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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

११२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु इस ‘सिद्धिप्रणय’ नामक पद्धति का आचरण प्राकृत सहजिया नामक तथा- कथित वैष्णवों का कपट-संप्रदाय करता है। श्रील रूप गोस्वामी के अनुसार ऐसी क्रियायें आदर्श भक्ति के मार्ग में उत्पातकारी ही सिद्ध होती हैं। श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं कि सभी मनीषी आचार्यों के मत में रागानुगा कृष्णभक्ति का उदय होने पर भी विधि-विधान का पालन करना चाहिए। जैसा पूर्ववर्णन है, विधिभक्ति के नौ अंग हैं; इनमें भी उस साधन का आचरण विशेष रूप से करना चाहिए जिसमें अपनी स्वाभाविक रुचि हो । किसी की श्रवण में विशेष रुचि होती है तो किसी की जप अथवा मूर्ति-अर्चन में। अतः श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, वन्दन, अर्चन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन आदि भक्ति के किसी भी अंग का पूर्ण निष्ठा के साथ पालन करना चाहिए। इस प्रकार सब अपनी-अपनी रुचि के अनुसार भक्ति का साधन करें । माधुर्यरति वृन्दावन धाम की गोपियों अथवा द्वारका की महिषियों की अनुगति करने वाली भक्ति को माधुर्यरति कहते हैं।" इसके दो वर्ग हैं, एक अप्रत्यक्ष माधुर्यरति और दूसरा प्रत्यक्ष माधुर्यरति । इन दोनों ही प्रकारों में गोलोक-वृन्दावन में उस-उस सेवा में लगी हुई उस-उस गोपीविशेष की अनु- गति करनी होती है। माधुर्य में श्री श्रीभगवान् से सीधी रति को 'केलि' कहा जाता है। केलि का अर्थ साक्षात् भगवान् की सेवा में लग जाना है। ऐसे अन्य भक्त भी हैं जो पुरुषोत्तम से सीधा संपर्क तो नहीं चाहते, पर गोपियों के साथ उनके माधुर्यप्रेम सम्बन्ध का आस्वादन करते हैं। इस श्रेणी के भक्त गोपीजनों और श्रीकृष्ण की लीलाकथा के श्रवण में ही रमण करते हैं। इस माधुर्य का उदय उसी में हो सकता है, जो विधि-भक्ति का आचरण कर रहा हो, विशेषतः जो मन्दिर में राधाकृष्ण की अर्चना में संलग्न हो । इन भक्तों में शनैः-शनैः मूर्ति में रागानुगाभक्ति का विकास होता है; फिर गोपियों और भगवान् के प्रेमरस-विनिमय की कथा सुनकर वे इन लीलाओं में अनुरक्त हो जाते हैं। इस रागानुगा आकर्षण का उच्च कोटि तक विकास होने पर भक्त उपरोक्त दोनों श्रेणियों में से एक में स्थान पाता है। माधुर्यरति का प्रकाश केवल स्त्रियों में ही नहीं होता । दिव्य प्रेम- लीला का प्राकृत देह से कोई सम्बन्ध नहीं है। स्त्री में श्रीकृष्ण के सखा- भाव का और पुरुष में वृन्दावन में श्रीकृष्ण की सखी गोपी बनने के भाव का

रागानुगाभक्ति (२) [ ११३ उदय हो सकता है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण पद्मपुराण में है—"पूर्वकाल में दण्डकारण्य के निवासी सारे ऋषि-मुनि भगवान् श्रीराम की रूपमाधुरी को देखकर इतने लुब्ध हो गए कि स्त्रीरूप में उनका आलिंगन करने की इच्छा करने लगे। कालान्तर में गोलोक वृन्दावन में श्रीकृष्ण का अवतरण होने पर ये ऋषिगण भी गोपियों के रूप में वहाँ उत्पन्न हुए। इस प्रकार भगवान् को प्राप्त होकर उनका जीवन सिद्ध हो गया।" दण्डकारण्य के ऋषियों की कथा इस प्रकार है। जब भगवान् रामचन्द्र जी दण्डकारण्य में विराज रहे थे तो वहाँ भक्तियोग में लगे हुए तपस्वी मुनिजन उनकी रूपमाधुरी पर मुग्ध होकर श्रीकृष्ण के साथ माधुर्य- प्रेमलीला का आस्वादन करने वाली गोपियों के चिन्तन में मग्न हो गये। यहाँ स्पष्ट है कि यह जानते हुए भी कि श्रीरामचन्द्र और श्रीकृष्ण एक ही परमेश्वर हैं, उन्होंने गोपियों की ही माधुर्यरति की इच्छा की। उन्हें ज्ञात था कि रामचन्द्र आदर्श राजा होने के कारण एक से अधिक पत्नी अंगीकार नहीं कर सकते; परन्तु भगवान् श्रीकृष्ण वृन्दावन में उन सब की अभिलाषा पूर्ण कर सकते हैं। उन ऋषियों ने यह भी निर्णय किया कि कृष्णरूप श्रीराम के रूप से अधिक मधुरिमामय (आकर्षक) है। अतः उन्होंने भावी जन्म में गोपी बनकर श्रीकृष्ण का संग पाने के लिए प्रार्थना की। भगवान् राम ने उनके इस निवेदन को मौन सम्मति प्रदान की थी। श्रीराम के इस वर के फलस्वरूप अगले जन्म में वे भगवान् श्रीकृष्ण का संग करने के हेतु गोकुल की गोपियों के गर्भ से स्त्रीरूप में जन्मे और अपनी पूर्व अभि- लाषा के अनुसार गोकुल वृन्दावन में विराजमान भगवान् श्रीकृष्ण के संग का आस्वादन किया। इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण के साथ माधुर्य- प्रेम के विनिमय की दिव्य भावना को उद्भावित करके उन्होंने अपने मानव जीवन को कृतार्थ कर लिया। माधुर्यरति के दो भेद हैं--पति-पत्नी का स्वकीया प्रेम और प्रियतम में होने वाला परकीया प्रेम। जिसमें श्रीकृष्ण का स्वकीया प्रेम का उदय होता, वह भक्त द्वारका में उनकी महिषी बनता है। श्रीकृष्ण से परकीया प्रेम वाले गोलोक-वृन्दावन में प्रविष्ट होकर गोपियों के साथ श्रीकृष्ण से प्रेमरस का विनिमय-आस्वादन करते हैं। यह ध्यान रहे कि गोपी अथवा महिषी के रूप में भी यह कृष्णप्रेम स्त्रियों तक ही सीमित नहीं है। पुरुष भी इस भाव का सेवन कर सकते हैं, जैसे दण्डक वन के ऋषियों ने किया था। यदि कोई माधुर्यप्रेम तो चाहता है पर गोपियों के चरणचिह्नों की अनुगति नहीं करता, तो वह द्वारका में श्रीकृष्ण का महिषी-पद पाता है।

