भारतकोश
संग्रह पर लौटें

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

१२० ] भक्तिरसामृतसिन्धु सहिष्णुता (क्षान्ति) जो क्षोभ के नाना कारण होने पर भी क्षुब्ध नहीं होता, वह धीर- गम्भीर और सहनशील है । सहिष्णुता का उदाहरण श्रीमद्भागवत (१.१६.१५) में महाराज परीक्षित के व्यवहार में है । मरणासन्न राजा ने वहाँ उपस्थित ऋषियों से कहा था— "हे विप्रो ! आप सदा मुझे एक शरणागत जीव जानें । भगवान् श्रीकृष्ण के चरणकमलों में अपने अन्तरात्मा को अर्पित कर देने के लिए ही मैं गंगातट पर आया हूँ। अतएव मुझ पर कृपा करें, जिससे मैं माँ गंगा का भी अनुग्रहभाजन बनूँ । ब्राह्मण के शाप से मेरा नाश हो जाय, मुझे भय नहीं । मैं तो बस यही चाहता हूँ कि मेरे जीवन के अन्तिम क्षणों में आप सब पावन विष्णुनाम का गान करें जिससे मैं उनके दिव्य गुणों का साक्षात्कार कर सकूँ।" महाराज परीक्षित का यह व्यवहार—जीवन के अन्त में भी धीर बने रहना तथा चित्त की शान्ति—सहिष्णुता का प्रतीक है । जिसमें श्रीकृष्ण के भाव का उदय हो गया है, उसमें यह लक्षण प्रकट रहता है । वैराग्य इन्द्रियों को सदा विषयभोग चाहिए । परन्तु श्रीकृष्ण के दिव्य भाव का उदय हो जाने पर भक्त की इन्द्रियाँ फिर विषयवासना में रुचि नहीं लेतीं । मन की यह अवस्था विरक्ति कहलाती है । राजा भरत के चरित्र में इसका दृष्टान्त है । श्रीमद्भागवत (५.१४.४३) में उल्लेख है, "महाराज भरत का मनमधुकर श्रीकृष्ण के चरणकमलों की माधुरी में इतना अनुरक्त हो गया था कि यौवन में ही उन्होंने परिवार, पुत्र, मित्र, राज्य आदि सब दुस्त्यज्य विषयों को अस्पृश्य मल समझकर त्याग दिया ।" अस्तु, महाराज भरत वैराग्य के आदर्श हैं। उन्हें प्राकृत-जगत् के सभी सुखदायक विषय उपलब्ध थे; पर उन्होंने उन सब को ठुकरा दिया । इसका तात्पर्य यह हुआ कि वैराग्य का अर्थ कृत्रिम रूप से आसक्ति के कारणों से असंग और अलग रहना नहीं है । विषयलोभ के मध्य भी अना- सक्त भाव से रहे, यही वैराग्य है । प्रारम्भ में निस्सन्देह कनिष्ठ भक्त को सभी मोहकारी विषयों से दूर रहना चाहिए, परन्तु उत्तम भक्त की स्थिति ऐसी परिपक्व हो जाती है, विषयों के मध्य भी वह कदापि आकृष्ट नहीं होता । यह वैराग्य की यथार्थ कसौटी है । मानशून्यता सब प्रकार से उत्कृष्ट होते हुए भी भक्त का अपनी स्थिति पर

भाव के लक्षण (अनुभाव) [ १२१ अभिमान न करना मानशून्यता है। पद्मपुराण में उल्लेख है कि चक्रवर्ती सम्राट् भगीरथ में श्रीकृष्ण के लिए ऐसे अतिशय भाव का उदय हुआ कि वे अपने शत्रुओं के राज्य में भिक्षा माँगते हुए दीनभाव से चाण्डालों तक को नमस्कार करने लगे। इतिहास में भक्तों के ऐसे बहुत से उदाहरण हैं। केवल दो सौ वर्ष पहले कलकत्ते का लालबाबू नामक बहुत बड़ा जमींदार वैष्णव हो गया और वृन्दावन में वास करने लगा। वह घर-घर जाकर, यहाँ तक कि अपने पूर्व के शत्रुओं के घर भी भिक्षा माँगता। भिक्षुक को सब प्रकार का अपमान सहना पड़ता है। यह स्वाभाविक है। परन्तु श्रीकृष्ण के लिए इन अपमानों को सहन करना चाहिए। कृष्णभक्त श्रीकृष्ण ही सेवा के लिए तुच्छ से तुच्छ पद भी ग्रहण करने में संकोच नहीं करता। आशाबन्ध भगवान् की कृपा अवश्य होगी—यह दृढ़ विश्वास आशाबन्ध कहलाता है। भक्त की निरन्तर यही भावना रहती है—“मैं विधिभक्ति के लिए प्राणपण से यत्नशील हूँ; इसलिए भगवान् को फिर से अवश्य प्राप्त हो जाऊँगा।” इस सन्दर्भ में श्रीमत् सनातन गोस्वामी की एक प्रार्थना से आशाबन्ध का स्वरूप स्पष्ट हो जाता है। वे कहते हैं, “मुझमें न कृष्णप्रेम है और न कृष्णप्रेम के श्रवण, कीर्तन आदि साधनों में ही मेरी प्रीति है तथा जिस भक्तियोग के द्वारा निरन्तर श्रीकृष्ण का चिन्तन करते हुए हृदय उन्हीं के चरणकमलों में एकाग्र रहता है, उसका भी मुझ में अभाव है। मेरे लिए ज्ञान अथवा शुभ कर्म की भी कोई सम्भावना नहीं है। इसलिए हे गोपीजनवल्लभ श्रीकृष्ण मैं तो बस आपके सामने रुदन (प्रार्थना) ही कर सकता हूँ। मेरी एकमात्र अभिलाषा है कि जिस किसी प्रकार आपके चरणकमलों की मुझे प्राप्ति हो जाय। यह इच्छा मुझे व्यथित कर रही है, क्योंकि जीवन को उस दिव्य लक्ष्य की प्राप्ति के मैं सर्वथा अयोग्य समझता हूँ।” तात्पर्य यह है कि घोर निराशा में भी यह आशा बनाए रखनी चाहिए कि जैसे- तैसे भगवान् के चरणसरोज की प्राप्ति तो मुझे हो ही जायगी।” समुत्कण्ठा भक्तियोग में सिद्धि-लाभ के लिए अतिशय लुब्धता का नाम समुत्कण्ठा है। भक्ति के लिए पूर्ण लोभ होना आवश्यक है। वास्तव में यह लोभ

