भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें९४६ भैषज्यरत्नावली । [ शोथ-
सोंठ, सफेद पुनर्नवा, अण्डकी जड, बेलकी छाल, शोनापाठा, कम्भारी, पाढर और अरणी इनका काढा बनाकर पीवे अथवा इन औषधियोंके अर्द्धभागावशिष्ट जलमें पेया आदि भोज्य पदार्थ सिद्ध कर भक्षण करनेसे वातज शोथ दूर होता है ॥ १४ ॥
पुनर्नवा-दशक ।
पुनर्नवा मागधजा कटुत्रयं निम्बाऽभया च कटुका च
पटोलदार्वा । क्वाथः सुखोष्णः कथितो विपाकैः शोथो
जहाति जठरं च नरस्य शीघ्रम् ॥ १५ ॥
पुनर्नवा, पीपल, त्रिकुटा, नीमछाल, हरड, कुटकी, परवल और दारुहल्दी इन औषधियोंके मन्दोष्ण क्वाथको पान करनेसे सूजन और उदररोग दूर होते हैं ॥ १५ ॥
पुनर्नवापुटस्वेद ।
पुनर्नवा निम्बपत्रं निष्पावपारिभद्रके ।
एतैश्च पुटसंस्वेदः शोथं हन्ति सुदारुणम् ॥ १६ ॥
अपामार्गः कोकिलाक्षो निर्गुण्डी विजया तथा ।
एतैरपि पुटस्वेदः शोथं हन्ति सुदारुणम् ॥ १७ ॥
पुनर्नवा, नीमके पत्ते, सेमके पत्ते और फरहदकी छाल इन सबको एकत्र कूटकर गरम करके पसीना देनेसे दारुण शोथ दूर होता है । एवं चिरचिटा, तालमखाना, सिह्माळु और भाँग इनको कुचलकर पोटलीमें बाँधले, फिर अग्निपर गरम करके स्वेदप्रदान करनेसे दुस्तर सूजन नष्ट होती है ॥ १६ ॥ १७ ॥
पुनर्नवादिचूर्ण ।
पुनर्नवा दार्वभया पाठा बिल्वं श्वदंष्ट्रिका ।
बृहत्यौ द्वे रजन्यौ द्वे पिप्पल्यौ चित्रकं वृषम् ॥ १८ ॥
समभागानि सञ्चूर्ण्य गवां मूत्रेण वा पिबेत् ।
बहुप्रकारं श्वयथुं सर्वगात्रविसारिणम् ॥
हन्ति शोथोदराण्यष्टौ व्रणांश्चैवोद्धतानपि ॥ १९ ॥
पुनर्नवा, देवदारु, हरड, पाठ, बेलकी जड, गोखुरू, कटाई, कटेरी, हल्दी, दारुहल्दी, पीपल, गजपीपल, चीता और अडूसा इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर एकत्र चूर्ण करके गोमूत्रके साथ पान करे तो यह चूर्ण सब शरीरमें फैलीहुई एवं अन्यान्य अनेक प्रकारकी सूजन, आठ प्रकारके उदररोग और अत्युत्कट व्रणोंको नष्ट करता है ॥ १८ ॥ १९ ॥