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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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पृष्ठ 159

१३२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु अधिक स्पष्टतः, भक्तियोग के आचरण से उत्पन्न होने वाली आनन्द की विविध अनुभूतियों को 'भक्तिरस' की संज्ञा दी जा सकती है। भक्तियोग के रस का यह आस्वादन सब कोटि के मनुष्यों को नहीं हो सकता, क्योंकि इस मधुर प्रेममय वृत्ति की उद्भावना पूर्वजन्म के संस्कार से अथवा शुद्धभक्तों के सत्संग से ही होती है। पूर्ववर्णन के अनुसार, शुद्ध- भक्तों के सत्संग से ही भक्तियोग में श्रद्धा का श्रीगणेश होता है। किसी शुद्धभक्त के आश्रय में इस श्रद्धा को बढ़ाने पर या पूर्वजन्म के भक्ति-संस्कारों के कारण ही वास्तव में भक्तिरस का आस्वादन होता है। दूसरे शब्दों में, इस परमानन्द की उपलब्धि साधारण जनों को नहीं हो सकती; वे दुर्लभ भाग्यवाले ही इसका आस्वादन कर पाते हैं जो भक्तों के संगी हों अथवा पूर्वजन्म से भक्तियोग का अभ्यास करते आ रहे हों। भक्तियोग की शनैः-शनैः प्राप्ति के पथ का वर्णन श्रीमद्भागवत, प्रथम स्कन्ध में है, “इस पथ का आरम्भ उन भक्तों के संग में कृष्णकथा सुनने से होता है, जो स्वयं सत्संग के द्वारा हृदय की निर्मलता को प्राप्त हो गए हों। दिव्य भगवच्चरित की कथा का श्रोता निरन्तर परमानन्द में निमग्न रहता है।” भगवद्गीता में भी उल्लेख है कि वास्तव में ब्रह्मभूत हुए पुरुष का पहला लक्षण यह है कि वह सदा प्रसन्न रहता है। इस आनन्दमय जीवन की उपलब्धि भगवद्गीता या श्रीमद्भागवत का श्रवण करने से होती है अथवा उन पुरुषों का सत्संग करने से होती है, जो कृष्णभावना के दिव्य जीवन में बड़ी रुचि रखते हैं, विशेष रूप से वे जो श्रीकृष्ण (गोविन्द) के चरणकमलों की प्रेममयी सेवा के परायण रहकर उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए कृतसंकल्प हैं। इस भाव से उत्साहित होकर जो सदा भगवान् की प्रसन्नता का विधान करनेवाली विधिभक्ति के परायण रहता है, उसमें 'आलम्बन' और 'उद्दीपन' नामक दो प्रकार के विभाव का उदय होता है। इस प्रकार वह परमानन्द में निमज्जित हो जाता है। इस प्रेम-विभाव के सात हेतु हैं, जैसे स्वयं श्रीकृष्ण, कृष्णभक्त, कृष्ण का मुरलीनाद इत्यादि। इनका कार्य कभी स्मित होता है तो कभी स्तब्धता। भाव में शरीर पर आठ सात्त्विक लक्षण प्रकट होते हैं। वे सब पूर्वोक्त पाँच प्रकार के भाव-भेदों के मिश्रण से ही सम्भव होते हैं। इन पाँच प्रकार के भावों के किसी-न-किसी मिश्रण के बिना रसास्वादन नहीं हो सकता। रस के आस्वादन के जो कारण हैं, वे विभाव कहलाते विभाव के दो भेद हैं—आलम्बन और उद्दीपन। 'अग्निपुराण' में विभाव