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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 139, कुल 380 में से

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पृष्ठ 139

११२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु इस ‘सिद्धिप्रणय’ नामक पद्धति का आचरण प्राकृत सहजिया नामक तथा- कथित वैष्णवों का कपट-संप्रदाय करता है। श्रील रूप गोस्वामी के अनुसार ऐसी क्रियायें आदर्श भक्ति के मार्ग में उत्पातकारी ही सिद्ध होती हैं। श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं कि सभी मनीषी आचार्यों के मत में रागानुगा कृष्णभक्ति का उदय होने पर भी विधि-विधान का पालन करना चाहिए। जैसा पूर्ववर्णन है, विधिभक्ति के नौ अंग हैं; इनमें भी उस साधन का आचरण विशेष रूप से करना चाहिए जिसमें अपनी स्वाभाविक रुचि हो । किसी की श्रवण में विशेष रुचि होती है तो किसी की जप अथवा मूर्ति-अर्चन में। अतः श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, वन्दन, अर्चन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन आदि भक्ति के किसी भी अंग का पूर्ण निष्ठा के साथ पालन करना चाहिए। इस प्रकार सब अपनी-अपनी रुचि के अनुसार भक्ति का साधन करें । माधुर्यरति वृन्दावन धाम की गोपियों अथवा द्वारका की महिषियों की अनुगति करने वाली भक्ति को माधुर्यरति कहते हैं।" इसके दो वर्ग हैं, एक अप्रत्यक्ष माधुर्यरति और दूसरा प्रत्यक्ष माधुर्यरति । इन दोनों ही प्रकारों में गोलोक-वृन्दावन में उस-उस सेवा में लगी हुई उस-उस गोपीविशेष की अनु- गति करनी होती है। माधुर्य में श्री श्रीभगवान् से सीधी रति को 'केलि' कहा जाता है। केलि का अर्थ साक्षात् भगवान् की सेवा में लग जाना है। ऐसे अन्य भक्त भी हैं जो पुरुषोत्तम से सीधा संपर्क तो नहीं चाहते, पर गोपियों के साथ उनके माधुर्यप्रेम सम्बन्ध का आस्वादन करते हैं। इस श्रेणी के भक्त गोपीजनों और श्रीकृष्ण की लीलाकथा के श्रवण में ही रमण करते हैं। इस माधुर्य का उदय उसी में हो सकता है, जो विधि-भक्ति का आचरण कर रहा हो, विशेषतः जो मन्दिर में राधाकृष्ण की अर्चना में संलग्न हो । इन भक्तों में शनैः-शनैः मूर्ति में रागानुगाभक्ति का विकास होता है; फिर गोपियों और भगवान् के प्रेमरस-विनिमय की कथा सुनकर वे इन लीलाओं में अनुरक्त हो जाते हैं। इस रागानुगा आकर्षण का उच्च कोटि तक विकास होने पर भक्त उपरोक्त दोनों श्रेणियों में से एक में स्थान पाता है। माधुर्यरति का प्रकाश केवल स्त्रियों में ही नहीं होता । दिव्य प्रेम- लीला का प्राकृत देह से कोई सम्बन्ध नहीं है। स्त्री में श्रीकृष्ण के सखा- भाव का और पुरुष में वृन्दावन में श्रीकृष्ण की सखी गोपी बनने के भाव का

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