भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउन्हें भगवान् के राज्य में तो प्रवेश करने दिया जाता है; परन्तु श्रीभगवान् के वैकुण्ठ धामों अथवा गोलोक-वृन्दावन धाम में नहीं । राज्य में प्रवेश करना और राजमहल में जाना एक वस्तु नहीं है । यहाँ श्रील रूप गोस्वामी निर्विशेषवादियों और भक्तों की भिन्न- भिन्न गति का वर्णन करने का प्रयास कर रहे हैं । सामान्यतः निर्विशेष- वादी और भगवान् से द्वेष करने वाले जब कभी यदि अपनी आध्यात्मिक सिद्धि तक पहुँचते हैं, तो केवल निर्विशेष ब्रह्मज्योति में ही प्रवेश कर सकते हैं। निर्विशेष दार्शनिक इस दृष्टि से भगवान् के शत्रुओं की श्रेणी में हैं कि दोनों को केवल ब्रह्मज्योति में प्रवेश करने दिया जाता है । वास्तव में भी निर्विशेषवादी भगवान् के शत्रु ही हैं, क्योंकि वे भगवान् के अतुलनीय ऐश्वर्य को सहन नहीं कर सकते । वे सदा अपने को श्रीभगवान् के समान कहते हैं । यह उनके द्वेषभाव का ही परिणाम है । इसीलिए भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु ने निर्विशेषवादियों को भगवत्-अपराधी घोषित किया है । परन्तु भगवान् इतने अतिशय दयामय हैं कि अपने शत्रुओं को भी परव्योम में प्रवेश करके निर्विशेष ब्रह्मज्योति में रहने देते हैं । कभी-कभी कोई निर्विशेषवादी शनैः-शनैः प्रगति करता हुआ भगवान् की सविशेष धारणा में स्थित हो जाता है । भगवद्गीता में इसका प्रमाण है, "बहुत जन्म-जन्मान्तरों के बाद यथार्थ ज्ञानी मेरी शरण लेता है ।" इस शरणागति से निर्विशेषवादी वैकुण्ठधाम को प्राप्त हो सकता है, जहाँ शरणागत जीव के रूप में उसे भगवान् का सारूप्य मिलता है । 'ब्रह्माण्डपुराण' में लिखा है, "ब्रह्म में लीन सिद्ध और भगवान् के हाथों मरे दैत्य ब्रह्मलीन होकर ब्रह्मज्योति में निवास करते हैं।" भगवद्गीता में भी प्रमाण है कि वह सनातन सिद्धलोक प्राकृत-जगत् से अति परे है । भगवान् के शत्रुओं और निर्विशेषवादियों का केवल ब्रह्मज्योति में प्रवेश हो सकता है, परन्तु कृष्णभक्त सीधे वैकुण्ठधामों में प्रविष्ट हो जाते हैं । शुद्धभक्तों में भगवान् की रागानुगाभक्ति रहती है, इसलिए भगवान् के सान्निध्य में दिव्यआनन्दरस का आस्वादन करने के लिए दिव्य धामों में उन्हें प्रवेश मिलता है । श्रीमद्भागवतं (१०.८७.२३) में श्रीभगवान् का स्तवन करते हुए मूर्तिमान् वेद कहते हैं, "हे नाथ ! योगीजन आपकी एकदेशीय विभूतियों का ध्यान करके निर्विशेष ब्रह्मज्योति में लीन हो जाते हैं । आपके रिपु भी ध्यान किए बिना इस सिद्धि को पाते हैं । कामवती व्रजगोपियों ने आपकी