भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १७ भाव विधिभक्ति करने पर अपरा प्रकृति से परे शुद्ध सत्त्वमयी अवस्था की प्राप्ति होती है। उस समय हृदय सूर्य के समान आलोकित हो उठता है । आकाशगामी सूर्य ग्रहों से अति परे है और किसी भी मेघ द्वारा आच्छन्न नहीं हो सकता। इसी भाँति, सूर्य के समान शुद्धभक्त के अमलधवल हृदय से सूर्यज्योति से भी विशेष उज्ज्वल भावराशि विकीर्णित हो उठती है। उसी अवस्था में श्रीकृष्ण में आसक्ति पूर्णता को प्राप्त होती है। भाव से भावित हुआ भक्त स्वाभाविक रूप से भगवत्सेवा के लिए उत्कण्ठित हो उठता है और भक्ति का उत्तम अधिकारी हो जाता है। ऐसे भक्त में विषयासक्ति का कोई उद्वेग नहीं रहता, बस राधाकृष्ण के पादपद्मों की सेवा में रुचि रहती है । स्पष्टीकरण के लिए पूर्व अध्यायों में भक्ति के लक्षणों का वर्णन किया गया है। साथ में, यह भी बताया गया है कि अपनी वर्तमान इन्द्रियों के द्वारा भक्ति के साधनों का आचरण किस प्रकार किया जा सकता है, जिससे शनैः-शनैः रागानुगाभक्ति हो जाय । विधिभक्ति एवं रागानुगा- भक्ति का विवेचन भी हुआ। विधिभक्ति में दो अवान्तर भेद हैं, साधन- भक्ति और सिद्धभक्ति । सिद्ध विधिभक्ति का ही नाम 'भाव' है। इस सन्दर्भ में तन्त्रों में उल्लेख है कि भाव शुद्ध भगवत्प्रेम की प्रथम अवस्था है; उसमें रोमांच, अश्रु, आदि सात्त्विक विकार स्वल्प मात्रा में कभी-कभी प्रकट होते हैं। जब महाराज अम्बरीष को दुर्वासा ने संकट में डाल दिया तो वे भगवान् के चरणकमलों का बार-बार ध्यान करने लगे । इसी अवस्था में उनके शरीर में कतिपय विकार प्रकट हो गए और नेत्रों से अश्रुधारा झरने लगी । ये लक्षण भाव के कार्य हैं । रोमांच, अश्रुमोचन आदि के रूप में ये प्रकट होते हैं। कुछ काल तक बाह्य रूप में प्रकट रहकर ये लक्षण चित्तवृत्ति में ही आविर्भूत रहते हैं। भाव के इस अविच्छिन्न