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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 144, कुल 380 में से

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भाव [ ११७

हो गया। ध्यान से श्रवण करने पर रजोगुण और तमोगुण का प्रभाव जाता रहा और मैं भगवद्भक्ति में निष्ठ हो गया।" यह प्रत्यक्ष उदाहरण है कि शुद्धभक्तों का संग करने मात्र से भाव अवस्था प्राप्त हो सकती है। अतः यह आवश्यक है कि निरन्तर प्रातः-सायं हरेकृष्ण कीर्तन करने वाले शुद्धभक्तों का सदा संग करे। इससे हृदय की शुद्धि होकर कृष्णप्रेम का भाव उत्पन्न हो जायगा। इस वाक्य की पुष्टि श्रीमद्भागवत (३.२५.२५) में भी है। भगवान् कपिल कहते हैं "हे जननि ! शुद्धभक्तों के संग में मेरी भक्ति की दिव्य शक्ति की अनुभूति होती है।" अर्थात्, जब कोई शुद्धभक्त बोलता है तो उसके वाक्य श्रोताओं के हृदय पर शाश्वत् प्रभाव छोड़ जाते हैं। यही श्रवण-कीर्तन का रहस्य है। एक व्यावसायिक कथावाचक सुननेवालों के हृदय में दिव्य भाव नहीं जगा सकता; परन्तु जब भगवत्सेवनिष्ठ आत्मज्ञानी पुरुष बोलता है तो उसमें ऐसी शक्ति होती है कि श्रोताओं में भक्तिभाव का संचार कर देता है। अतः ऐसे अनन्य शुद्ध भक्तों का ही सत्संग करना चाहिए। इन पुरुषों के संग और सेवन से कनिष्ठ भक्त अवश्य भगवान् में श्रद्धा, रति और भक्ति को प्राप्त कर सकेगा। 'पद्मपुराण' में एक कनिष्ठ भक्त की कथा है, जिसने भाव अवस्था के लिए भगवत्कृपा पाने हेतु सारी रात्रि नृत्य में बिता दी। कदाचित् देखा जाता है कि भक्ति की किसी भी पद्धति का आचरण किए बिना सहसा ही भाव का उदय हो जाता है। इसका कारण भी श्रीकृष्ण अथवा उनके भक्त की विशेष कृपा होती है। श्रीकृष्ण की कृपा से सहसा फूटे भाव के तीन भेद हैं—वाचिक प्रसादज, आलोक दानज तथा हार्दिक। 'नारदीयपुराण' में वाचिक प्रसादज भाव का वर्णन है। भगवान् श्रीकृष्ण नारदजी से कहते हैं, "हे विप्रवर ! सर्वमंगलमयी एवं पूर्णानन्द से ओतप्रोत मेरी अनन्य भक्ति तुम्हें प्राप्त हो।" 'स्कन्दपुराण' में आलोक दानजनित भाव का विवरण है, "श्रीकृष्ण के अपूर्व रूप को देखकर जंगलवासी इतने अतिशय भावविभोर हो गए कि उन पर से अपनी दृष्टि नहीं हटा सके।" हार्दिक प्रसाद के सम्बन्ध में 'शुकसंहिता' में नारदजी श्रील व्यासदेव से कहते हैं, "आपके महाभागवत पुत्र (शुकदेव) उत्पन्न हुआ है, उसे बिना किसी उपाय के वह भगवत्प्रसादजनित भक्ति मिली हुई है, जो अनेक जन्मान्तरों में भी दुर्लभ रहती है।"

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