१२२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु ही कृष्णभावना में सफलता प्राप्ति का मूल्य है। किसी भी वस्तु की उपलब्धि उसका मूल्य देने पर ही होती है। वैदिक शास्त्रों में उल्लेख है कि परम मूल्यवान् वस्तु—कृष्णभावना को खरीदने के लिए अर्थात् सिद्धि-लाभ के हेतु प्रगाढ़ उत्कण्ठा को उदित करना होगा। बिल्वमंगल ठाकुर ने स्वरचित कृष्णकर्णामृत में उत्कण्ठा का अत्यन्त सजीव सुन्दर चित्रांकन किया है। वे कहते हैं, “मेरे नेत्र व्रजकिशोर की काली भौंहों से परिवेष्टित, कमलदल के समान सघन और उन्नत नेत्रों से युक्त, अनुरागभरी और चंचलतामयी दृष्टि से भक्तों को निहारती हुई, मृदु वचनों में आर्द्रता ओतप्रोत, अधरामृत पर रक्तवर्ण और मधुर वंशीरव में अलौकिक मदभरी जगत् को मोहित करने वाली मूर्ति को वृन्दावन में देखने को आतुर हैं।” नामगान में सदा रुचि कृष्णकर्णामृत में ही सखी राधारानी का यह वर्णन सुनाती है, “हे गोविन्द ! अपने नयनकमलों से अश्रुबिन्दुरूपी मकरन्द को निस्यन्दित करती हुई वृषभानुनन्दिनी बाला आज आप की नामावली को मधुरस्वर से गा रही है ।” भगवान् के दिव्य गुणों का गान भगवान् के गुणगान में आसक्ति का वर्णन कर्णामृत में इस प्रकार है—“ओह ! मन्मथ-मथन श्रीकृष्ण का माधुर्य से भी अधिक मधुर और चापल्य से भी अधिक चपल अनिर्वचनीय कैशोर बलात् मन को हरण किए जा रहा है। अरे ! मैं क्या करूँ ?” श्रीकृष्ण के लीलास्थलों में प्रीति श्रील रूप गोस्वामी की पद्यावली में वृन्दावन का यह विवरण है, “यहाँ पर नन्दमहाराज के घर नन्दनन्दन रहते थे; यहाँ श्रीकृष्ण ने उस शकट का भंजन किया जिसमें शकटासुर छिपा हुआ था और यहाँ भव- बन्धन से मुक्तिदाता दामोदर को यशोदा मैया ने रस्सी से बाँधा था।” श्रीकृष्ण का शुद्धभक्त मथुरामण्डल अथवा वृन्दावन में वास करता हुआ श्रीकृष्ण की सारी लीलास्थलियों का दर्शन करता है। इन परम पावन स्थलों पर श्रीकृष्ण ने ग्वालबाल और यशोदा मैया के साथ भाँति- भाँति की लीलायें की थीं। कृष्णभक्तों में इन स्थानों की परिक्रमा करने की परिपाटी अद्यावधि प्रचलित है और मथुरा-वृन्दावन को जाने वाले

भाव के लक्षण (अनुभाव) [ १२३ सदा दिव्य आनन्द का आस्वादन करते हैं। वस्तुतः यदि कोई वृन्दावन जाय तो तत्काल श्रीकृष्ण के विरहसागर में डूब जायगा, क्योंकि अपने अवतरणकाल में उन्होंने वहाँ कैसे अद्भुत लीलारस का परिवेषण किया था। श्रीकृष्ण के लीला-स्मरण में ऐसी रति वास्तव में कृष्णरति ही है। परन्तु बहुत से ऐसे निर्विशेषवादी और योगी हैं जो बाह्य रूप से भक्ति तो करते हैं, पर उसके द्वारा अन्त में भगवान् में लीन हो जाना चाहते हैं। कदाचित् वे श्रीकृष्ण के लीलास्थलों को जाने सम्बन्धी शुद्धभक्तों में भाव का अनुकरण भी करते पाये जाते हैं। फिर भी उनकी क्रियाओं को रति नहीं माना जा सकता है, क्योंकि वे यह सब केवल सायुज्य मुक्ति के लिए करते हैं। श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं श्रीकृष्ण के लिए शुद्धभक्तों में प्रकट होने वाली रति कर्मियों और ज्ञानियों के हृदय में सिद्ध नहीं हो सकती। वास्तव में शुद्धकृष्णभावना में होने वाली यह रति बड़ी दुर्लभ है, मुक्तजन भी इसे खोजते फिरते हैं। जैसा भगवद्गीता का सिद्धान्त है, भवबन्धन से मुक्ति होना वह अवस्था है, जब भक्ति की उपलब्धि हो सकती है। जो केवल मुक्त होकर ब्रह्मज्योति में लीन होना चाहता है, उसके लिए कृष्ण- रति की प्राप्ति असम्भव है। श्रीकृष्ण इस रति को अतिशय छिपाकर रखते हैं और केवल शुद्धभक्तों को देते हैं। साधारण भक्त भी शुद्ध कृष्णरति नहीं पा सकते। फिर मुक्ति और भुक्ति की कामना से दूषित हृदय वाले सकामकर्मी और ज्ञानियों को तो भगवान् की वह रति कैसे मिल सकती है। बहुत से नाममात्र के भक्त श्रीकृष्ण की अष्टकालिक लीला का ध्यान करते हैं। ऐसे लोगों का मिथ्या अनुकरण करते हुए कभी-कभी अन्य व्यक्ति भी यह दम्भ करने लगते हैं कि श्रीकृष्ण बालरूप में उनसे बोल रहे हैं अथवा राधाकृष्ण दोनों आकर उनसे वार्तालाप कर रहे हैं। निर्विशेष- वादी भी इन लक्षणों का कपट करके उन भोले-भाले लोगों को मोह लेते हैं जिन्हें भक्तिविद्या का ज्ञान नहीं होता। परन्तु अनुभवी भक्त तो इन सब विकृतियों को देखते ही समझ जाता है कि यह केवल कपट-व्यापार है। ऐसे कपटी में जो रति दृष्टिगोचर होती है, वह रत्याभास है, यथार्थ रति नहीं। रत्याभास वाले कपटी के लिए यह आशा अवश्य है कि काला- न्तर में कभी वह शुद्धभक्ति के स्तर पर आरूढ़ हो सकता है। इस अनुकृत रति के दो भेद हैं—रत्याभास और परा रति। यदि कोई विधिभक्ति के आचरण अथवा सद्गुरु के मार्गदर्शन के बिना ऐसी

