भारतकोश
भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 138, कुल 380 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 138

रागानुगाभक्ति (२) [ १११ से मुक्त न होते हुए भी कोई इस रागानुगाभक्ति का दम्भ करता है। ऐसा नामधारी भक्त अपने को नन्द, यशोदा अथवा गोपियों का अनुग बताता है; पर साथ ही उसमें मैथुन के लिए निन्दनीय आकर्षण भी दृष्टिगोचर होता है। दिव्य प्रेम की ऐसी अभिव्यक्ति तुच्छ कपटमात्र है। जिसमें गोपीप्रेम के प्रति यथार्थ राग है, उनके चरित्र में किसी प्राकृत दोष की गन्ध भी शेष नहीं रह सकती। अतः प्रारम्भ में सब को शास्त्र और गुरु के आज्ञानुसार विधिभक्ति का दृढ़ता से पालन करना चाहिए। प्राकृत विकारों से मुक्ति के अनन्तर ही व्रजवासियों की अनुगति की यथार्थ लालसा का उदय हो सकता है। श्रील रूप गोस्वामी का वाक्य है, "जब साधक यथार्थ में भवबन्धन से मुक्त हो जाता है, तब वह श्रीकृष्ण के किसी व्रजवासी नित्यभक्त का सदा स्मरण कर सकता है, जिससे वह भी उसी रूप में श्रीकृष्ण से प्रेम कर सके। इस भाव के उद्भावित होने पर वह मन द्वारा सदा व्रजवास करता है।" भाव यह है कि यदि सम्भव हो तो शरीर से ही व्रजवास करता हुआ वृन्दावन के भक्तों की अनुगति में निरन्तर भगवत्सेवा के परायण रहे। यदि शरीर से वृन्दावन में न रह सके तो कहीं भी रहते हुए वृन्दावन में रहने का ध्यान किया जा सकता है। जहाँ भी रहना हो, सदा व्रजधाम के जीवन और भगवत्सेवा में किसी भक्त-विशेष की अनुगति का चिन्तन करना चाहिए। जो वास्तव में कृष्णभावना में उन्नति कर चुका है और निरन्तर भक्ति में तत्पर रहता है, उस भक्त को पूर्णतः सिद्ध हो जाने पर भी अपने को प्रकट नहीं करना चाहिए। भाव यह है कि जब तक प्राकृत देह है, वह निरन्तर कनिष्ठ साधन के अनुसार ही साधन करता रहे। शुद्धभक्त को भी विधि भक्ति का आचरण करते रहना चाहिए। परन्तु जब श्रीभगवान् के सम्बन्ध में अपने यथार्थ स्वरूप की अनुभूति हो जाती है, तब विधिभक्ति के साथ ही किसी भगवद्भक्त-विशेष के मार्गदर्शन में वह अपने अन्तर में भगवान् का चिन्तन करता हुआ उसी भक्त की अनुगति में अपने दिव्य भाव को विकसित कर सकता है। इस सन्दर्भ में तथाकथित 'सिद्धिप्रणय' से सावधान रहना चाहिए। 'सिद्धिप्रणय' के पथ का अनुगमन एक प्रकार के अप्रामाणिक लोग करते हैं, जिन्होंने भक्ति का अपना ही मार्ग कल्पित कर रखा है। उनकी कल्पना है कि अपने को भगवान् का पार्षद समझने मात्र से उन्होंने यह पद प्राप्त कर लिया है। यह बाहरी आचरण विधि-विधान के बिल्कुल प्रतिकूल है।

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक) · पृष्ठ 138, कुल 380 में से · BharatKosha