भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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५४२ भैषज्यरत्नावली । [ प्लीहा-यकृत-


विडङ्गं चित्रकं चैव हबुषा चविका वचा ॥ एभिर्घृतं विपक्वं तु स्थापयेद्भाजने शुभे ॥ ७७ ॥ पाययेत्त्रिपलां मात्रां व्याधिं बलमवेक्ष्य च । रसकेनाथयूषेण पयसा वापि भोजयेत् ॥ ७८ ॥

रोहेडेकी छाल १०० पल, बडीबेरीकी छाल ४ सेर इन दोनोंको कुचलकर ३२ सेर जलमें पकावे। जब चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे। फिर इसमें गोघृत ६४ तोले, बकरीका दूध २५६ तोले, कल्कके लिये त्रिकुटा, त्रिफला, हींग, अजवायन, धनियाँ, विडनमक, कालाजीरा, कालानमक, अनार देव-दारु, पुनर्नवा, इन्द्रायण, जवाखार, पोहकरमूल, वायविडङ्ग, चीता, हाऊबेर, चव्य और वच इन औषधियोंको दो दो तोले लेकर एकत्र चूर्ण करके डालदेवे फिर यथाविधि घृतको सिद्ध कर उत्तम पात्रमें भरकर रखदेवे। इस घृतको १२ तोले मात्राको सेवन करनेका ऋषियोंने निर्देश किया है, किन्तु वातादि दोषोंकी उल्ब-णता और रोगीके बलाबलको विचारकर इसकी उपयुक्त मात्राको सेवन करावे और रसवाले यूष अथवा दूधके साथ भोजन करावे ॥ ७४-७८ ॥

उपयुक्ते घृते ह्यस्मिन् व्याधीन्हन्यादिमान्बहून् । यकृत्प्लीहोदरं चैव प्लीहशूलं यकृत्तथा ॥ ७९ ॥ कुक्षिशूलं च हृच्छूलं पार्श्वशूलमरोचकम् ॥ विवद्धशूलं शमयेत्पाण्डुरोगं सकामलम् ॥ १८० ॥ हृद्यतीसारशूलघ्नं तन्द्राज्वरविनाशनम् । महारोहितकं नाम प्लीहानं हन्ति दारुणम् ॥ ८१ ॥

नियमपूर्वक इसका सेवन करे तो यह महारोहीतक नामवाला घृत यकृद्विकार, प्लीहोदर, प्लीहाशूल, कुक्षिशूल, हृदयशूल, पार्श्वशूल, अरुचि, विबद्धशूल, पाण्डुरोग, कामला, हृदयरोग, अतीसार, शूल, तन्द्रा, ज्वर, विशेषकर दारुण प्लीहा और अन्यान्य सर्व प्रकारके रोगोंको शीघ्र नष्ट करता है ॥

रोहीतकारिष्ट ।

रोहीतकतुलामेकां चतुर्द्रोणे जले पचेत् । पादशेषे रसे पूते शीते पलशतद्वयम् ॥ ८२ ॥ दद्याद् गुडस्य धातक्याः पलषोडशिका मता । पञ्चकोलं त्रिजातं च त्रिफलां च विनिक्षिपेत् ॥ ८३ ॥