११४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु 'महाकूर्मपुराण' में उल्लेख है, "अग्निपुत्र महात्माओं ने श्रीकृष्ण के माधुर्यप्रेम की प्राप्ति के लिए बड़ी दृढ़ता से विधिभक्ति का आचरण किया । परिणामतः पुनर्जन्म में वे सम्पूर्ण सृष्टि के कारण वासुदेव भगवान् श्रीकृष्ण का संग कर सके । उनमें से प्रत्येक को पतिरूप में श्रीकृष्ण की प्राप्ति हुई ।" वात्सल्य और सख्य अपने को माता-पिता अथवा सखा मान कर श्रीकृष्ण के प्रति आकृष्ट हुए भक्तों को क्रमशः नन्दमहाराज और सुबल आदि का अनुसरण करना चाहिए । नन्दमहाराज श्रीकृष्ण के पिता हैं और ब्रजभूमि में श्रीकृष्ण के सारे सखाओं में सुबल सबसे अंतरंग हैं । वात्सल्य अथवा सख्य के विकास के दो प्रकार हैं । एक विधि तो स्वयं श्रीकृष्ण का पिता बन जाने की चेष्टा करना है और दूसरी विधि नन्दमहाराज की अनुगति करते हुए श्रीकृष्ण के पितृत्व की कामना रखना है । इनमें स्वयं श्रीकृष्ण का पिता बनने का प्रयास निषिद्ध है । यह विधि वास्तव में मायावाद से दूषित है । मायावादी समझते हैं कि वे स्वयं कृष्ण हैं । इसी प्रकार यदि कोई यह समझे कि वह स्वयं नन्दमहाराज बन गया है तो उसका वात्सल्यप्रेम मायावाद से कलंकित हो जायगा । मायावाद की विधि से मनन करना अपराध माना गया है और कोई भी अपराधी वैकुण्ठ जगत् में जाकर श्रीकृष्ण का संग नहीं कर सकता । 'स्कन्दपुराण' में पाण्डवों की राजधानी हस्तिनापुर के एक वृद्ध निवासी की कथा है, जो श्रीकृष्ण को अपने प्रिय बालक के रूप में चाहता था । नारदजी ने उसे नन्दमहाराज की अनुगति का उपदेश किया और इस प्रकार वह परम सिद्ध हो गया । नारायणव्यूहस्तव में कहा गया है कि जो नित्य-निरन्तर पति, पुत्र, सुहृद, मित्र, पिता के रूप में भगवान् का चिन्तन करते हैं, वे सदा सब के आराध्य हैं । इस रागानुगा कृष्णभक्ति का उदय केवल श्रीकृष्ण अथवा उनके शुद्धभक्त की कृपा से ही हो सकता है । इसे पुष्टिमार्ग भी कहते हैं (पुष्टि अर्थात् वर्धन) । भावों का इस प्रकार का विकास भक्ति को सर्वोच्च स्तर तक बढ़ाता है । इसीलिए इसकी 'पुष्टिमार्ग' संज्ञा है । विष्णु स्वामी वैष्णव सम्प्रदाय के अन्तर्गत वल्लभ सम्प्रदाय इसी पुष्टिमार्ग से श्रीकृष्ण की उपासना करता है । गुजरात के भक्तों में प्रायः पुष्टिमार्ग से बालकृष्ण की उपासना प्रचलित है ।

अध्याय १७ भाव विधिभक्ति करने पर अपरा प्रकृति से परे शुद्ध सत्त्वमयी अवस्था की प्राप्ति होती है। उस समय हृदय सूर्य के समान आलोकित हो उठता है । आकाशगामी सूर्य ग्रहों से अति परे है और किसी भी मेघ द्वारा आच्छन्न नहीं हो सकता। इसी भाँति, सूर्य के समान शुद्धभक्त के अमलधवल हृदय से सूर्यज्योति से भी विशेष उज्ज्वल भावराशि विकीर्णित हो उठती है। उसी अवस्था में श्रीकृष्ण में आसक्ति पूर्णता को प्राप्त होती है। भाव से भावित हुआ भक्त स्वाभाविक रूप से भगवत्सेवा के लिए उत्कण्ठित हो उठता है और भक्ति का उत्तम अधिकारी हो जाता है। ऐसे भक्त में विषयासक्ति का कोई उद्वेग नहीं रहता, बस राधाकृष्ण के पादपद्मों की सेवा में रुचि रहती है । स्पष्टीकरण के लिए पूर्व अध्यायों में भक्ति के लक्षणों का वर्णन किया गया है। साथ में, यह भी बताया गया है कि अपनी वर्तमान इन्द्रियों के द्वारा भक्ति के साधनों का आचरण किस प्रकार किया जा सकता है, जिससे शनैः-शनैः रागानुगाभक्ति हो जाय । विधिभक्ति एवं रागानुगा- भक्ति का विवेचन भी हुआ। विधिभक्ति में दो अवान्तर भेद हैं, साधन- भक्ति और सिद्धभक्ति । सिद्ध विधिभक्ति का ही नाम 'भाव' है। इस सन्दर्भ में तन्त्रों में उल्लेख है कि भाव शुद्ध भगवत्प्रेम की प्रथम अवस्था है; उसमें रोमांच, अश्रु, आदि सात्त्विक विकार स्वल्प मात्रा में कभी-कभी प्रकट होते हैं। जब महाराज अम्बरीष को दुर्वासा ने संकट में डाल दिया तो वे भगवान् के चरणकमलों का बार-बार ध्यान करने लगे । इसी अवस्था में उनके शरीर में कतिपय विकार प्रकट हो गए और नेत्रों से अश्रुधारा झरने लगी । ये लक्षण भाव के कार्य हैं । रोमांच, अश्रुमोचन आदि के रूप में ये प्रकट होते हैं। कुछ काल तक बाह्य रूप में प्रकट रहकर ये लक्षण चित्तवृत्ति में ही आविर्भूत रहते हैं। भाव के इस अविच्छिन्न

