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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 146, कुल 380 में से

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पृष्ठ 146

अध्याय १८ भाव के लक्षण (अनुभाव) श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं कि जिसमें भाव अंकुरित हो गया है, उस पुरुष में निम्नलिखित अनुभाव पाए जाते हैं : १. वह निरन्तर अपने समय का भगवद्भक्ति में सदुपयोग करने को आतुर रहता है; निष्क्रिय नहीं बैठना चाहता। उसे दिन में चौबीस घण्टे विचलित हुए बिना सेवा की ही अभिलाषा रहती है। २. वह सदा गम्भीर और सहनशील बना रहता है। ३. वह विषयों के सब प्रकार के आकर्षणों से सदा विरक्त रहता है। ४. अपनी सेवाक्रियाओं के बदले किसी प्रकार का सांसारिक सम्मान नहीं चाहता। ५. उसे सदा यह दृढ़ आशा रहती है कि श्रीकृष्ण मुझ पर अवश्य कृपा करेंगे। ६. सदा श्रद्धाभाव से भगवत्सेवा के लिए उत्कण्ठित रहता है। ७. उसकी नामकीर्तन में सदा रुचि रहती है। ८. निरन्तर भगवान् के दिव्य गुणगान में आसक्त रहता है। ६. मथुरा, वृन्दावन, द्वारका आदि भगवान् के लीलास्थलों के वास में सदा प्रीति रखता है। अव्यर्थकालत्व भगवद्भाव को प्राप्त अनन्य भक्त अपनी वाणी को निरन्तर भगवान् से प्रार्थना करने में लगाए रखता है, मन से श्रीकृष्ण के चिन्तन में मग्न रहता है और शरीर से श्रीमूर्ति को दण्डवत् प्रणाम करता रहता है अथवा कुछ अन्य सेवा करता है। इन भावमयी क्रियाओं में कभी-कभी अश्रु भी झरने लगते हैं। इस विधि से उसका सारा का सारा जीवन भगवत्सेवा में समर्पित रहता है, क्षणभर भी किसी अन्य कार्य में व्यर्थ नहीं जाता।