भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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९६६ भैषज्यरत्नावली । [ शोथ-

प्रतिदिन प्रातःकाल इस चूर्णको चार माशे परिमाण लेकर मट्ठेके साथ अथवा भाँगरेके रसके साथ सेवन करे । इसपर नमक और जलका परित्याग कर तक्रके साथ भोजन करे और तृषा लगनेपर भी तक्रही पान करे । यह सुधानिधि रस कामला, ज्वर, सूजन, संग्रहणी, पाण्डुरोग और सर्वप्रकारके विकारोंको नष्ट करनेवाला एवं अग्निको अत्यन्त दीपन करनेवाला है ॥ ७७ ॥ ७८ ॥

अग्निमुखमण्डूर ।

पलद्वादशमण्डूरं गोमूत्रेऽष्टगुणे पचेत् ।
पञ्चकोलं देवदारु मुस्तं व्योषं फलत्रयम् ॥ ७९ ॥
विडङ्गं पलमात्रं तु पाकान्ते चूर्णितं क्षिपेत् ।
पाययेदक्षमात्रं तु तक्रेण सह बुद्धिमान् ॥ ८० ॥
असाध्यं श्वयथुं हन्ति पाण्डुरोगं विरोद्भवम् ।
स्वयमग्निमुखं नाम सर्पिःक्षौद्रेण पाययेत् ॥ ८१ ॥

लोहेके मण्डूर (मैल) को ४८ तोले लेकर अठगुने गोमूत्रमें पकावे । जब पकते पकते पाक गाढा होजाय तब उसमें पीपल पीपलामूल, चव्य, चीता, सोंठ, देवदारु, नागरमोथा, त्रिकुटा, त्रिफला और वायविडङ्ग इनके चार चार तोले चूर्णको डालकर अच्छे प्रकार मिलादेवे । इसमेंसे प्रतिदिन दो दो तोले लेकर घी और शहदमें मिलाकर चाटे और ऊपरसे तक्र पान करे । इस प्रकार नियमबद्ध होकर इसका सेवन करे तो यह अग्निमुखनामक मण्डूर असाध्य सूजन और चिरकालीन पाण्डुरोगको शीघ्र दूर कर देता है ॥ ७९–८१ ॥

शोथारिमण्डूर ।

गोमूत्रशुद्धमण्डूरं निर्गुण्डीरसभावितम् ।
मानकार्द्रककन्दानां रसेष्वपि च भावयेत् ॥ ८२ ॥
त्रिफला व्योषचव्यानां चूर्णं कर्षद्वयं पृथक् ।
चूर्णाद्विगुणमण्डूरं गोमूत्रेऽष्टगुणे पचेत् ॥ ८३ ॥
सिद्धे चूर्णं क्षिपेच्छीते मधुनश्च पलद्वयम् ।
निहन्ति सर्वजं शोथं सर्वाङ्गोत्थं न संशयः ॥ ८४ ॥

गोमूत्रमें शुद्ध किये हुए मण्डूरको ५६ तोले लेकर पहले निर्गुण्डीके रसमें भावना देवे । फिर मानकन्द, अदरख और जिमीकन्द इनके रसोंमें क्रमशः भावना देकर अठगुने गोमूत्रमें पकावे । जब पाक पकते २ गाढा होजाय