११६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु प्रवाह का नाम समाधि है। आस्वाद की यह अवस्था श्रीकृष्ण के साथ प्रेम की आदान-प्रदानरूप भावी क्रीड़ा की हेतु होती है । भाव की प्राप्ति के दो साधन हैं। एक तो निरन्तर शुद्धभक्तों का संग करना है और दूसरा साधन अतिधन्य व्यक्तियों पर होने वाली श्रीकृष्ण अथवा श्रीकृष्ण के शुद्धभक्तों की विशेष कृपा है। भाव की उप- लब्धि प्रायः शुद्धभक्तों के संग से ही होती है; श्रीकृष्ण अथवा उनके शुद्ध- भक्तों के विशेष अनुग्रह से उसकी प्राप्ति होना तो बड़ा ही दुर्लभ है । तात्पर्य यह है कि भक्तों के सत्संग में बड़ी दृढ़ता से विधिभक्ति करनी चाहिए, जिससे भाव की प्राप्ति बिल्कुल निश्चित हो जाय । यह अवश्य है कि विशेष अवसरों पर श्रीकृष्ण की असाधारण कृपा होती है। हमें सदा उसकी आशा तो करनी चाहिए, पर श्रीकृष्ण के विशेष अनुग्रह की प्रतीक्षा में हाथ पर हाथ धर कर निष्क्रिय नहीं बैठना चाहिए। विधि के कर्तव्यों का पालन अवश्य करता रहे। यह वैसा ही है जैसे कभी-कभी देखा जाता है कि जिसने कभी विद्यालय का दर्शन नहीं किया, उस को भी महापण्डित मान लिया जाता है अथवा विश्वविद्यालयों की सम्मानार्थ उपाधियों से विभूषित किया जाता है । परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि जानबूझ कर विद्यालय न जाय और यह आशा करे कि किसी विश्वविद्यालय से स्वतः डिग्री मिल जायगी। इस न्याय से विधिभक्ति का पूरी निष्ठा के साथ आचरण करना चाहिए; परन्तु साथ ही, श्रीकृष्ण अथवा उनके भक्त की कृपा के लिए उत्कण्ठित रहे । विधिभक्ति से भावप्राप्ति का एक अन्यतम उदाहरण नारदजी की वह कथा है, जिसका वर्णन व्यासदेव ने श्रीमद्भागवत में किया है। वहाँ नारदजी ने स्वयं अपने पूर्वजन्म और भावप्राप्ति की कथा सुनाई है। वे महाभागवतों की सेवा करते और उनके वार्तालाप और कीर्तन को सुनते । इस प्रकार शुद्धभक्तों के मुखारविन्द से श्रीकृष्ण की लीलाकथा और कीर्तन को सुनने का अवसर मिलने के कारण उनका हृदय इस भक्ति पर मुग्ध हो गया। वे भगवत्कथा का श्रवण करने में अतिशय रुचि लेने लगे और इस प्रकार शनैः-शनैः उनमें कृष्ण के लिए भाव उद्बुद्ध हो गया । यह भाव शुद्ध कृष्णप्रेम से पहले होता है, क्योंकि अगले ही श्लोक में नारदजी कहते हैं कि ऋषियों से श्रवण करने की क्रमिक पद्धति के द्वारा उनमें भगवत्प्रेम उदित हुआ। श्रीमद्भागवत (१.५.२८) में नारदजी कहते हैं, "वर्षाऋतु के दिन मैंने उन महात्माओं के साथ व्यतीत किए। प्रतिदिन प्रातः और संध्या को उनका हरेकृष्ण कीर्तन सुनते-सुनते शनैः-शनैः मेरा हृदय शुद्ध

भाव [ ११७

हो गया। ध्यान से श्रवण करने पर रजोगुण और तमोगुण का प्रभाव जाता रहा और मैं भगवद्भक्ति में निष्ठ हो गया।" यह प्रत्यक्ष उदाहरण है कि शुद्धभक्तों का संग करने मात्र से भाव अवस्था प्राप्त हो सकती है। अतः यह आवश्यक है कि निरन्तर प्रातः-सायं हरेकृष्ण कीर्तन करने वाले शुद्धभक्तों का सदा संग करे। इससे हृदय की शुद्धि होकर कृष्णप्रेम का भाव उत्पन्न हो जायगा। इस वाक्य की पुष्टि श्रीमद्भागवत (३.२५.२५) में भी है। भगवान् कपिल कहते हैं "हे जननि ! शुद्धभक्तों के संग में मेरी भक्ति की दिव्य शक्ति की अनुभूति होती है।" अर्थात्, जब कोई शुद्धभक्त बोलता है तो उसके वाक्य श्रोताओं के हृदय पर शाश्वत् प्रभाव छोड़ जाते हैं। यही श्रवण-कीर्तन का रहस्य है। एक व्यावसायिक कथावाचक सुननेवालों के हृदय में दिव्य भाव नहीं जगा सकता; परन्तु जब भगवत्सेवनिष्ठ आत्मज्ञानी पुरुष बोलता है तो उसमें ऐसी शक्ति होती है कि श्रोताओं में भक्तिभाव का संचार कर देता है। अतः ऐसे अनन्य शुद्ध भक्तों का ही सत्संग करना चाहिए। इन पुरुषों के संग और सेवन से कनिष्ठ भक्त अवश्य भगवान् में श्रद्धा, रति और भक्ति को प्राप्त कर सकेगा। 'पद्मपुराण' में एक कनिष्ठ भक्त की कथा है, जिसने भाव अवस्था के लिए भगवत्कृपा पाने हेतु सारी रात्रि नृत्य में बिता दी। कदाचित् देखा जाता है कि भक्ति की किसी भी पद्धति का आचरण किए बिना सहसा ही भाव का उदय हो जाता है। इसका कारण भी श्रीकृष्ण अथवा उनके भक्त की विशेष कृपा होती है। श्रीकृष्ण की कृपा से सहसा फूटे भाव के तीन भेद हैं—वाचिक प्रसादज, आलोक दानज तथा हार्दिक। 'नारदीयपुराण' में वाचिक प्रसादज भाव का वर्णन है। भगवान् श्रीकृष्ण नारदजी से कहते हैं, "हे विप्रवर ! सर्वमंगलमयी एवं पूर्णानन्द से ओतप्रोत मेरी अनन्य भक्ति तुम्हें प्राप्त हो।" 'स्कन्दपुराण' में आलोक दानजनित भाव का विवरण है, "श्रीकृष्ण के अपूर्व रूप को देखकर जंगलवासी इतने अतिशय भावविभोर हो गए कि उन पर से अपनी दृष्टि नहीं हटा सके।" हार्दिक प्रसाद के सम्बन्ध में 'शुकसंहिता' में नारदजी श्रील व्यासदेव से कहते हैं, "आपके महाभागवत पुत्र (शुकदेव) उत्पन्न हुआ है, उसे बिना किसी उपाय के वह भगवत्प्रसादजनित भक्ति मिली हुई है, जो अनेक जन्मान्तरों में भी दुर्लभ रहती है।"

११८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु श्रीकृष्णभाव के सम्बन्ध में श्रीमद्भागवत (७.४.३६) में नारदजी युधिष्ठिर महाराज से कहते हैं, “हे राजन् ! प्रह्लादजी के चरित्र का बखान करना बड़ा कठिन है; श्रीकृष्ण में उनकी नैसर्गिकी रति थी; इस लिए मैं उनका जो कुछ भी वर्णन करूँगा, वह केवल शब्दों का प्रपंच होगा। उनका वास्तविक चरित्र तो सर्वथा अनिर्वचनीय है।” स्वयं नारद जी ने स्वीकार किया कि प्रह्लाद में स्वाभाविक भाव का उदय श्रीकृष्ण का प्रसाद था। श्रीकृष्ण में प्रह्लाद की इस स्वाभाविक रति का एकमात्र कारण नारद की कृपा थी। जिस समय प्रह्लाद महाराज माँ के गर्भ में थे, तब नारदजी उनकी माता को भक्ति का सांगोपांग उपदेश कर रहे थे। साथ में, उनकी हार्दिक अभिलाषा थी कि गर्भगत बालक भक्ति के उपदेश से लाभान्वित हो। इस प्रकार भगवान् के प्रामाणिक भक्त एवं महान् पार्षद नारद के हार्दिकप्रसाद से प्रह्लाद महाराज में उत्तम भक्त के सभी गुणों एवं लक्षणों का प्रादुर्भाव हुआ। इसी का नाम नैसर्गिकी रति है, जो भगवान् श्रीकृष्ण अथवा उनके नारद जैसे महाभागवत की विशेष कृपा से होती है। स्कन्दपुराण में पर्वत मुनि नारदजी से कह रहे हैं, “हे नारदजी ! सब सन्त महर्षियों में भी आपकी महिमा का क्या कहना। आपके हार्दिक आशीर्वाद से एक अधमजाति तक वधिक महान् कृष्णभक्त बन गया है।” श्रीकृष्ण के लिए यह भाव पाँच प्रकार का माना गया है, जिनका वर्णन श्रील रूप गोस्वामी आगे करेंगे।