१२४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु अनुकृत रति दिखाये, तो उसे रत्याभास कहते हैं। कभी-कभी भोग के अभि- लाषी को भी दैवात् भगवन्नाम के कीर्तन परायण शुद्धभक्तों के सत्संग का अवसर मिलता है । भगवान् की कृपा से ऐसा व्यक्ति भी कीर्तन में सम्मि- लित हो सकता है। तब शुद्धभक्तों के हृदयाकाश में स्थित भावचन्द्रिका की छाया उस पर भी पड़ती है; तथा शुद्धभक्तों के प्रभाव से उसमें कुतूहलमयी चंचल रति की छाया सी उदित होती। जब इस रत्याभास से सम्पूर्ण प्राकृत दुःख दूर हो जाते हैं तो उसे परा रति कहते हैं। उपरोक्त रत्याभास अथवा परारति का उदय शुद्धभक्तों के सत्संग अथवा वृन्दावन-मथुरा आदि तीर्थ स्थानों की यात्रा से हुआ करता है। जो भाग्यवान् इस कृष्णरति को पा कर शुद्धभक्तों के संग में भक्ति-साधन करता है, वह भी शुद्धभक्ति कर सकता है। निष्कर्ष यह है कि परारति इतनी शक्तिशाली है कि यदि किसी साधारण मनुष्यों में इस का आभास भी हो, तो वह शुद्धभक्तों के संग से संसिद्धि-लाभ कर सकता है। शुद्धभक्तों के सत्संग रूपी पर्याप्त प्रसाद के बिना श्रीकृष्ण के लिए ऐसी रति अथवा भाव का उदय नहीं हो सकता। जैसे शुद्धभक्तों के सत्संग से रति का उदय होता है, वैसे ही शुद्ध- भक्तों के चरणकमलों का अपराध करने से रति का अभाव भी हो सकता है। अर्थात्, शुद्धभक्तों के संग से कृष्णरति उद्बुद्ध हो सकती है और यदि शुद्धभक्तों के चरणों का अपराध हो जाय तो रत्याभास अथवा परा रति का क्षय भी हो सकता है, उसी प्रकार जैसे पूर्ण चन्द्रमा क्रमशः क्षीण होकर अन्धकार में विलीन हो जाता है। अतः शुद्धभक्तों का संग करते हुए यह निरन्तर ध्यान रखना चाहिए कि उनके चरणों का अपराध न बन बैठे । शुद्धभक्तों के अपराध के अनुपात में रत्याभाव अथवा परारति का क्षय होता जाता है। यदि अपराध बहुत गम्भीर हो तो रति बिलकुल न्यून हो जाती है और यदि गम्भीर न हो तो रति की श्रेणी मध्यम अथवा कनिष्ठ हो जाती है। मोक्ष अथवा ब्रह्मज्योति में लीन होने के अभिलाषी का भाव या तो शनैः शनैः भावाभास को प्राप्त हो जाता है अथवा अहंग्रहोपासना में परि- वर्तित हो जाता है, जिससे जीव अपने को परमेश्वर से अभिन्न समझने लगता है। आत्मसाक्षात्कार की इस अवस्था का नाम अद्वैतवाद है। अद्वैत- वादी के मत में उसमें और परमेश्वर में भेद नहीं है; अतः वह समझता है कि अपनी उपासना से पूर्ण परतत्त्व की उपासना हो जाती है। कभी-कभी कोई कनिष्ठ भक्त बड़े उत्साह से श्रवण-कीर्तन और

भाव के लक्षण (अनुभाव) [ १२५

नृत्य में भाग लेता हुआ पाया जाता है; परन्तु उसके हृदय की धारणा यही रहती है कि मैं परमब्रह्म से एक हो गया हूँ। यह अद्वैत धारणा शुद्धभक्ति से बिल्कुल भिन्न है। जिसके भीतर विधि-साधन किए बिना ही अकस्मात् भाव दिखाई देने लगता है, उसने पूर्वजन्म में भक्ति का साधन किया था, ऐसा समझना चाहिए। किसी विघ्नवश, प्रायः भक्त-अपराध के कारण वह कुछकाल के लिए प्रतिहत-शक्ति हो गया होगा। अब फिर अवसर आने पर प्रकट हो गया है। निष्कर्ष यह है कि शुद्धभक्तों के संग से ही भक्तिपथ पर उत्तरोत्तर अग्रसर हुआ जा सकता है। लोकोत्तर चमत्कारकारी और सब शक्तियों को प्रदान करने वाले भाव की प्राप्ति श्रीकृष्णकी अहैतुकी कृपा से ही होती है। जिस पुरुष में भाव का उदय हो गया है और जो विषयों से पूर्णतः विरक्त हो गया है, उसमें यदि भक्ति के आदर्श के विरुद्ध कोई विगुणता पाई जाय तो भी उससे द्वेष न करे। भगवद्गीता में प्रमाण है कि जिसकी भगवान् में अनन्य श्रद्धा- भक्ति है, वह यदि कभी अकस्मात् शुद्धभक्ति के लक्षणों से गिर भी जाय, तो भी उसे शुद्ध ही समझना चाहिए। भक्ति, भगवान् और गुरु में अनन्य श्रद्धालु पुरुष भक्ति की क्रियाओं में उच्च स्थान पाता है। 'नृसिंहपुराण' का वाक्य है "जो मन, वाणी और शरीर से अनन्य भाव के साथ भगवान् की सेवा के परायण है, वह यदि बाह्य रूप से मलिन क्रियाओं में प्रवृत्त दिखाई दे, तो भी उसकी बलवती भक्ति के प्रभाव से ऐसी दूषित क्रियायें अति शीघ्र समाप्त हो जायेंगी।" पूर्ण चन्द्र पर कुछ काले धब्बे दिखाई देते हैं, फिर भी पूर्ण चन्द्रमा की ज्योत्स्ना प्रतिहत नहीं होती। इसी प्रकार, भक्ति के भण्डार के सामने छोटी सी भूल भूल नहीं समझी जाती। कृष्णरति दिव्य आनन्दरूपा और आह्लादिनी है। अनन्त दिव्य आह्लाद के बीच छोटे प्राकृत दोष का कुछ भी प्रभाव नहीं होता।

अध्याय १६ प्रेमभक्ति जब अपने विशेष सम्बन्ध में श्रीकृष्ण की प्रीति का भाव अतिशय तीव्र हो जाता है तो उसे शुद्ध प्रेम कहते हैं। प्रारम्भ में भक्त गुरु-आज्ञा के अनुसार विधिभक्ति में तत्पर रहता है। फिर इस साधन के द्वारा सम्पूर्ण प्राकृत विकारों से पूर्ण शुद्ध हो जाने पर भक्ति में रुचि और आसक्ति का उदय होता है। यही रुचि और आसक्ति शनैः-शनैः तीव्र होकर कालान्तर में 'प्रेम' का रूप धरती है। 'प्रेम' शब्द का प्रयोग वास्तव में केवल भगवान् के सम्बन्ध में ही हो सकता है प्राकृत-जगत् में तो प्रेम का प्रश्न ही नहीं बनता । वहाँ जिसे भ्रमपूर्वक प्रेम समझा जाता है वह केवल काम है। प्रेम और काम में स्वर्ण और लोहे का सा भेद है। 'नारदपंचरात्र' में स्पष्ट उल्लेख है कि जब काम और ममता पूर्ण रूप से भगवान् में होते हैं, उस भक्ति को ही भीष्म, प्रह्लाद, उद्धव और नारद आदि आचार्यों ने प्रेम कहा है। भीष्म जैसे महाभागवतों ने अन्य सभी व्यक्तियों में ममता त्याग देने को भगवत्प्रेम बताया है। उनके अनुसार, अन्य सब से सम्बन्ध-विच्छेद करके केवल एक ही पुरुष (भगवान्) में अपने सम्पूर्ण ममत्व को स्थापित कर देना प्रेम है। वह प्रेम भाव से उत्पन्न और भगवान् की अहैतुकी कृपा से उत्पन्न, ऐसे दो प्रकार का होता है। भावोत्थ सद्गुरु के मार्गदर्शन में शास्त्रों में वर्णित विधिभक्ति करने मात्र से भावोत्थ प्रेम हो जाता है। विधिभक्ति से उत्पन्न भाव से हुई प्रेमभक्ति का उदाहरण श्रीमद्भागवत (११.२.४०) में इस प्रकार है, “विधिभक्ति करते-करते भक्त अपनी स्वाभाविक कृष्णभावना को प्राप्त हो जाता है। नामकीर्तन का अनुरागी और द्रवीभूत चित्त होकर वह कभी हँसता है, कभी रोने लगता है, कभी चिल्लाता है, कभी गाता है और कभी लोक- लज्जा के बिना उन्मत्त की भाँति नाच उठता है।”

