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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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११८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु श्रीकृष्णभाव के सम्बन्ध में श्रीमद्भागवत (७.४.३६) में नारदजी युधिष्ठिर महाराज से कहते हैं, “हे राजन् ! प्रह्लादजी के चरित्र का बखान करना बड़ा कठिन है; श्रीकृष्ण में उनकी नैसर्गिकी रति थी; इस लिए मैं उनका जो कुछ भी वर्णन करूँगा, वह केवल शब्दों का प्रपंच होगा। उनका वास्तविक चरित्र तो सर्वथा अनिर्वचनीय है।” स्वयं नारद जी ने स्वीकार किया कि प्रह्लाद में स्वाभाविक भाव का उदय श्रीकृष्ण का प्रसाद था। श्रीकृष्ण में प्रह्लाद की इस स्वाभाविक रति का एकमात्र कारण नारद की कृपा थी। जिस समय प्रह्लाद महाराज माँ के गर्भ में थे, तब नारदजी उनकी माता को भक्ति का सांगोपांग उपदेश कर रहे थे। साथ में, उनकी हार्दिक अभिलाषा थी कि गर्भगत बालक भक्ति के उपदेश से लाभान्वित हो। इस प्रकार भगवान् के प्रामाणिक भक्त एवं महान् पार्षद नारद के हार्दिकप्रसाद से प्रह्लाद महाराज में उत्तम भक्त के सभी गुणों एवं लक्षणों का प्रादुर्भाव हुआ। इसी का नाम नैसर्गिकी रति है, जो भगवान् श्रीकृष्ण अथवा उनके नारद जैसे महाभागवत की विशेष कृपा से होती है। स्कन्दपुराण में पर्वत मुनि नारदजी से कह रहे हैं, “हे नारदजी ! सब सन्त महर्षियों में भी आपकी महिमा का क्या कहना। आपके हार्दिक आशीर्वाद से एक अधमजाति तक वधिक महान् कृष्णभक्त बन गया है।” श्रीकृष्ण के लिए यह भाव पाँच प्रकार का माना गया है, जिनका वर्णन श्रील रूप गोस्वामी आगे करेंगे।