भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२४८ भैषज्यरत्नावली । [ शोथ-
सुहागा, शुद्ध गन्धक, ताँबे और लोहेकी भस्म एवं पारा इन सबको समान भाग लेकर अदरखके रससे एक दिनतक उत्तम प्रकार खरल करे फिर लघुपुटमें रखकर पकावे । यह त्रिनेत्रारुख्यनामवाला रस असाध्य सूजनको भी दूर करता है । इसको प्रतिदिन एकएक माशा भक्षण करे और ऊपरसे अण्डकी जडका रस या क्वाथ अथवा चिरचिटेका रस पान करे ॥ २५ ॥ २६ ॥
त्रिकट्वाद्यलौह ।
त्रिकटु त्रिफला दन्ती विडङ्गं कटुका तथा ।
चित्रको देवकाष्ठं च त्रिवृद्धारणपिप्पली ॥ २७ ॥
चूर्णान्येतानि तुल्यानि द्विगुणं स्यादयोरजः ।
क्षीरेण पीतमेतच्च परं श्वयथुनाशनम् ॥ २८ ॥
सोंठ, मिरच, पीपल, हरड, बहेडा, आमला, दन्तीमूल, वायविडङ्ग, कुटकी, चीता, देवदारु, निसोत और गजपीपल इन औषधियोंके चूर्णोंको समान भाग, चूर्णसे दुगुना लोहचूर्ण लेवे । सबको एकत्र मिलाकर पीसलेवे । इसको तीन रत्ती प्रमाण लेकर दूधके साथ पान करनेसे अतिप्रबल सूजन शीघ्र दूर होय ॥ २७ ॥ २८ ॥
शोथारिलौह ।
अयोरजरुयूषणयावशूकचूर्णं च पीतं त्रिफलारसेन ।
शोथं निहन्यात्सहसा नरस्य यथाऽशनिर्वृक्षमुदग्रवेगः ॥ २९॥
लोहेका चूर्ण, सोंठ, मिरच, पीपल और जवाखार ये प्रत्येक औषधि समान भाग किन्तु लोहचूर्ण सब चूर्णके बराबर भाग लेकर एकत्र पीसलेवे । फिर इस चूर्णको ३ रत्ती प्रमाण लेकर त्रिफलेके रसके साथ पान करे तो अत्युग्र सूजन बहुत शीघ्र नष्ट होती है । जैसे अत्यन्त वेगवान् वज्रसे वृक्षोंका नाश होता है ॥ २९ ॥
शोथांकुशरस ।
रसेन्द्रगन्धं मृतलौहताम्रं नागं तथाऽभ्रं समसंख्यकं च ।
निर्गुण्डिकास्फोटकपित्थचिञ्चाः पुनर्नवाश्रीफलकेश-
राजम् ॥ ३० ॥ एषां रसैर्भावितमेकशश्च कोलप्रमाणा
वटिका विधेया । शोथज्वरारोचकपाण्डुरोगं सर्वाङ्ग-
शोथं विनिवारयेच्च ॥ पित्तान्वितान्वातभवान्कफो-
त्थान्शोथाङ्कुशो नाम निहन्ति रोगान् ॥ ३१ ॥
शुद्ध पारा, गन्धक, लोहभस्म, ताम्रभस्म, सीसाभस्म और अभ्रकभस्म ये सब समान भाग लेवे । फिर सर्वोंको एकत्रितकर सिह्माल्ल, लाल आकके वृक्ष,