प्रेमभक्ति [ १२७ पद्मपुराण में रागानुगाभक्ति से उत्पन्न भाव द्वारा हुए प्रेम का दृष्टान्त है। चन्द्रकांति नामक सुमुखी ने श्रीकृष्ण को पतिरूप में पाने के लिए कठोरता से ब्रह्मचर्यव्रत रखा। वह निरन्तर उन्हीं की दिव्य मूर्ति के ध्यान और कीर्तन में तन्मय रहती। श्रीकृष्ण से भिन्न किसी अन्य को पतिरूप में वरण न करने का उसका दृढ़ निश्चय था। भगवान् की अशेष-विशेष कृपा से उत्पन्न प्रेम जब कोई प्रेमभाव सहित निरन्तर भगवान् के संग में रहता है तो यह समझना चाहिए कि अपनी अहैतुकी विलक्षण कृपा से प्रेरित होकर भगवान् ने स्वयं उसे इस अवस्था का दान किया है। ऐसी विलक्षण कृपा का उदाहरण श्रीमद्भागवत (११.१२.७) में है। भगवान् श्रीकृष्ण उद्धव से कहते हैं, “वृन्दावन में गोपियों ने मेरी प्राप्ति के लिए न वेदों का स्वाध्याय किया, न तीर्थाटन किया, न किसी विधि-विधान अथवा तप का आचरण किया। केवल मेरे सत्संग से ही उन्हें भक्ति की परम संसिद्धि प्राप्त हो गयी।” पद्मपुराण में चन्द्रकान्ति और श्रीमद्भागवत में गोपियों के उदाहरण से प्रतीत होता है कि जो भक्त अपनी परिस्थिति की चिन्ता किए बिना नित्य-निरन्तर श्रीकृष्ण का चिन्तन करता है और प्रेमभाव से उनकी कीर्ति का गान करता है, वह भगवान् श्रीकृष्ण की अति कृपा के फलस्वरूप अनन्य भक्ति की परम संसिद्धि को प्राप्त हो जायगा। यह स्वयं श्रीमद्- भागवत से प्रमाणित है, “जो भगवान् हरि को उपासता, भजता और प्रेम करता है, वह तप, त्याग आदि स्वरूप-साक्षात्कार के सभी साधनों को कर चुका है। दूसरी ओर, यदि सब प्रकार के तप, त्याग और योग करने पर भी हृदय में हरि के लिए ऐसा प्रेम नहीं होता तो सारा साधन समय का अपव्यय मात्र है। जो निरन्तर बाहर-भीतर श्रीकृष्ण को देखता है, उसने स्वरूप-साक्षात्कार के सब तप-त्याग का उल्लंघन कर लिया है और यदि सब प्रकार का तप-त्याग करने से बाद भी श्रीकृष्ण का भीतर-बाहर दर्शन न हो तो सब साधन निष्फल है।” श्रीकृष्ण की अति कृपा से उदित प्रेम दो प्रकार का होता है— १. भगवान् के माहात्म्य ज्ञान से युक्त तथा २. किसी बाह्य हेतु के बिना श्रीकृष्ण में स्वतः अनुरक्त हो जाना। ‘नारदपंचरात्र’ में कहा है कि यदि भगवान् के माहात्म्य-ज्ञान के कारण भगवान् में अतिशय स्नेह और अचल प्रेम हो जाय तो चार प्रकार की वैष्णव मुक्तियों (सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य और सार्ष्टि) की प्राप्ति निश्चित है। वैष्णव मुक्ति उस मायावादी

१२८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु मुक्ति से सर्वथा भिन्न है, जिसमें जीव भगवान् की ब्रह्मज्योति में लीन हो जाता है। 'नारदपंचरात्र' में शुद्ध अनन्य भक्ति को स्वार्थवासना से शून्य कहा गया है। भक्त का भगवान् के विषय में अन्य अभिप्राय से रहित निरन्तर प्रेममयी मनोवृत्ति बनाए रखना ही भगवान् को वश में करने वाली भक्ति है। अर्थात्, जो निरन्तर भगवान् श्रीकृष्ण के रूप का चिन्तन करता है, वह शुद्ध वैष्णव है। महिमाज्ञानयुक्त प्रभुप्रसाद प्रायः विधिमार्ग का अनुसरण करने वालो को होता है और रागानुगाभक्ति के अनुगामियों को प्रायः माहात्म्य ज्ञान रहित हेतुरहित भगवत्प्रसाद प्राप्त होता है। विधिभक्ति के द्वारा भगवत्कृपा को प्राप्त हुआ भक्त भगवान् की असमोर्ध्व महिमा, दिव्य रूप- माधुरी और रागानुगाभक्ति की ओर भी आकृष्ट हो सकता है। अर्थात्, विधिभक्ति के आचरण से वह भगवान् की दिव्य रूपमाधुरी का पूर्ण रूप से आस्वादन करने के योग्य हो जाता है। उपरोक्त दोनों ही प्रकार की उत्कृष्ट अवस्थायों की प्राप्ति केवल भक्त पर भगवान् की अति कृपा से सम्भव है। शुद्धभक्तों का सत्संग यद्यपि यहाँ तक प्रेम-प्राप्ति की नाना पद्धतियों का उल्लेख हो चुका है, श्रीरूप गोस्वामी अब इस दिव्य अवस्था को पाने की सामान्य प्रक्रिया का वर्णन करते हैं। प्रेमभक्ति का प्रारम्भ मूल रूप से श्रद्धा है। शुद्धभक्तों के बहुत से संघ और सत्संग हैं। यदि कोई लेशमात्र श्रद्धा के साथ इन संघों का संग करने लगे तो शुद्धभक्ति के मार्ग पर द्रुतगति से अग्रसर होगा। शुद्धभक्त का प्रभाव इतना अतिशय होता है कि यदि कोई अल्प श्रद्धा से भी उसका संग करने आए तो भगवद्गीता, श्रीमद्भागवत, आदि प्रामाणिक शास्त्रों से भगवत्कथा सुनने को मिलेगी। इस प्रकार अन्तर्यामी भगवान् की कृपा से उपरोक्त शास्त्रों में उसकी श्रद्धा दृढ़ होती जायगी। शुद्धभक्तों के सत्संग की यह पहली अवस्था है। फिर अधिक उन्नत और परिपक्व हो जाने पर शुद्धभक्त के आश्रय में विधि भक्ति का आचरण करने के लिए वह स्वतः आत्मसमर्पण करके उन्हें गुरु बना लेता है। इसके बाद, तीसरी अवस्था में गुरुदेव के मार्गदर्शन में वह विधिभक्ति का आचरण करता है और परिणामस्वरूप सम्पूर्ण अनर्थों से मुक्त हो जाता है। अनर्थ- निवृत्ति होने पर उसमें निष्ठा उत्पन्न होती है और फिर क्रमशः भक्ति में

