भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु सर्प जैसी भुजाओं के आलिंगन से यही गति पाई है। वैदिक ज्ञान के विविध अंगों के अधिपति हम देवता निरन्तर व्रजगोपियों के ही अनुगामी हैं। अतः इसमें सन्देह नहीं कि उन्हीं की गति को प्राप्त होंगे।" इस सन्दर्भ में हमें सूर्य एवं सूर्यज्योति का उदाहरण स्मरण रखना चाहिए। निर्विशेषवादी ब्रह्मज्योति में लीन होते हैं, जबकि भगवत्प्रेमीजन भगवान् के परमधाम गोलोक वृन्दावन में प्रवेश करते हैं। गोपियों के 'कामभाव' का किसी प्रकार के मैथुन से कोई सम्बन्ध नहीं है। श्रील रूप गोस्वामी स्पष्ट करते हैं कि इस 'कामभाव' का अभि- प्राय श्रीकृष्ण के संग में भक्त का भाव-विशेष ही है। सिद्धावस्था में प्रत्येक भक्त में श्रीकृष्ण के प्रति रागमय आकर्षण रहता है। इसी आकर्षण को कदाचित् भक्त का 'कामभाव' कह दिया जाता है। वस्तुतः भक्त में किसी विशेष रूप में भगवान् की सेवा करने की गाढ़ तृष्णा ही कामरूपाभक्ति है। ऐसे काम से भगवान् को भोगने की इच्छा प्रतीत हो सकता है, परन्तु वास्तव में तो उस रूप में श्रीकृष्ण के सुख के लिए ही यत्न किया जाता है। जैसे कोई भक्त भगवान् से ग्वालसखा के रूप में संग करना चाहे। उसकी इस अभिलाषा के मूल में गो चारण में श्रीकृष्ण की साहाय्य करने की उत्कण्ठा है। यह भगवान् के संग को भोगने की कामना लग सकती है, पर वास्तव में तो यह रागानुगाभक्ति है—दिव्य गोधन के चारण में उनकी सेवा की लालसा। कामरूपा भगवान् के सेवन की यह तृष्णा दिव्य व्रजधाम में प्रकट है तथा गोपियों में अतिशय प्रसिद्ध रूप में विराजित है । गोपीप्रेम इतना अनिर्वचनीय एवं हमारे मन-वाणी से अतीत है कि इसी कारण उसे कभी- कभी 'काम' कह दिया जाता है । श्री चैतन्यचरितामृत के रचयिता कृष्णदास कविराज गोस्वामी ने कामविकार और प्रेममय सेवाभाव के भेद को इस प्रकार अभिव्यक्त किया है, "काम का अर्थ अपनी इन्द्रियों को तृप्त करने की इच्छा है, जबकि प्रेम का तात्पर्य है भगवान् की इन्द्रियों को तृप्त करने की अनन्य अभिलाषा ।" प्राकृत-जगत् में ऐसा कोई प्रेमी नहीं है जो अपने प्रियतम की इन्द्रियों का सुखविधान करने को आतुर हो; सब अपनी ही इन्द्रियों की तृप्ति चाहते हैं। परन्तु गोपीजन श्रीकृष्ण की इन्द्रियतृप्ति के अतिरिक्त और कुछ नहीं, चाहतीं। ऐसा कोई उदाहरण प्राकृत-जगत् में नहीं है। इसीलिए श्रीकृष्ण