भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु प्रवाह का नाम समाधि है। आस्वाद की यह अवस्था श्रीकृष्ण के साथ प्रेम की आदान-प्रदानरूप भावी क्रीड़ा की हेतु होती है । भाव की प्राप्ति के दो साधन हैं। एक तो निरन्तर शुद्धभक्तों का संग करना है और दूसरा साधन अतिधन्य व्यक्तियों पर होने वाली श्रीकृष्ण अथवा श्रीकृष्ण के शुद्धभक्तों की विशेष कृपा है। भाव की उप- लब्धि प्रायः शुद्धभक्तों के संग से ही होती है; श्रीकृष्ण अथवा उनके शुद्ध- भक्तों के विशेष अनुग्रह से उसकी प्राप्ति होना तो बड़ा ही दुर्लभ है । तात्पर्य यह है कि भक्तों के सत्संग में बड़ी दृढ़ता से विधिभक्ति करनी चाहिए, जिससे भाव की प्राप्ति बिल्कुल निश्चित हो जाय । यह अवश्य है कि विशेष अवसरों पर श्रीकृष्ण की असाधारण कृपा होती है। हमें सदा उसकी आशा तो करनी चाहिए, पर श्रीकृष्ण के विशेष अनुग्रह की प्रतीक्षा में हाथ पर हाथ धर कर निष्क्रिय नहीं बैठना चाहिए। विधि के कर्तव्यों का पालन अवश्य करता रहे। यह वैसा ही है जैसे कभी-कभी देखा जाता है कि जिसने कभी विद्यालय का दर्शन नहीं किया, उस को भी महापण्डित मान लिया जाता है अथवा विश्वविद्यालयों की सम्मानार्थ उपाधियों से विभूषित किया जाता है । परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि जानबूझ कर विद्यालय न जाय और यह आशा करे कि किसी विश्वविद्यालय से स्वतः डिग्री मिल जायगी। इस न्याय से विधिभक्ति का पूरी निष्ठा के साथ आचरण करना चाहिए; परन्तु साथ ही, श्रीकृष्ण अथवा उनके भक्त की कृपा के लिए उत्कण्ठित रहे । विधिभक्ति से भावप्राप्ति का एक अन्यतम उदाहरण नारदजी की वह कथा है, जिसका वर्णन व्यासदेव ने श्रीमद्भागवत में किया है। वहाँ नारदजी ने स्वयं अपने पूर्वजन्म और भावप्राप्ति की कथा सुनाई है। वे महाभागवतों की सेवा करते और उनके वार्तालाप और कीर्तन को सुनते । इस प्रकार शुद्धभक्तों के मुखारविन्द से श्रीकृष्ण की लीलाकथा और कीर्तन को सुनने का अवसर मिलने के कारण उनका हृदय इस भक्ति पर मुग्ध हो गया। वे भगवत्कथा का श्रवण करने में अतिशय रुचि लेने लगे और इस प्रकार शनैः-शनैः उनमें कृष्ण के लिए भाव उद्बुद्ध हो गया । यह भाव शुद्ध कृष्णप्रेम से पहले होता है, क्योंकि अगले ही श्लोक में नारदजी कहते हैं कि ऋषियों से श्रवण करने की क्रमिक पद्धति के द्वारा उनमें भगवत्प्रेम उदित हुआ। श्रीमद्भागवत (१.५.२८) में नारदजी कहते हैं, "वर्षाऋतु के दिन मैंने उन महात्माओं के साथ व्यतीत किए। प्रतिदिन प्रातः और संध्या को उनका हरेकृष्ण कीर्तन सुनते-सुनते शनैः-शनैः मेरा हृदय शुद्ध