प्रेमभक्ति [ १२६ रुचि, आसक्ति, भाव का तथा अन्त में प्रेम का उदय होता है। शुद्ध भगवत्प्रेम के उद्बोधन की ये भिन्न-भिन्न अवस्थायें हैं। जिस परम सौभाग्यशाली के चित्त में यह अपूर्व प्रेमरूप दिनमणि उदित होता है, उसकी मुद्रा को भलीभाँति समझने में विद्वान् भी असफल रहते हैं। इसीलिए भगवान् शिव ने 'नारदपंचरात्र' में पार्वती से कहा है— “हे महेश्वरी ! भगवान् हरि के प्रेम में मत्त होकर परमानन्द में निमग्न हुए पुरुष को शरीर और मन के सुख-दुःख को कुछ भी अनुभव नहीं होता।" स्नेह आदि प्रेम के व्यवहार प्रेमरूप मूल वृक्ष के ही शाखारूप विलास हैं। इनका प्रकाश भी नाना भाँति से होता है; अतः इन भेदों का विशद विवेचन यहाँ नहीं किया गया। इनका वर्णन श्रील सनातन गोस्वामी ने भागवतामृत में किया है। यद्यपि स्नेह आदि प्रेम के विलासों का विषय अतिशय गूढ़ है, तथापि सनातन गोस्वामी ने इन्हें भली प्रकार से स्पष्ट कर दिया है। इस प्रकार भक्तिरसामृतसिन्धु के पूर्व विभाग का समापन करते हुए श्रील रूप गोस्वामी अपनी रचना को भक्तिसिद्धान्त की माधुरी के प्रतिष्ठाता सनातन गोस्वामी, तथा गोपाल भट्ट गोस्वामी श्रीरघुनाथ भट्ट गोस्वामी तथा रघुनाथदास गोस्वामी के दिव्य आस्वाद में समर्पित करते हैं। इस वाक्य से प्रतीत होता है कि महान् आचार्य श्रील जीव गोस्वामी भक्तिरसामृत सिन्धु के रचनाकाल तक प्रसिद्ध नहीं हुए थे। इति भक्तिरसामृतसिन्धौ रसोपयोगिस्थायिभावोपपादनो नाम पूर्वो विभागः ॥१॥ इति भक्तिवेदान्तभाष्ये पूर्वो विभागः ॥१॥

अथ दक्षिणो विभागः सामान्य भगवद्भक्तिरस

अध्याय २० रस भक्तिरसामृतसिन्धु के इस द्वितीय विभाग के प्रारम्भ में ग्रन्थकार 'श्रीसनातन' की सादर वन्दना करते हैं। इससे उन्होंने अपने आराध्यदेव श्रीकृष्ण तथा अपने अग्रज और गुरु सनातन गोस्वामी, दोनों का स्मरण किया है। उन्होंने श्रीकृष्ण को 'सनातन' कहकर उनकी वन्दना की है, क्योंकि वे स्वरूपतः परम सौन्दर्य मूर्ति हैं और अघासुर का नाश करने वाले हैं। इस पद से वे सनातन गोस्वामी का भी स्मरण करते हैं, जो रूप गोस्वामी के अतिशय प्रीतिपात्र हैं और उन (श्रील रूप) के द्वारा सदा सेवित हैं एवं जो सब प्रकार के पापकर्मों का अन्त करते हैं। भक्तिरसामृतसिन्धु के इस दक्षिण विभाग में रचयिता महोदय भगवद्भक्तिरस के सामान्य लक्षणों का निरूपण करना चाहते हैं। भक्तिरसामृतसिन्धु के इस विभाग में पाँच लहरियाँ हैं : १. विभाव- लहरी, २. अनुभाव लहरी, ३. सात्त्विकभाव लहरी, ४. व्यभिचारिभाव लहरी तथा ५. स्थायिभाव लहरी। भगवान् से प्रेम के आदान-प्रदान में जो दिव्य आस्वादन होता है, उसे रस कहते हैं। विविध प्रकार के रसों का मिलन होने पर दिव्य आनन्द की परम अवधि तक भक्तिरस का आस्वादन होता है। यद्यपि ऐसी स्थिति हमारे अनुभव से सर्वथा परे है, तथापि श्रील रूप गोस्वामी की अनुगति करते हुए इस प्रकरण में उसका यथाशक्ति वर्णन किया जायगा। अपनी क्रियाओं में किसी प्रकार के रस का अनुभव किए बिना कोई भी उन्हें नहीं कर सकता। इसी प्रकार कृष्णभावना और भक्तियोग के दिव्य जीवन में भी कोई रस-विशेष अवश्य है। सामान्यतः इस रस का अनुभव मन्दिर में श्रवण, कीर्तन और अर्चन करने तथा भगवत्सेवा के उन्मुख रहने से होता है। अतः जब कोई परमानन्द में निमग्न हो जाता जाता है तो समझना चाहिए कि वह रस का आस्वादन कर रहा है।

१३२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु अधिक स्पष्टतः, भक्तियोग के आचरण से उत्पन्न होने वाली आनन्द की विविध अनुभूतियों को 'भक्तिरस' की संज्ञा दी जा सकती है। भक्तियोग के रस का यह आस्वादन सब कोटि के मनुष्यों को नहीं हो सकता, क्योंकि इस मधुर प्रेममय वृत्ति की उद्भावना पूर्वजन्म के संस्कार से अथवा शुद्धभक्तों के सत्संग से ही होती है। पूर्ववर्णन के अनुसार, शुद्ध- भक्तों के सत्संग से ही भक्तियोग में श्रद्धा का श्रीगणेश होता है। किसी शुद्धभक्त के आश्रय में इस श्रद्धा को बढ़ाने पर या पूर्वजन्म के भक्ति-संस्कारों के कारण ही वास्तव में भक्तिरस का आस्वादन होता है। दूसरे शब्दों में, इस परमानन्द की उपलब्धि साधारण जनों को नहीं हो सकती; वे दुर्लभ भाग्यवाले ही इसका आस्वादन कर पाते हैं जो भक्तों के संगी हों अथवा पूर्वजन्म से भक्तियोग का अभ्यास करते आ रहे हों। भक्तियोग की शनैः-शनैः प्राप्ति के पथ का वर्णन श्रीमद्भागवत, प्रथम स्कन्ध में है, “इस पथ का आरम्भ उन भक्तों के संग में कृष्णकथा सुनने से होता है, जो स्वयं सत्संग के द्वारा हृदय की निर्मलता को प्राप्त हो गए हों। दिव्य भगवच्चरित की कथा का श्रोता निरन्तर परमानन्द में निमग्न रहता है।” भगवद्गीता में भी उल्लेख है कि वास्तव में ब्रह्मभूत हुए पुरुष का पहला लक्षण यह है कि वह सदा प्रसन्न रहता है। इस आनन्दमय जीवन की उपलब्धि भगवद्गीता या श्रीमद्भागवत का श्रवण करने से होती है अथवा उन पुरुषों का सत्संग करने से होती है, जो कृष्णभावना के दिव्य जीवन में बड़ी रुचि रखते हैं, विशेष रूप से वे जो श्रीकृष्ण (गोविन्द) के चरणकमलों की प्रेममयी सेवा के परायण रहकर उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए कृतसंकल्प हैं। इस भाव से उत्साहित होकर जो सदा भगवान् की प्रसन्नता का विधान करनेवाली विधिभक्ति के परायण रहता है, उसमें 'आलम्बन' और 'उद्दीपन' नामक दो प्रकार के विभाव का उदय होता है। इस प्रकार वह परमानन्द में निमज्जित हो जाता है। इस प्रेम-विभाव के सात हेतु हैं, जैसे स्वयं श्रीकृष्ण, कृष्णभक्त, कृष्ण का मुरलीनाद इत्यादि। इनका कार्य कभी स्मित होता है तो कभी स्तब्धता। भाव में शरीर पर आठ सात्त्विक लक्षण प्रकट होते हैं। वे सब पूर्वोक्त पाँच प्रकार के भाव-भेदों के मिश्रण से ही सम्भव होते हैं। इन पाँच प्रकार के भावों के किसी-न-किसी मिश्रण के बिना रसास्वादन नहीं हो सकता। रस के आस्वादन के जो कारण हैं, वे विभाव कहलाते विभाव के दो भेद हैं—आलम्बन और उद्दीपन। 'अग्निपुराण' में विभाव

