भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १४३
चूर्णयित्वा पलांशेन ततो भाण्डे निधापयेत् ।
मासादूर्ध्वं च पिबतां सर्वोदररुजां जयेत् ॥ ८४ ॥
प्लीहगुल्मोदराष्ठीलाग्रहण्र्यशांसि कामलाम् ।
कुष्ठशोथारुचिहरो रोहीतारिष्टसंज्ञकः ॥ १८५ ॥
रोहेडा वृक्षकी १०० पल छालको लेकर चार द्रोण (१२८ सेर) जलमें पकावे । पकते पकते जब चौथाई भाग अर्थात् ३२ सेर जल शेष रहजाय तब उतार-कर छानलेवे । फिर शीतल होजानेपर इस क्वाथमें गुड २०० पल, धायके फूल १६ पल, एवं पीपल, पीपलामूल, चव्य, चीता, सोंठ, दारचीनी, इलायची, तेज-पात, हरड, बहेडा और आमला इन सब औषधियोंको चार चार तोले लेकर बारीक चूर्ण करके डालदेवे । पुनः इन सब द्रव्योंको एक उत्तम एवं नवीन पात्रमें भरदेवे और उस पात्रका मुख बन्द करके गाड देवे । इसको एक महीनेके बाद निकालकर उचित मात्रासे सेवन करे तो यह अरिष्ट उदरके सब रोग, तिल्ली, गुल्मो-दर, अष्ठीला, संग्रहणी, बवासीर, कामला, कोढ, सूजन, और अरुचिप्रभृति रोगों-को दूर करता है । इसका नाम रोहीतका है ॥ उदररोगके समानही प्लीहा, यकृ-द्रोगका पथ्य वा अपथ्य जानना ॥ ८२-१८५ ॥
इति भैषज्यरत्नावल्यां प्लीह-यकृच्चिकित्सा ।
शोथकी चिकित्सा ।
लङ्घनं पाचनं शोथे शिरःकायविरेचनम् ।
वमनं च यथासन्नं यथादोषं प्रकल्पयेत् ॥ १ ॥
स्नेहोऽथ वातिके शोथे बद्धविट्के निरूहणम् ।
पयो घृतं पैत्तिके तु कफजे रूक्षणः क्रमः ॥ २ ॥
शोथरोगमें प्रथम लंघन, पाचन, नस्य, विरेचन और वमनादि क्रियाओंका वात पित्तादि दोषोंका बलाबल विचारकर प्रयोग करे । जैसे वातोत्पन्न शोथमें स्निग्ध-क्रिया, मलबद्ध रोगमें निरूहणवस्ति, पित्तजन्य शोथमें दूध और घृतपान एवं कफ-जनित शोथरोगमें रूक्षकर्म प्रयोग करने चाहिये ॥ १ ॥ २ ॥
अथामजं लंघनपाचनक्रमैर्विशोधनैरूल्बणदोषमादितः ।
शिरोगतं शीर्षविरेचनैरधो विरेचनैरूर्ध्वहरैस्तथोर्ध्वकम् ॥
उपाचरेत्स्नेहभवं विरूक्षणैः प्रकल्पयेत्स्नेहविधिं च रूक्षिते ३