अध्याय १८ भाव के लक्षण (अनुभाव) श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं कि जिसमें भाव अंकुरित हो गया है, उस पुरुष में निम्नलिखित अनुभाव पाए जाते हैं : १. वह निरन्तर अपने समय का भगवद्भक्ति में सदुपयोग करने को आतुर रहता है; निष्क्रिय नहीं बैठना चाहता। उसे दिन में चौबीस घण्टे विचलित हुए बिना सेवा की ही अभिलाषा रहती है। २. वह सदा गम्भीर और सहनशील बना रहता है। ३. वह विषयों के सब प्रकार के आकर्षणों से सदा विरक्त रहता है। ४. अपनी सेवाक्रियाओं के बदले किसी प्रकार का सांसारिक सम्मान नहीं चाहता। ५. उसे सदा यह दृढ़ आशा रहती है कि श्रीकृष्ण मुझ पर अवश्य कृपा करेंगे। ६. सदा श्रद्धाभाव से भगवत्सेवा के लिए उत्कण्ठित रहता है। ७. उसकी नामकीर्तन में सदा रुचि रहती है। ८. निरन्तर भगवान् के दिव्य गुणगान में आसक्त रहता है। ६. मथुरा, वृन्दावन, द्वारका आदि भगवान् के लीलास्थलों के वास में सदा प्रीति रखता है। अव्यर्थकालत्व भगवद्भाव को प्राप्त अनन्य भक्त अपनी वाणी को निरन्तर भगवान् से प्रार्थना करने में लगाए रखता है, मन से श्रीकृष्ण के चिन्तन में मग्न रहता है और शरीर से श्रीमूर्ति को दण्डवत् प्रणाम करता रहता है अथवा कुछ अन्य सेवा करता है। इन भावमयी क्रियाओं में कभी-कभी अश्रु भी झरने लगते हैं। इस विधि से उसका सारा का सारा जीवन भगवत्सेवा में समर्पित रहता है, क्षणभर भी किसी अन्य कार्य में व्यर्थ नहीं जाता।

१२० ] भक्तिरसामृतसिन्धु सहिष्णुता (क्षान्ति) जो क्षोभ के नाना कारण होने पर भी क्षुब्ध नहीं होता, वह धीर- गम्भीर और सहनशील है । सहिष्णुता का उदाहरण श्रीमद्भागवत (१.१६.१५) में महाराज परीक्षित के व्यवहार में है । मरणासन्न राजा ने वहाँ उपस्थित ऋषियों से कहा था— "हे विप्रो ! आप सदा मुझे एक शरणागत जीव जानें । भगवान् श्रीकृष्ण के चरणकमलों में अपने अन्तरात्मा को अर्पित कर देने के लिए ही मैं गंगातट पर आया हूँ। अतएव मुझ पर कृपा करें, जिससे मैं माँ गंगा का भी अनुग्रहभाजन बनूँ । ब्राह्मण के शाप से मेरा नाश हो जाय, मुझे भय नहीं । मैं तो बस यही चाहता हूँ कि मेरे जीवन के अन्तिम क्षणों में आप सब पावन विष्णुनाम का गान करें जिससे मैं उनके दिव्य गुणों का साक्षात्कार कर सकूँ।" महाराज परीक्षित का यह व्यवहार—जीवन के अन्त में भी धीर बने रहना तथा चित्त की शान्ति—सहिष्णुता का प्रतीक है । जिसमें श्रीकृष्ण के भाव का उदय हो गया है, उसमें यह लक्षण प्रकट रहता है । वैराग्य इन्द्रियों को सदा विषयभोग चाहिए । परन्तु श्रीकृष्ण के दिव्य भाव का उदय हो जाने पर भक्त की इन्द्रियाँ फिर विषयवासना में रुचि नहीं लेतीं । मन की यह अवस्था विरक्ति कहलाती है । राजा भरत के चरित्र में इसका दृष्टान्त है । श्रीमद्भागवत (५.१४.४३) में उल्लेख है, "महाराज भरत का मनमधुकर श्रीकृष्ण के चरणकमलों की माधुरी में इतना अनुरक्त हो गया था कि यौवन में ही उन्होंने परिवार, पुत्र, मित्र, राज्य आदि सब दुस्त्यज्य विषयों को अस्पृश्य मल समझकर त्याग दिया ।" अस्तु, महाराज भरत वैराग्य के आदर्श हैं। उन्हें प्राकृत-जगत् के सभी सुखदायक विषय उपलब्ध थे; पर उन्होंने उन सब को ठुकरा दिया । इसका तात्पर्य यह हुआ कि वैराग्य का अर्थ कृत्रिम रूप से आसक्ति के कारणों से असंग और अलग रहना नहीं है । विषयलोभ के मध्य भी अना- सक्त भाव से रहे, यही वैराग्य है । प्रारम्भ में निस्सन्देह कनिष्ठ भक्त को सभी मोहकारी विषयों से दूर रहना चाहिए, परन्तु उत्तम भक्त की स्थिति ऐसी परिपक्व हो जाती है, विषयों के मध्य भी वह कदापि आकृष्ट नहीं होता । यह वैराग्य की यथार्थ कसौटी है । मानशून्यता सब प्रकार से उत्कृष्ट होते हुए भी भक्त का अपनी स्थिति पर