रस [ १३३ का वर्णन इस प्रकार है—"रति आदि की जिससे उत्पत्ति होती है, वह विभाव-आलम्बन और उद्दीपन—ऐसे दो प्रकार का होता है। अर्थात्, विभाव के दो भेद हैं। कृष्ण और उनके भक्त भक्तिरस के आलम्बन विभाव हैं। श्रीकृष्ण भक्ति के विषय-आलम्बन हैं और उनका शुद्धभक्त आश्रय- आलम्बन है। किसी वस्तु को देखकर होने वाले कृष्णस्मरण से उत्पन्न विभाव उद्दीपन कहा जाता है।" भगवान् श्रीकृष्ण, जो अचिन्त्य शक्तियों और ज्ञान, आनन्द, आदि सम्पूर्ण महागुणों के नित्य निधान हैं, वे ही भक्तिरस के आलम्बन कारण हैं। अपने अन्य रूपों और सब अवतारों से वे भक्तिरस के उद्दीपन भी बन जाते हैं। श्रीमद्भागवत में ब्रह्मविमोहनलीला के संदर्भ में एक वाक्य है जिससे भक्तिरस के इस उद्दीपनरूप का स्पष्टीकरण होता है। जब ब्रह्मा को मोहित करने के लिए भगवान् श्रीकृष्ण ने स्वयं सब गोपबालकों, गायों और गोवत्सों का रूप धारण कर लिया तो श्रीकृष्ण के अग्रज श्रीबलदेव (जो श्रीकृष्ण के स्वयंप्रकाश हैं) विस्मित होकर कहने लगे—"अहो ! यह कैसा आश्चर्य है कि इन सब गोपबालकों, गोवत्सों और गायों के प्रति मेरा कृष्णप्रेम उमड़ रहा है।" इसका निश्चय न कर सकने के कारण बलदेव विस्मय से स्तब्ध हो गए। यह एक उदाहरण है, जब श्रीकृष्ण उद्दीपन पक्ष से भक्तिरस के आश्रय-आलम्बन और विषय-आलम्बन दोनों बन जाते हैं।

अध्याय २१ श्रीकृष्ण के दिव्य गुण श्रीकृष्ण स्वरूप आवृत और प्रकट, दो प्रकार का है। जब श्रीकृष्ण अन्य वेष आदि में छिपे हैं तो उनका स्वरूप आवृत कहलाता है। श्रीमद्भागवत की द्वारकालीला में उनके आवृत स्वरूप का दृष्टान्त है। कभी-कभी श्रीकृष्ण स्त्री वेष को धारण करके क्रीड़ा करते थे। उनके इस रूप को देखकर उद्धव ने कहा, "अहो ! कैसा आश्चर्य है कि यह स्त्री ठीक श्रीकृष्ण के समान ही मेरे भक्तिरस को आकर्षित कर रही है। अच्छा समझ गया, कौतुक के लिए श्रीकृष्ण ने ही स्त्रीरूप धारण कर रखा है।" श्रीकृष्ण के प्रकट स्वरूप को देखकर एक भक्त उनकी रूपमाधुरी की स्तुति करता है, "भगवान् श्रीकृष्ण का स्वरूप कितना अतिशय मधुर है। उनकी शंख-सी ग्रीवा, कमल का मानमर्दन करने वाली नेत्र-लालिमा, श्यामतमाल शरीर, छत्रयुक्त शिर—यह सब बस देखते ही बनता है। उनके वक्षःस्थल पर श्रीवत्स हैं और हाथों में शंख-चक्र धारण किए हुए हैं। इस प्रकार सुन्दर रूप में प्रकट श्रीमाधव अपने दिव्य गुणों के दर्शनों से मुझे दिव्य आनन्द प्रदान कर रहे हैं।" श्रील रूप गोस्वामी ने नाना शास्त्रों के आधार पर श्रीकृष्ण के निम्नांकित दिव्य गुणों का उल्लेख किया है—१. सुन्दर अंग वाले, २. सम्पूर्ण शुभ लक्षणों से युक्त, ३. अतिशय रुचिर, ४. तेजोमय, ५. बलवान् ६. नित्य कैशौर्यमय, ७. विविध और अद्भुत भाषाओं के ज्ञाता, ८. सत्यवादी, ६. प्रियभाषी, १०. वावदूक (सब भाषाओं को बोलने में दक्ष), ११. परम पण्डित, १२. बुद्धिमान्, १३. अपूर्व प्रतिभाशाली, १४. विदग्ध (कलाओं में पारंगत) १५. चतुर, १६. परम दक्ष, १७. कृतज्ञ, १८. अत्यन्त दृढ़ व्रतधारी, १६. देश, काल और पात्र को अच्छी प्रकार से जानने वाले, २०. शास्त्रों को देखने-कहने वाले, २१. पवित्र, २२. आत्मसंयमी, २३. स्थिर रहने वाले, २४. सहनशील (जितेन्द्रिय), २५. क्षमाशील, २६. गम्भीर, २७. धैर्यवान्, २८. समदृष्टि वाले, २६. उदार, ३०. धार्मिक, ३१. शूरवीर, ३२. करुण,

