भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ९५५


प्रातःकाले शुचिर्भूत्वा भक्षयेच्छुक्तिमानतः ।
निहन्ति सर्वजं शोथं ग्रहणीं च विशेषतः ॥ ७३ ॥
उदरेषु च सर्वेषु शोथेषु च विधानतः ।
विविधा व्याधयश्चान्ये सेवनाद्यन्ति साध्यताम् ॥ ७४ ॥

सोंठ, मिरच, पीपल, हरड, बहेडा, आमला, दाख, पोहकरमूल, सुगन्धवाला, कचूर, लोहा, वच, लौंग, काकडासिंगी, दारचीनी, सौंफ, बहेडा, वायविडङ्ग और धायके फूल इन सबको समान भाग लेकर महीन चूर्ण कर लेवे । फिर इस सब चूर्णके समान भाग शुद्ध लोहेके मैलको लेवे और उसको प्रथम स्वच्छ पात्रमें रखकर कूडैकी छालके रससे अच्छे प्रकार खरल करके गोलासा बनालेवे । पश्चात् उक्त गोलेको जामुनके पत्तोंसे लपेटकर चिकनी मिट्टीका लेप करके गजपुटमें पकावे । जब पककर स्वाङ्गशीतल होजाय तब निकालले और चूर्ण करके पूर्वोक्त चूर्णमें मिलादेवे । तदनन्तर प्रतिदिन प्रातःकाल शुद्ध होकर इसमेंसे दो दो तोले प्रमाण खाय । यह लोह सर्व प्रकारके शोथ और संग्रहणीको नष्ट करता है । विशेषकर सब उदररोग, सर्व शोथ और अन्यान्य दुस्तर अनेकों रोग इसका सेवन करतेही नाश होजाते हैं ॥ ६९-७४ ॥

सुधानिधि ।
धान्यकं बालकं मुस्तं विश्वं सिन्धुं समांशकम् ।
मण्डूरं द्विगुणं दत्त्वा भावयेत्तु चतुर्दश ॥ ७५ ॥
गोमूत्रं केशराजश्च शोथघ्नी भृङ्गराजकः ।
निर्गुण्डी भेकपर्णी च रसैरेषां विभाव्य च ॥ ७६ ॥

धनियाँ, सुगन्धवाला, नागरमोथा, सोंठ और सेंधानमक ये प्रत्येक समान भाग और लोहमण्डूर सब औषधियोंसे दुगुना लेकर सबोंको एकत्र चूर्ण करलेवे । फिर इस चूर्णको गोमूत्र, कालाभाँगरा, पुनर्नवा, भाँगरा, निर्गुण्डी और मण्डूकपर्णी इनके रसमें यथाक्रम चौदहबार भावना देवे । पश्चात् धूपमें सुखाकर उत्तम प्रकार खरल करलेवे । ७५ ॥ ७६ ॥

निष्कं चूर्णं प्रयुञ्जीत तक्रेण सह बुद्धिमान् ।
केशराजरसैर्वापि भोजनं लवणं विना ॥ ७७ ॥
तक्रेण भोजयेदन्नं पाने तक्रं च दापयेत् ।
कमलाज्वरशोथघ्नो वह्निसन्दीपनः परः ॥
ग्रहणीपाण्डुरोगघ्नः सर्वव्याधिविनाशनः ॥ ७८ ॥