भाव के लक्षण (अनुभाव) [ १२१ अभिमान न करना मानशून्यता है। पद्मपुराण में उल्लेख है कि चक्रवर्ती सम्राट् भगीरथ में श्रीकृष्ण के लिए ऐसे अतिशय भाव का उदय हुआ कि वे अपने शत्रुओं के राज्य में भिक्षा माँगते हुए दीनभाव से चाण्डालों तक को नमस्कार करने लगे। इतिहास में भक्तों के ऐसे बहुत से उदाहरण हैं। केवल दो सौ वर्ष पहले कलकत्ते का लालबाबू नामक बहुत बड़ा जमींदार वैष्णव हो गया और वृन्दावन में वास करने लगा। वह घर-घर जाकर, यहाँ तक कि अपने पूर्व के शत्रुओं के घर भी भिक्षा माँगता। भिक्षुक को सब प्रकार का अपमान सहना पड़ता है। यह स्वाभाविक है। परन्तु श्रीकृष्ण के लिए इन अपमानों को सहन करना चाहिए। कृष्णभक्त श्रीकृष्ण ही सेवा के लिए तुच्छ से तुच्छ पद भी ग्रहण करने में संकोच नहीं करता। आशाबन्ध भगवान् की कृपा अवश्य होगी—यह दृढ़ विश्वास आशाबन्ध कहलाता है। भक्त की निरन्तर यही भावना रहती है—“मैं विधिभक्ति के लिए प्राणपण से यत्नशील हूँ; इसलिए भगवान् को फिर से अवश्य प्राप्त हो जाऊँगा।” इस सन्दर्भ में श्रीमत् सनातन गोस्वामी की एक प्रार्थना से आशाबन्ध का स्वरूप स्पष्ट हो जाता है। वे कहते हैं, “मुझमें न कृष्णप्रेम है और न कृष्णप्रेम के श्रवण, कीर्तन आदि साधनों में ही मेरी प्रीति है तथा जिस भक्तियोग के द्वारा निरन्तर श्रीकृष्ण का चिन्तन करते हुए हृदय उन्हीं के चरणकमलों में एकाग्र रहता है, उसका भी मुझ में अभाव है। मेरे लिए ज्ञान अथवा शुभ कर्म की भी कोई सम्भावना नहीं है। इसलिए हे गोपीजनवल्लभ श्रीकृष्ण मैं तो बस आपके सामने रुदन (प्रार्थना) ही कर सकता हूँ। मेरी एकमात्र अभिलाषा है कि जिस किसी प्रकार आपके चरणकमलों की मुझे प्राप्ति हो जाय। यह इच्छा मुझे व्यथित कर रही है, क्योंकि जीवन को उस दिव्य लक्ष्य की प्राप्ति के मैं सर्वथा अयोग्य समझता हूँ।” तात्पर्य यह है कि घोर निराशा में भी यह आशा बनाए रखनी चाहिए कि जैसे- तैसे भगवान् के चरणसरोज की प्राप्ति तो मुझे हो ही जायगी।” समुत्कण्ठा भक्तियोग में सिद्धि-लाभ के लिए अतिशय लुब्धता का नाम समुत्कण्ठा है। भक्ति के लिए पूर्ण लोभ होना आवश्यक है। वास्तव में यह लोभ

१२२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु ही कृष्णभावना में सफलता प्राप्ति का मूल्य है। किसी भी वस्तु की उपलब्धि उसका मूल्य देने पर ही होती है। वैदिक शास्त्रों में उल्लेख है कि परम मूल्यवान् वस्तु—कृष्णभावना को खरीदने के लिए अर्थात् सिद्धि-लाभ के हेतु प्रगाढ़ उत्कण्ठा को उदित करना होगा। बिल्वमंगल ठाकुर ने स्वरचित कृष्णकर्णामृत में उत्कण्ठा का अत्यन्त सजीव सुन्दर चित्रांकन किया है। वे कहते हैं, “मेरे नेत्र व्रजकिशोर की काली भौंहों से परिवेष्टित, कमलदल के समान सघन और उन्नत नेत्रों से युक्त, अनुरागभरी और चंचलतामयी दृष्टि से भक्तों को निहारती हुई, मृदु वचनों में आर्द्रता ओतप्रोत, अधरामृत पर रक्तवर्ण और मधुर वंशीरव में अलौकिक मदभरी जगत् को मोहित करने वाली मूर्ति को वृन्दावन में देखने को आतुर हैं।” नामगान में सदा रुचि कृष्णकर्णामृत में ही सखी राधारानी का यह वर्णन सुनाती है, “हे गोविन्द ! अपने नयनकमलों से अश्रुबिन्दुरूपी मकरन्द को निस्यन्दित करती हुई वृषभानुनन्दिनी बाला आज आप की नामावली को मधुरस्वर से गा रही है ।” भगवान् के दिव्य गुणों का गान भगवान् के गुणगान में आसक्ति का वर्णन कर्णामृत में इस प्रकार है—“ओह ! मन्मथ-मथन श्रीकृष्ण का माधुर्य से भी अधिक मधुर और चापल्य से भी अधिक चपल अनिर्वचनीय कैशोर बलात् मन को हरण किए जा रहा है। अरे ! मैं क्या करूँ ?” श्रीकृष्ण के लीलास्थलों में प्रीति श्रील रूप गोस्वामी की पद्यावली में वृन्दावन का यह विवरण है, “यहाँ पर नन्दमहाराज के घर नन्दनन्दन रहते थे; यहाँ श्रीकृष्ण ने उस शकट का भंजन किया जिसमें शकटासुर छिपा हुआ था और यहाँ भव- बन्धन से मुक्तिदाता दामोदर को यशोदा मैया ने रस्सी से बाँधा था।” श्रीकृष्ण का शुद्धभक्त मथुरामण्डल अथवा वृन्दावन में वास करता हुआ श्रीकृष्ण की सारी लीलास्थलियों का दर्शन करता है। इन परम पावन स्थलों पर श्रीकृष्ण ने ग्वालबाल और यशोदा मैया के साथ भाँति- भाँति की लीलायें की थीं। कृष्णभक्तों में इन स्थानों की परिक्रमा करने की परिपाटी अद्यावधि प्रचलित है और मथुरा-वृन्दावन को जाने वाले

भाव के लक्षण (अनुभाव) [ १२३ सदा दिव्य आनन्द का आस्वादन करते हैं। वस्तुतः यदि कोई वृन्दावन जाय तो तत्काल श्रीकृष्ण के विरहसागर में डूब जायगा, क्योंकि अपने अवतरणकाल में उन्होंने वहाँ कैसे अद्भुत लीलारस का परिवेषण किया था। श्रीकृष्ण के लीला-स्मरण में ऐसी रति वास्तव में कृष्णरति ही है। परन्तु बहुत से ऐसे निर्विशेषवादी और योगी हैं जो बाह्य रूप से भक्ति तो करते हैं, पर उसके द्वारा अन्त में भगवान् में लीन हो जाना चाहते हैं। कदाचित् वे श्रीकृष्ण के लीलास्थलों को जाने सम्बन्धी शुद्धभक्तों में भाव का अनुकरण भी करते पाये जाते हैं। फिर भी उनकी क्रियाओं को रति नहीं माना जा सकता है, क्योंकि वे यह सब केवल सायुज्य मुक्ति के लिए करते हैं। श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं श्रीकृष्ण के लिए शुद्धभक्तों में प्रकट होने वाली रति कर्मियों और ज्ञानियों के हृदय में सिद्ध नहीं हो सकती। वास्तव में शुद्धकृष्णभावना में होने वाली यह रति बड़ी दुर्लभ है, मुक्तजन भी इसे खोजते फिरते हैं। जैसा भगवद्गीता का सिद्धान्त है, भवबन्धन से मुक्ति होना वह अवस्था है, जब भक्ति की उपलब्धि हो सकती है। जो केवल मुक्त होकर ब्रह्मज्योति में लीन होना चाहता है, उसके लिए कृष्ण- रति की प्राप्ति असम्भव है। श्रीकृष्ण इस रति को अतिशय छिपाकर रखते हैं और केवल शुद्धभक्तों को देते हैं। साधारण भक्त भी शुद्ध कृष्णरति नहीं पा सकते। फिर मुक्ति और भुक्ति की कामना से दूषित हृदय वाले सकामकर्मी और ज्ञानियों को तो भगवान् की वह रति कैसे मिल सकती है। बहुत से नाममात्र के भक्त श्रीकृष्ण की अष्टकालिक लीला का ध्यान करते हैं। ऐसे लोगों का मिथ्या अनुकरण करते हुए कभी-कभी अन्य व्यक्ति भी यह दम्भ करने लगते हैं कि श्रीकृष्ण बालरूप में उनसे बोल रहे हैं अथवा राधाकृष्ण दोनों आकर उनसे वार्तालाप कर रहे हैं। निर्विशेष- वादी भी इन लक्षणों का कपट करके उन भोले-भाले लोगों को मोह लेते हैं जिन्हें भक्तिविद्या का ज्ञान नहीं होता। परन्तु अनुभवी भक्त तो इन सब विकृतियों को देखते ही समझ जाता है कि यह केवल कपट-व्यापार है। ऐसे कपटी में जो रति दृष्टिगोचर होती है, वह रत्याभास है, यथार्थ रति नहीं। रत्याभास वाले कपटी के लिए यह आशा अवश्य है कि काला- न्तर में कभी वह शुद्धभक्ति के स्तर पर आरूढ़ हो सकता है। इस अनुकृत रति के दो भेद हैं—रत्याभास और परा रति। यदि कोई विधिभक्ति के आचरण अथवा सद्गुरु के मार्गदर्शन के बिना ऐसी