श्रीकृष्ण के दिव्य गुण [ १३५ ३३. सम्मान करने वाले, ३४. विनीत, ३५. उदार, ३६. लज्जावान्, ३७. शरणागत जीवों के रक्षक, ३८. सुखी, ३६. भक्तों के हितैषी, ४०. प्रेम के वशीभूत, ४१. सर्वमंगलमय, ४२. परम प्रतापी, ४३. परम यशस्वी, ४४. लोकप्रिय, ४५. भक्तवत्सल; ४६. सब स्त्रियों के चितचोर, ४७. सब के आराध्य, ४८. सम्पूर्ण ऐश्वर्यों से युक्त, ४६. वरेण्य (सम्मान्य) तथा ५०. परम ईश्वर । भगवान् श्रीकृष्ण में ये सभी पचास गुण समुद्र की गाहता के समान पूर्ण रूप में विराजते हैं । भाव यह है कि उनके गुणों की अवधि-परिधि अचिन्त्य है । जीव भगवान् के भिन्न-अंश हैं, अतः यदि वे भगवान् के शुद्धभक्त बन जायें तो उनमें भी ये गुण बिन्दुरूप में आ सकते हैं । भाव यह है कि भक्तों में ये गुण अत्यन्त अल्प मात्रा में रह सकते हैं, जबकि पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण में ये सब परिपूर्ण रूप से विराजते हैं । इनके अतिरिक्त, कतिपय अन्य दिव्य गुण भी हैं जिनका वर्णन पद्मपुराण में शिवजी ने पार्वती से किया है। इनका विवरण पृथ्वी और धर्म के संवाद-प्रसंग में श्रीमद्भागवत भी है। श्रीमद्भागवत में उल्लेख है, “महापुरुष बनने के अभिलाषियों को सदा निम्नलिखित गुणों से विभूषित रहना चाहिए—सत्य, शौच, दया, सहनशीलता, त्याग, सन्तोष, सरलता इन्द्रियसंयम, मन का निग्रह, तप, समता, तितिक्षा, शान्ति, वैराग्य, विद्या, ज्ञान, ऐश्वर्य, शूरता, तेज, बल, स्मृति, मृदुता, करुणा, दक्षता, शील, दृढ़ता, स्वतन्त्रता, कौशल, कान्ति, धैर्य, कोमलता, बोलने की क्षमता, ऐश्वर्य, सम्पूर्ण ज्ञान में पूर्णता, गम्भीरता, स्थिरता, आस्तिक्य, यश, कीर्ति दूसरों का सम्मान, अहंकारहीनता । जिन्हें महत्त्व की अभिलाषा है, वे इन में से किसी भी गुणों के बिना नहीं हो सकते; अतएव यह निश्चित है कि ये गुण परम-आत्मा श्रीकृष्ण में अवश्य रहते हैं । उपरोक्त पचास गुणों के अतिरिक्त, भगवान् श्रीकृष्ण में पाँच अतिरिक्त गुण हैं, जो एक अंश में ब्रह्मा और शिव में भी प्रकाशित होते हैं ५१. सदा एकस्वरूप; ५२. सर्वज्ञ; ५३. नित्यनूतन; ५४. सच्चिदानन्द सांद्र अंग तथा ५५. समस्त सिद्धियों द्वारा सेवित । श्रीकृष्ण के पाँच गुण और भी हैं, जो नारायण विग्रह में प्रकाशित रहते हैं—५६. अचिन्त्य महाशक्ति से युक्त; ५७. जिनके विग्रह से कोटि- कोटि ब्रह्माण्ड प्रकट होते हैं : ५८. सब अवतारों के स्रोत; ५६. अपने द्वारा मारे गए शत्रुओं को मुक्ति के दाता; ६०. आत्मारामों को अपनी ओर आकर्षित करने वाले ।

१३६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु इन साठ दिव्य गुणों के अतिरिक्त श्रीकृष्ण में चार ऐसे गुण भी हैं जो देवों-जीवों में तो क्या, स्वयं नारायण में भी नहीं हैं। ये हैं— ६१. सब प्रकार की अद्भुत और चमत्कारमयी लीलाओं (विशेषतः बाललीला) के सागर; ६२. अतुल मधुर प्रेममण्डित प्रिय भक्तों से विभूषित; ६३. अपनी मुरली के कलकूजन से त्रिभुवनगत प्राणियों के चित्त को हरने वाले; ६४. जिससे अधिक अथवा जिसके तुल्य कोई रूप नहीं है, ऐसी रूपश्री से सम्पूर्ण चराचर जगत् को विस्मित करनेवाले—ये चार गुण (लीलामाधुरी, प्रेममाधुरी, वंशीमाधुरी तथा रूपमाधुरी) विशेषतः गोविन्द में विलक्षण रूप से पाये जाते हैं। पूर्वोक्त गुणों के साथ इन चार असाधारण गुणों की गणना करने पर श्रीकृष्ण के कुल गुण चौंसठ बनते हैं। श्रील रूप गोस्वामी ने श्री- परमेश्वर के स्वरूप में इन सब गुणों को सिद्ध करने हेतु नाना शास्त्रप्रमाण प्रस्तुत किए हैं। १. सुरम्यांग भगवान् के विग्रह के विविध अंगों की प्राकृत वस्तुओं में कोई उपमा नहीं है। भगवत्-रूप के उत्कर्ष को समझने में असमर्थ साधारण लोगों के बोध के लिए ही उन्हें लौकिक उपमा दी जाती है। कहा जाता है कि श्रीकृष्ण का मुखमण्डल चन्द्रमा के समान है; जंघायें गज जैसी बलवती हैं; भुजायें स्तम्भ जैसी हैं; दोनों कर कमलदल के समान विकसित हैं; वक्षः स्थल कपाट जैसा है; नितम्ब एक दूसरे से सटे हुए हैं तथा शरीर का मध्य- भाग पतला है। २. सब शुभ लक्षणों से युक्त शरीर के नाना अंगों में पाए जाने वाले सभी मंगल-लक्षण चिह्न भगवान् के विग्रह में हैं। इस सन्दर्भ में, भगवान् श्रीकृष्ण के शरीर में प्रकट शुभ लक्षणों के सम्बन्ध में नन्द महाराजा के एक मित्र ने कहा है, "हे सखे, गोपेन्द्र ! तुम्हारा बालक ३२ शुभ लक्षणों से युक्त है। ऐसा बालक गोपों में कहाँ हो सकता है ?" भगवान् श्रीकृष्ण जब भी राम आदि के रूप में अवतीर्ण होते हैं, प्रायः क्षत्रियकुल का वरण करते हैं और कभी-कभी ब्राह्मणकुल में भी प्रकट होते हैं। परन्तु श्रीकृष्ण ने नन्दमहाराज के पुत्ररूप में लीला की, जो वैश्य थे। वैश्य जाति का कार्य कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य है। अतः उनके ब्राह्मणकुल के मित्रों को बड़ा आश्चर्य हुआ कि

श्रीकृष्ण के दिव्य गुण [ १३७ ऐसा महापुरुष बालक वैश्य-परिवार में कैसे हो सकता है । उन्होंने नन्दजी से बालक के शरीर पर विद्यमान सभी शुभ लक्षणों का उल्लेख किया । वे बोले, "इस बालक के नेत्रप्रान्त, पाद, करतल, तालू, अधरोष्ठ, जिह्वा और नख-इन सात अंगों में मंगलसूचक रक्तता है । इसके वक्षःस्थल, कटि और ललाट, इन तीनों अंगों में विस्तार पाया जाता है । ग्रीवा, जंघा और लिंग में लघुता है, वाणी, बुद्धि और नाभि में गम्भीरता है, नासिका, स्कन्ध, कर्ण, ललाट, नख और कटि में तुंगता है; नासिका, भुजा, नेत्र, हनु, जंघाओं में लम्बाई है तथा त्वचा, केश, अंगुलि, दन्त और अंगुलिपर्व में सूक्ष्मता पाई जाती है । इन सम्पूर्ण लक्षणों का प्रकाश केवल महापुरुषों में होता है ।" हाथ आदि में रेखाओं से बने हुए चक्रादि चिह्न भी मंगल लक्षण हैं । एक वृद्धा गोपी नन्दजी से कहती है - "हे गोपेश ! अपने पुत्र के करों में स्पष्ट रेखाओं से बने हुए कमलों और चक्रों को तथा पदपल्लवों में ध्वज, वज्र, मीन, कुश, और कमल के मंगलमय चिह्नों को देखिए ।" ३. रुचिर नेत्रों को आनन्द प्रदान करने वाले सौन्दर्य को रुचिर कहते हैं । श्रीकृष्ण का स्वरूप अतिशय रुचिर है । श्रीमद्भागवत (३.२.१३) में उल्लेख है, "भगवान् श्रीकृष्ण अपने नेत्रानन्ददायी रूप में महाराज युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में पधारे । वहाँ उपस्थित ब्रह्माण्ड के सारे महापुरुषों ने उन्हें देखकर समझा कि श्रीकृष्ण के इस विग्रह की रचना में विधाता की सारी शिल्प कुशलता समाप्त हो गई है ।" कहा जाता है कि श्रीकृष्ण का विग्रह—मुख, दो नेत्र, दो हाथ, नाभि तथा दो पैर—इन आठ कमलों से युक्त है । इन में से किसी एक अंग-कमल पर गोपीजन अथवा व्रजवासियों की भ्रमरपंक्ति एक बार पड़ने पर फिर द्युतिमधु से पंकिल उस नीलकमल (कृष्णा) से उठ नहीं पाती थी । ४. तेजोमय सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड जगत् में व्याप्त तेज भगवान् श्रीकृष्ण की ही किरण राशि है । श्रीकृष्ण का परमधाम ब्रह्मज्योति विकीर्ण करता रहता है, जो उनके विग्रह से निःसृत है । श्रीहरि के वक्षःस्थल पर स्थित सूर्य की कान्ति का तिरस्कार करने वाली कौस्तुभ मणि की प्रभा भी भगवान् के श्रीविग्रह की दीप्ति के सामने आकाश में तारे के समान ही मन्द-मन्द स्फुरित होती है । अतः श्रीकृष्ण का

