भारतकोश
भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 137, कुल 380 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 137

अध्याय १६ रागानुगाभक्ति (२) सम्बन्धरूपा नन्दमहाराज और यशोदा मैया आदि वृन्दावनवासियों में आदिपुरुष भगवान् श्रीकृष्ण के पितृत्व-मातृत्व के अभिमान का दिव्य भाव पाया जाता है। वास्तव में कोई भी श्रीकृष्ण का माता-पिता नहीं बन सकता; परन्तु भक्त से इस भाव का आश्रय वात्सल्यप्रेममय कृष्णप्रेम कहा जाता है। द्वारका में श्रीकृष्ण के बान्धव वृष्णिवंशी भी इसी भाव से भावित रहते हैं। अतएव वात्सल्यरति में श्रीकृष्ण की भक्ति व्रजवासियों और द्वारिकावासी वृष्णियों, दोनों में पायी जाती है। वृष्णियों और व्रजवासियों में प्रकट रागानुगाभक्ति उन-उन आश्रयों में नित्यसिद्ध है। साधनभक्ति के सम्बन्ध में इस रागानुगाप्रेम के वर्णन का प्रयोजन नहीं है, क्योंकि अधिक उन्नत अवस्था में यह स्वयं प्रकट होगा। रागानुगा भक्ति के पात्र वृष्णियों और व्रजवासी आदि नित्यसिद्ध भगवद्भक्तों की अनुगति के लोभी पुरुष रागानुगा भक्त कहलाते हैं, अर्थात् वे उन-उन भक्तों की संसिद्धि को प्राप्त करने के लिए यत्नशील हैं। ये रागानुग भक्त भक्ति के विधि-विधान का दृढ़ता से अनुसरण नहीं करते; वरन् सहज स्वभाव से ही नन्द, यशोदा आदि नित्य भक्तों के भाव के लोभी हो जाते हैं और फिर स्वतः ही उनकी अनुगति करने लगते हैं। किसी भक्त-विशेष के भाव की प्राप्ति का यह लोभ शनैः-शनैः बढ़ता जाता है। इसी क्रिया का नाम 'रागानुगा' है। यह सदा स्मरणीय है कि व्रजवासियों की अनुगति की यह लालसा तब तक सम्भव नहीं जब तक भवदोषों की निवृत्ति नहीं हो जाती। विधि- भक्ति के आचरण में एक अनर्थ-निवृत्ति नामक अवस्था आती है, जब सारे प्राकृत अनर्थ दूर हो जाते हैं। कदाचित् देखने में आता है कि अनर्थों