१२४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु अनुकृत रति दिखाये, तो उसे रत्याभास कहते हैं। कभी-कभी भोग के अभि- लाषी को भी दैवात् भगवन्नाम के कीर्तन परायण शुद्धभक्तों के सत्संग का अवसर मिलता है । भगवान् की कृपा से ऐसा व्यक्ति भी कीर्तन में सम्मि- लित हो सकता है। तब शुद्धभक्तों के हृदयाकाश में स्थित भावचन्द्रिका की छाया उस पर भी पड़ती है; तथा शुद्धभक्तों के प्रभाव से उसमें कुतूहलमयी चंचल रति की छाया सी उदित होती। जब इस रत्याभास से सम्पूर्ण प्राकृत दुःख दूर हो जाते हैं तो उसे परा रति कहते हैं। उपरोक्त रत्याभास अथवा परारति का उदय शुद्धभक्तों के सत्संग अथवा वृन्दावन-मथुरा आदि तीर्थ स्थानों की यात्रा से हुआ करता है। जो भाग्यवान् इस कृष्णरति को पा कर शुद्धभक्तों के संग में भक्ति-साधन करता है, वह भी शुद्धभक्ति कर सकता है। निष्कर्ष यह है कि परारति इतनी शक्तिशाली है कि यदि किसी साधारण मनुष्यों में इस का आभास भी हो, तो वह शुद्धभक्तों के संग से संसिद्धि-लाभ कर सकता है। शुद्धभक्तों के सत्संग रूपी पर्याप्त प्रसाद के बिना श्रीकृष्ण के लिए ऐसी रति अथवा भाव का उदय नहीं हो सकता। जैसे शुद्धभक्तों के सत्संग से रति का उदय होता है, वैसे ही शुद्ध- भक्तों के चरणकमलों का अपराध करने से रति का अभाव भी हो सकता है। अर्थात्, शुद्धभक्तों के संग से कृष्णरति उद्बुद्ध हो सकती है और यदि शुद्धभक्तों के चरणों का अपराध हो जाय तो रत्याभास अथवा परा रति का क्षय भी हो सकता है, उसी प्रकार जैसे पूर्ण चन्द्रमा क्रमशः क्षीण होकर अन्धकार में विलीन हो जाता है। अतः शुद्धभक्तों का संग करते हुए यह निरन्तर ध्यान रखना चाहिए कि उनके चरणों का अपराध न बन बैठे । शुद्धभक्तों के अपराध के अनुपात में रत्याभाव अथवा परारति का क्षय होता जाता है। यदि अपराध बहुत गम्भीर हो तो रति बिलकुल न्यून हो जाती है और यदि गम्भीर न हो तो रति की श्रेणी मध्यम अथवा कनिष्ठ हो जाती है। मोक्ष अथवा ब्रह्मज्योति में लीन होने के अभिलाषी का भाव या तो शनैः शनैः भावाभास को प्राप्त हो जाता है अथवा अहंग्रहोपासना में परि- वर्तित हो जाता है, जिससे जीव अपने को परमेश्वर से अभिन्न समझने लगता है। आत्मसाक्षात्कार की इस अवस्था का नाम अद्वैतवाद है। अद्वैत- वादी के मत में उसमें और परमेश्वर में भेद नहीं है; अतः वह समझता है कि अपनी उपासना से पूर्ण परतत्त्व की उपासना हो जाती है। कभी-कभी कोई कनिष्ठ भक्त बड़े उत्साह से श्रवण-कीर्तन और

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नृत्य में भाग लेता हुआ पाया जाता है; परन्तु उसके हृदय की धारणा यही रहती है कि मैं परमब्रह्म से एक हो गया हूँ। यह अद्वैत धारणा शुद्धभक्ति से बिल्कुल भिन्न है। जिसके भीतर विधि-साधन किए बिना ही अकस्मात् भाव दिखाई देने लगता है, उसने पूर्वजन्म में भक्ति का साधन किया था, ऐसा समझना चाहिए। किसी विघ्नवश, प्रायः भक्त-अपराध के कारण वह कुछकाल के लिए प्रतिहत-शक्ति हो गया होगा। अब फिर अवसर आने पर प्रकट हो गया है। निष्कर्ष यह है कि शुद्धभक्तों के संग से ही भक्तिपथ पर उत्तरोत्तर अग्रसर हुआ जा सकता है। लोकोत्तर चमत्कारकारी और सब शक्तियों को प्रदान करने वाले भाव की प्राप्ति श्रीकृष्णकी अहैतुकी कृपा से ही होती है। जिस पुरुष में भाव का उदय हो गया है और जो विषयों से पूर्णतः विरक्त हो गया है, उसमें यदि भक्ति के आदर्श के विरुद्ध कोई विगुणता पाई जाय तो भी उससे द्वेष न करे। भगवद्गीता में प्रमाण है कि जिसकी भगवान् में अनन्य श्रद्धा- भक्ति है, वह यदि कभी अकस्मात् शुद्धभक्ति के लक्षणों से गिर भी जाय, तो भी उसे शुद्ध ही समझना चाहिए। भक्ति, भगवान् और गुरु में अनन्य श्रद्धालु पुरुष भक्ति की क्रियाओं में उच्च स्थान पाता है। 'नृसिंहपुराण' का वाक्य है "जो मन, वाणी और शरीर से अनन्य भाव के साथ भगवान् की सेवा के परायण है, वह यदि बाह्य रूप से मलिन क्रियाओं में प्रवृत्त दिखाई दे, तो भी उसकी बलवती भक्ति के प्रभाव से ऐसी दूषित क्रियायें अति शीघ्र समाप्त हो जायेंगी।" पूर्ण चन्द्र पर कुछ काले धब्बे दिखाई देते हैं, फिर भी पूर्ण चन्द्रमा की ज्योत्स्ना प्रतिहत नहीं होती। इसी प्रकार, भक्ति के भण्डार के सामने छोटी सी भूल भूल नहीं समझी जाती। कृष्णरति दिव्य आनन्दरूपा और आह्लादिनी है। अनन्त दिव्य आह्लाद के बीच छोटे प्राकृत दोष का कुछ भी प्रभाव नहीं होता।