१३८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु दिव्य प्रभाव इतना अतिशय है कि सब को जीत लेता है। जब श्रीकृष्ण अपने शत्रु कंस के यज्ञ में गए तो वहाँ के मल्ल कोमल अंग वाले उन कृष्ण को देखते हुए भी उनके साथ युद्ध करने के विचार से भयभीत और संत्रस्त हो उठे। ५. बलवान् असाधारण पौरुष वाला बलीयान् कहलाता है। श्रीकृष्ण द्वारा अरिष्टासुर का वध करने पर कुछ गोपियाँ कहने लगीं, "हे सखि ! देखो कृष्ण ने पर्वत से भी भयंकर अरिष्टासुर को रुई के पिण्ड के समान उड़ा कर मार डाला।" एक अन्य पद्य है, "हे कृष्णभक्तो ! कमलनयन श्रीकृष्ण का वह वाम भुजदण्ड तुम्हारी सब भयों से रक्षा करे, जिसने गोवर्धन पर्वत को खेल-खेल में गेंद की भाँति उठा लिया था।" ६. नित्य किशोर श्रीकृष्ण शैशव, कौमार, पौगण्ड, कैशोर, आदि सभी आयु-वर्गों में सुन्दर और मधुर हैं। परन्तु इन सब में भी कैशोर ही अखिल रसराज है और इसमें भक्ति के नित्य नाना विलास होते हैं। किशोरावस्था में श्रीकृष्ण सम्पूर्ण चिन्मय गुणों से परिपूर्ण लीलारस-निरत रहते हैं। अतः भक्तों ने उनके पूर्व-कैशोर को प्रेम में सर्वाकर्षक माना है। श्रीकृष्ण की इस वय का वर्णन इस प्रकार है, "श्रीकृष्ण के तारुण्य का बल उनकी मधुर मुसकराहट से मिलकर पूर्ण चन्द्र के मद को भी विमर्दित करने वाला हो गया। वे कामदेव को भी विनिन्दित करनेवाले सौन्दर्य-लावण्य के श्रृंगार से विभूषित रहते और निरन्तर गोपियों के मन को उन्मत्त करते हुए प्रेमामृत का पान करा रहे थे।" ७. विविध-अद्भुत भाषाविद् श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं कि जो पुरुष नाना देशों की भाषाओं, विशेषतः देवभाषा संस्कृत, प्राकृत आदि भाषाओं को तथा पशुओं तक की बोली जानता हो, वह अद्भुत भाषाविद् कहा जाता है। इस वाक्य से इंगित होता है कि श्रीकृष्ण पशुओं की भाषाओं को भी बोल-समझ सकते हैं। श्रीकृष्ण के लीलाविहार को देखकर वृन्दावन की एक वृद्धा गोपी आश्चर्य व्यक्त करती हुई बोली, "अहो ! व्रजगोपियों के हृदयवल्लभ श्रीकृष्ण गोपियों से भलीभाँति व्रजभाषा में बोलते हैं, देवताओं से संस्कृत में वार्तालाप करते हैं, यहाँ तक कि पशुओं की भाषा में गाय-भैंस से भी

श्रीकृष्ण के दिव्य गुण [ १३६ बोल सकते हैं। इसी प्रकार काश्मीरी में, शुक आदि विहंगों की भाषा में और प्राकृत में भी कृष्ण बड़े ही वाचाल हैं।" उसने गोपियों से विस्मय व्यक्त किया कि इतनी भाषाओं को बोलने में श्रीकृष्ण इतने दक्ष कैसे हो गए। ८. सत्यवाक् जिस पुरुष का वचन कभी झूठा सिद्ध न हो, वह सत्यवाक् कहा जाता है। कृष्ण ने एक बार पाण्डवों की माता को वचन दिया था कि वे उसके पाँचों पुत्रों को कुरुक्षेत्र की रणभूमि से जीवित लौटा लायेंगे। युद्ध के अन्त में पाँचों पाण्डवों के घर वापस आ जाने पर कुन्ती ने अपने वचन को सत्य करने के लिए श्रीकृष्ण की स्तुति की। वह बोली, "सूर्य भले ही शीतल हो जाय और चन्द्रमा भले ही उष्ण हो जाय पर फिर भी हे मुरारि ! आपका वचन असत्य नहीं हो सकता।" इसी प्रकार जब श्रीकृष्ण भीम- अर्जुन के साथ जरासन्ध से युद्ध करने गये तो उन्होंने उसे स्पष्ट कह दिया कि दो पाण्डवों सहित छद्मवेष में वहाँ उपस्थित हुए वे स्वयं सनातन पुरुषोत्तम कृष्ण हैं। श्रीकृष्ण तथा भीम-अर्जुन क्षत्रिय थे। जरासन्ध भी क्षत्रिय था और इसलिए ब्राह्मणों को उदारता से दान देता था। अतः जरासन्ध के वध की योजना बनाकर श्रीकृष्ण भीम-अर्जुन के साथ ब्राह्मण वेष में उसके पास गए। उदारदानी जरासन्ध ने उनसे अपना अभीष्ट माँगने को कहा तो उन्होंने उससे युद्ध करने की इच्छा व्यक्त की। उसी समय श्रीकृष्ण ने घोषित किया कि ब्राह्मण-वेष में वे उसके सदा के शत्रु ही आए हैं। ६. प्रियभाषी जो अपने शत्रु को भी प्रिय वचनों से शान्त कर सकता है, वह पुरुष प्रियभाषी है। श्रीकृष्ण तो प्रियभाषण की अवधि ही हैं। यमुना जल में कालिय नाग का मान-मर्दन करके उन्होंने कहा- "हे नागराज ! यद्यपि मैंने आपको कष्ट पहुँचाया है, फिर भी मुझमें दोष-दृष्टि न करें। देवताओं के लिए भी आराध्य गोधन की रक्षा मेरा कर्तव्य है। आपकी उपस्थिति से गायों की रक्षा के लिए ही मैं आपको यहाँ से निष्कासित कर रहा हूँ।" कालिय के निवास के कारण यमुनाजल विष से दूषित हो गया था। उसे पीकर कितनी ही गायें कालकवलित हो गई थीं। अतः बालकृष्ण