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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 147, कुल 380 में से

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पृष्ठ 147

१२० ] भक्तिरसामृतसिन्धु सहिष्णुता (क्षान्ति) जो क्षोभ के नाना कारण होने पर भी क्षुब्ध नहीं होता, वह धीर- गम्भीर और सहनशील है । सहिष्णुता का उदाहरण श्रीमद्भागवत (१.१६.१५) में महाराज परीक्षित के व्यवहार में है । मरणासन्न राजा ने वहाँ उपस्थित ऋषियों से कहा था— "हे विप्रो ! आप सदा मुझे एक शरणागत जीव जानें । भगवान् श्रीकृष्ण के चरणकमलों में अपने अन्तरात्मा को अर्पित कर देने के लिए ही मैं गंगातट पर आया हूँ। अतएव मुझ पर कृपा करें, जिससे मैं माँ गंगा का भी अनुग्रहभाजन बनूँ । ब्राह्मण के शाप से मेरा नाश हो जाय, मुझे भय नहीं । मैं तो बस यही चाहता हूँ कि मेरे जीवन के अन्तिम क्षणों में आप सब पावन विष्णुनाम का गान करें जिससे मैं उनके दिव्य गुणों का साक्षात्कार कर सकूँ।" महाराज परीक्षित का यह व्यवहार—जीवन के अन्त में भी धीर बने रहना तथा चित्त की शान्ति—सहिष्णुता का प्रतीक है । जिसमें श्रीकृष्ण के भाव का उदय हो गया है, उसमें यह लक्षण प्रकट रहता है । वैराग्य इन्द्रियों को सदा विषयभोग चाहिए । परन्तु श्रीकृष्ण के दिव्य भाव का उदय हो जाने पर भक्त की इन्द्रियाँ फिर विषयवासना में रुचि नहीं लेतीं । मन की यह अवस्था विरक्ति कहलाती है । राजा भरत के चरित्र में इसका दृष्टान्त है । श्रीमद्भागवत (५.१४.४३) में उल्लेख है, "महाराज भरत का मनमधुकर श्रीकृष्ण के चरणकमलों की माधुरी में इतना अनुरक्त हो गया था कि यौवन में ही उन्होंने परिवार, पुत्र, मित्र, राज्य आदि सब दुस्त्यज्य विषयों को अस्पृश्य मल समझकर त्याग दिया ।" अस्तु, महाराज भरत वैराग्य के आदर्श हैं। उन्हें प्राकृत-जगत् के सभी सुखदायक विषय उपलब्ध थे; पर उन्होंने उन सब को ठुकरा दिया । इसका तात्पर्य यह हुआ कि वैराग्य का अर्थ कृत्रिम रूप से आसक्ति के कारणों से असंग और अलग रहना नहीं है । विषयलोभ के मध्य भी अना- सक्त भाव से रहे, यही वैराग्य है । प्रारम्भ में निस्सन्देह कनिष्ठ भक्त को सभी मोहकारी विषयों से दूर रहना चाहिए, परन्तु उत्तम भक्त की स्थिति ऐसी परिपक्व हो जाती है, विषयों के मध्य भी वह कदापि आकृष्ट नहीं होता । यह वैराग्य की यथार्थ कसौटी है । मानशून्यता सब प्रकार से उत्कृष्ट होते हुए भी भक्त का अपनी स्थिति पर