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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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रस [ १३३ का वर्णन इस प्रकार है—"रति आदि की जिससे उत्पत्ति होती है, वह विभाव-आलम्बन और उद्दीपन—ऐसे दो प्रकार का होता है। अर्थात्, विभाव के दो भेद हैं। कृष्ण और उनके भक्त भक्तिरस के आलम्बन विभाव हैं। श्रीकृष्ण भक्ति के विषय-आलम्बन हैं और उनका शुद्धभक्त आश्रय- आलम्बन है। किसी वस्तु को देखकर होने वाले कृष्णस्मरण से उत्पन्न विभाव उद्दीपन कहा जाता है।" भगवान् श्रीकृष्ण, जो अचिन्त्य शक्तियों और ज्ञान, आनन्द, आदि सम्पूर्ण महागुणों के नित्य निधान हैं, वे ही भक्तिरस के आलम्बन कारण हैं। अपने अन्य रूपों और सब अवतारों से वे भक्तिरस के उद्दीपन भी बन जाते हैं। श्रीमद्भागवत में ब्रह्मविमोहनलीला के संदर्भ में एक वाक्य है जिससे भक्तिरस के इस उद्दीपनरूप का स्पष्टीकरण होता है। जब ब्रह्मा को मोहित करने के लिए भगवान् श्रीकृष्ण ने स्वयं सब गोपबालकों, गायों और गोवत्सों का रूप धारण कर लिया तो श्रीकृष्ण के अग्रज श्रीबलदेव (जो श्रीकृष्ण के स्वयंप्रकाश हैं) विस्मित होकर कहने लगे—"अहो ! यह कैसा आश्चर्य है कि इन सब गोपबालकों, गोवत्सों और गायों के प्रति मेरा कृष्णप्रेम उमड़ रहा है।" इसका निश्चय न कर सकने के कारण बलदेव विस्मय से स्तब्ध हो गए। यह एक उदाहरण है, जब श्रीकृष्ण उद्दीपन पक्ष से भक्तिरस के आश्रय-आलम्बन और विषय-आलम्बन दोनों बन जाते हैं।