प्लीहारोग, सर्वाङ्गगत शोथ और एकाङ्गगत शोथ दूर होता है ॥ ८ ॥