अध्याय १६ प्रेमभक्ति जब अपने विशेष सम्बन्ध में श्रीकृष्ण की प्रीति का भाव अतिशय तीव्र हो जाता है तो उसे शुद्ध प्रेम कहते हैं। प्रारम्भ में भक्त गुरु-आज्ञा के अनुसार विधिभक्ति में तत्पर रहता है। फिर इस साधन के द्वारा सम्पूर्ण प्राकृत विकारों से पूर्ण शुद्ध हो जाने पर भक्ति में रुचि और आसक्ति का उदय होता है। यही रुचि और आसक्ति शनैः-शनैः तीव्र होकर कालान्तर में 'प्रेम' का रूप धरती है। 'प्रेम' शब्द का प्रयोग वास्तव में केवल भगवान् के सम्बन्ध में ही हो सकता है प्राकृत-जगत् में तो प्रेम का प्रश्न ही नहीं बनता । वहाँ जिसे भ्रमपूर्वक प्रेम समझा जाता है वह केवल काम है। प्रेम और काम में स्वर्ण और लोहे का सा भेद है। 'नारदपंचरात्र' में स्पष्ट उल्लेख है कि जब काम और ममता पूर्ण रूप से भगवान् में होते हैं, उस भक्ति को ही भीष्म, प्रह्लाद, उद्धव और नारद आदि आचार्यों ने प्रेम कहा है। भीष्म जैसे महाभागवतों ने अन्य सभी व्यक्तियों में ममता त्याग देने को भगवत्प्रेम बताया है। उनके अनुसार, अन्य सब से सम्बन्ध-विच्छेद करके केवल एक ही पुरुष (भगवान्) में अपने सम्पूर्ण ममत्व को स्थापित कर देना प्रेम है। वह प्रेम भाव से उत्पन्न और भगवान् की अहैतुकी कृपा से उत्पन्न, ऐसे दो प्रकार का होता है। भावोत्थ सद्गुरु के मार्गदर्शन में शास्त्रों में वर्णित विधिभक्ति करने मात्र से भावोत्थ प्रेम हो जाता है। विधिभक्ति से उत्पन्न भाव से हुई प्रेमभक्ति का उदाहरण श्रीमद्भागवत (११.२.४०) में इस प्रकार है, “विधिभक्ति करते-करते भक्त अपनी स्वाभाविक कृष्णभावना को प्राप्त हो जाता है। नामकीर्तन का अनुरागी और द्रवीभूत चित्त होकर वह कभी हँसता है, कभी रोने लगता है, कभी चिल्लाता है, कभी गाता है और कभी लोक- लज्जा के बिना उन्मत्त की भाँति नाच उठता है।”

प्रेमभक्ति [ १२७ पद्मपुराण में रागानुगाभक्ति से उत्पन्न भाव द्वारा हुए प्रेम का दृष्टान्त है। चन्द्रकांति नामक सुमुखी ने श्रीकृष्ण को पतिरूप में पाने के लिए कठोरता से ब्रह्मचर्यव्रत रखा। वह निरन्तर उन्हीं की दिव्य मूर्ति के ध्यान और कीर्तन में तन्मय रहती। श्रीकृष्ण से भिन्न किसी अन्य को पतिरूप में वरण न करने का उसका दृढ़ निश्चय था। भगवान् की अशेष-विशेष कृपा से उत्पन्न प्रेम जब कोई प्रेमभाव सहित निरन्तर भगवान् के संग में रहता है तो यह समझना चाहिए कि अपनी अहैतुकी विलक्षण कृपा से प्रेरित होकर भगवान् ने स्वयं उसे इस अवस्था का दान किया है। ऐसी विलक्षण कृपा का उदाहरण श्रीमद्भागवत (११.१२.७) में है। भगवान् श्रीकृष्ण उद्धव से कहते हैं, “वृन्दावन में गोपियों ने मेरी प्राप्ति के लिए न वेदों का स्वाध्याय किया, न तीर्थाटन किया, न किसी विधि-विधान अथवा तप का आचरण किया। केवल मेरे सत्संग से ही उन्हें भक्ति की परम संसिद्धि प्राप्त हो गयी।” पद्मपुराण में चन्द्रकान्ति और श्रीमद्भागवत में गोपियों के उदाहरण से प्रतीत होता है कि जो भक्त अपनी परिस्थिति की चिन्ता किए बिना नित्य-निरन्तर श्रीकृष्ण का चिन्तन करता है और प्रेमभाव से उनकी कीर्ति का गान करता है, वह भगवान् श्रीकृष्ण की अति कृपा के फलस्वरूप अनन्य भक्ति की परम संसिद्धि को प्राप्त हो जायगा। यह स्वयं श्रीमद्- भागवत से प्रमाणित है, “जो भगवान् हरि को उपासता, भजता और प्रेम करता है, वह तप, त्याग आदि स्वरूप-साक्षात्कार के सभी साधनों को कर चुका है। दूसरी ओर, यदि सब प्रकार के तप, त्याग और योग करने पर भी हृदय में हरि के लिए ऐसा प्रेम नहीं होता तो सारा साधन समय का अपव्यय मात्र है। जो निरन्तर बाहर-भीतर श्रीकृष्ण को देखता है, उसने स्वरूप-साक्षात्कार के सब तप-त्याग का उल्लंघन कर लिया है और यदि सब प्रकार का तप-त्याग करने से बाद भी श्रीकृष्ण का भीतर-बाहर दर्शन न हो तो सब साधन निष्फल है।” श्रीकृष्ण की अति कृपा से उदित प्रेम दो प्रकार का होता है— १. भगवान् के माहात्म्य ज्ञान से युक्त तथा २. किसी बाह्य हेतु के बिना श्रीकृष्ण में स्वतः अनुरक्त हो जाना। ‘नारदपंचरात्र’ में कहा है कि यदि भगवान् के माहात्म्य-ज्ञान के कारण भगवान् में अतिशय स्नेह और अचल प्रेम हो जाय तो चार प्रकार की वैष्णव मुक्तियों (सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य और सार्ष्टि) की प्राप्ति निश्चित है। वैष्णव मुक्ति उस मायावादी

