भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १४७
शोथारिचूर्ण ।
शुष्कमूलमपामार्गस्त्रिकटुस्त्रिफला तथा ।
दन्ती च त्रिमदं चैव प्रत्येकं च समं समम् ॥ २० ॥
भक्षयेत्प्रातरुत्थाय बिल्वपत्ररसेन च ।
पाण्डुरोगं निहन्त्याशु शोथं चैव सुदारुणम् ॥ २१ ॥
सूखी मूली, चिराचिटा, सोंठ, मिरच, पीपल, हरड, बहेडा, आमला, दन्तीकी जड, वायविडङ्ग, चीतेकी जड और नागरमोथा ये प्रत्येक औषधि समान भाग लेकर एकत्र चूर्ण करे। फिर प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर इस चूर्णको बेलपत्रीके रसमें मिलाकर सेवन करनेसे पाण्डुरोग, दुस्तर सूजन दूर होती है ॥ २० ॥ २१ ॥
पुनर्नवादिलेह ।
पुनर्नवामृतादारुदशमूलरसाढके ।
आर्द्रकस्वरसप्रस्थे गुडस्य च तुलां पचेत् ॥ २२ ॥
तत्सिद्धं व्योषपत्रैलात्वक्चव्यैः कार्षिकैः पृथक् ।
चूर्णीकृतैः क्षिपेच्छीते मधुनः कुडवं लिहेत् ॥ २३ ॥
पुनर्नवादिलेहोऽयं शोथशूलनिषूदनः ।
कासश्वासारुचिहरो बलवर्णाग्निवर्द्धनः ॥ २४ ॥
पुनर्नवा, गिलोय, देवदारु और दशमूलकी समस्त औषधियोंका रस क्वाथ ८ सेर, अदरखका स्वरस १ प्रस्थ और पुराना गुड १०० पल लेवे। सबोंको एकत्रकर यथा-नियम पाक करे । पकते २ जब गाढा पडजाय तब उसमें सोंठ, मिरच, पपिल, तेजपात, इलायची, दारचीनी और चव्य इन सबोंको दो दो तोले चूर्ण करके डालदेवे एवं शीतल होजानेपर १६ तोले शहद डालकर मिलादेवे । यह पुनर्नवाना-मक अवलेह सूजन, शूल, खाँसी, श्वास और अरुचिको हरता है तथा बल, वर्ण और जठराग्निको बढाता है ॥ २२-२४ ॥
त्रिनेत्राख्यरस ।
टङ्गणं शोधितं गन्धं मृतशुल्बायसं रसम् ।
दिनैकमार्द्रकद्रावैर्मर्द्य लघुपुटे पचेत् ॥ २५ ॥
त्रिनेत्राख्यो रसो नाम चासाध्यं श्वयथुं जयेत् ।
माषमात्रं पिबेच्चानु एरण्डशिखरीरसम् ॥ २६ ॥