१२८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु मुक्ति से सर्वथा भिन्न है, जिसमें जीव भगवान् की ब्रह्मज्योति में लीन हो जाता है। 'नारदपंचरात्र' में शुद्ध अनन्य भक्ति को स्वार्थवासना से शून्य कहा गया है। भक्त का भगवान् के विषय में अन्य अभिप्राय से रहित निरन्तर प्रेममयी मनोवृत्ति बनाए रखना ही भगवान् को वश में करने वाली भक्ति है। अर्थात्, जो निरन्तर भगवान् श्रीकृष्ण के रूप का चिन्तन करता है, वह शुद्ध वैष्णव है। महिमाज्ञानयुक्त प्रभुप्रसाद प्रायः विधिमार्ग का अनुसरण करने वालो को होता है और रागानुगाभक्ति के अनुगामियों को प्रायः माहात्म्य ज्ञान रहित हेतुरहित भगवत्प्रसाद प्राप्त होता है। विधिभक्ति के द्वारा भगवत्कृपा को प्राप्त हुआ भक्त भगवान् की असमोर्ध्व महिमा, दिव्य रूप- माधुरी और रागानुगाभक्ति की ओर भी आकृष्ट हो सकता है। अर्थात्, विधिभक्ति के आचरण से वह भगवान् की दिव्य रूपमाधुरी का पूर्ण रूप से आस्वादन करने के योग्य हो जाता है। उपरोक्त दोनों ही प्रकार की उत्कृष्ट अवस्थायों की प्राप्ति केवल भक्त पर भगवान् की अति कृपा से सम्भव है। शुद्धभक्तों का सत्संग यद्यपि यहाँ तक प्रेम-प्राप्ति की नाना पद्धतियों का उल्लेख हो चुका है, श्रीरूप गोस्वामी अब इस दिव्य अवस्था को पाने की सामान्य प्रक्रिया का वर्णन करते हैं। प्रेमभक्ति का प्रारम्भ मूल रूप से श्रद्धा है। शुद्धभक्तों के बहुत से संघ और सत्संग हैं। यदि कोई लेशमात्र श्रद्धा के साथ इन संघों का संग करने लगे तो शुद्धभक्ति के मार्ग पर द्रुतगति से अग्रसर होगा। शुद्धभक्त का प्रभाव इतना अतिशय होता है कि यदि कोई अल्प श्रद्धा से भी उसका संग करने आए तो भगवद्गीता, श्रीमद्भागवत, आदि प्रामाणिक शास्त्रों से भगवत्कथा सुनने को मिलेगी। इस प्रकार अन्तर्यामी भगवान् की कृपा से उपरोक्त शास्त्रों में उसकी श्रद्धा दृढ़ होती जायगी। शुद्धभक्तों के सत्संग की यह पहली अवस्था है। फिर अधिक उन्नत और परिपक्व हो जाने पर शुद्धभक्त के आश्रय में विधि भक्ति का आचरण करने के लिए वह स्वतः आत्मसमर्पण करके उन्हें गुरु बना लेता है। इसके बाद, तीसरी अवस्था में गुरुदेव के मार्गदर्शन में वह विधिभक्ति का आचरण करता है और परिणामस्वरूप सम्पूर्ण अनर्थों से मुक्त हो जाता है। अनर्थ- निवृत्ति होने पर उसमें निष्ठा उत्पन्न होती है और फिर क्रमशः भक्ति में

प्रेमभक्ति [ १२६ रुचि, आसक्ति, भाव का तथा अन्त में प्रेम का उदय होता है। शुद्ध भगवत्प्रेम के उद्बोधन की ये भिन्न-भिन्न अवस्थायें हैं। जिस परम सौभाग्यशाली के चित्त में यह अपूर्व प्रेमरूप दिनमणि उदित होता है, उसकी मुद्रा को भलीभाँति समझने में विद्वान् भी असफल रहते हैं। इसीलिए भगवान् शिव ने 'नारदपंचरात्र' में पार्वती से कहा है— “हे महेश्वरी ! भगवान् हरि के प्रेम में मत्त होकर परमानन्द में निमग्न हुए पुरुष को शरीर और मन के सुख-दुःख को कुछ भी अनुभव नहीं होता।" स्नेह आदि प्रेम के व्यवहार प्रेमरूप मूल वृक्ष के ही शाखारूप विलास हैं। इनका प्रकाश भी नाना भाँति से होता है; अतः इन भेदों का विशद विवेचन यहाँ नहीं किया गया। इनका वर्णन श्रील सनातन गोस्वामी ने भागवतामृत में किया है। यद्यपि स्नेह आदि प्रेम के विलासों का विषय अतिशय गूढ़ है, तथापि सनातन गोस्वामी ने इन्हें भली प्रकार से स्पष्ट कर दिया है। इस प्रकार भक्तिरसामृतसिन्धु के पूर्व विभाग का समापन करते हुए श्रील रूप गोस्वामी अपनी रचना को भक्तिसिद्धान्त की माधुरी के प्रतिष्ठाता सनातन गोस्वामी, तथा गोपाल भट्ट गोस्वामी श्रीरघुनाथ भट्ट गोस्वामी तथा रघुनाथदास गोस्वामी के दिव्य आस्वाद में समर्पित करते हैं। इस वाक्य से प्रतीत होता है कि महान् आचार्य श्रील जीव गोस्वामी भक्तिरसामृत सिन्धु के रचनाकाल तक प्रसिद्ध नहीं हुए थे। इति भक्तिरसामृतसिन्धौ रसोपयोगिस्थायिभावोपपादनो नाम पूर्वो विभागः ॥१॥ इति भक्तिवेदान्तभाष्ये पूर्वो विभागः ॥१॥

अथ दक्षिणो विभागः सामान्य भगवद्भक्तिरस

अध्याय २० रस भक्तिरसामृतसिन्धु के इस द्वितीय विभाग के प्रारम्भ में ग्रन्थकार 'श्रीसनातन' की सादर वन्दना करते हैं। इससे उन्होंने अपने आराध्यदेव श्रीकृष्ण तथा अपने अग्रज और गुरु सनातन गोस्वामी, दोनों का स्मरण किया है। उन्होंने श्रीकृष्ण को 'सनातन' कहकर उनकी वन्दना की है, क्योंकि वे स्वरूपतः परम सौन्दर्य मूर्ति हैं और अघासुर का नाश करने वाले हैं। इस पद से वे सनातन गोस्वामी का भी स्मरण करते हैं, जो रूप गोस्वामी के अतिशय प्रीतिपात्र हैं और उन (श्रील रूप) के द्वारा सदा सेवित हैं एवं जो सब प्रकार के पापकर्मों का अन्त करते हैं। भक्तिरसामृतसिन्धु के इस दक्षिण विभाग में रचयिता महोदय भगवद्भक्तिरस के सामान्य लक्षणों का निरूपण करना चाहते हैं। भक्तिरसामृतसिन्धु के इस विभाग में पाँच लहरियाँ हैं : १. विभाव- लहरी, २. अनुभाव लहरी, ३. सात्त्विकभाव लहरी, ४. व्यभिचारिभाव लहरी तथा ५. स्थायिभाव लहरी। भगवान् से प्रेम के आदान-प्रदान में जो दिव्य आस्वादन होता है, उसे रस कहते हैं। विविध प्रकार के रसों का मिलन होने पर दिव्य आनन्द की परम अवधि तक भक्तिरस का आस्वादन होता है। यद्यपि ऐसी स्थिति हमारे अनुभव से सर्वथा परे है, तथापि श्रील रूप गोस्वामी की अनुगति करते हुए इस प्रकरण में उसका यथाशक्ति वर्णन किया जायगा। अपनी क्रियाओं में किसी प्रकार के रस का अनुभव किए बिना कोई भी उन्हें नहीं कर सकता। इसी प्रकार कृष्णभावना और भक्तियोग के दिव्य जीवन में भी कोई रस-विशेष अवश्य है। सामान्यतः इस रस का अनुभव मन्दिर में श्रवण, कीर्तन और अर्चन करने तथा भगवत्सेवा के उन्मुख रहने से होता है। अतः जब कोई परमानन्द में निमग्न हो जाता जाता है तो समझना चाहिए कि वह रस का आस्वादन कर रहा है।