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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 158, कुल 380 में से

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पृष्ठ 158

अध्याय २० रस भक्तिरसामृतसिन्धु के इस द्वितीय विभाग के प्रारम्भ में ग्रन्थकार 'श्रीसनातन' की सादर वन्दना करते हैं। इससे उन्होंने अपने आराध्यदेव श्रीकृष्ण तथा अपने अग्रज और गुरु सनातन गोस्वामी, दोनों का स्मरण किया है। उन्होंने श्रीकृष्ण को 'सनातन' कहकर उनकी वन्दना की है, क्योंकि वे स्वरूपतः परम सौन्दर्य मूर्ति हैं और अघासुर का नाश करने वाले हैं। इस पद से वे सनातन गोस्वामी का भी स्मरण करते हैं, जो रूप गोस्वामी के अतिशय प्रीतिपात्र हैं और उन (श्रील रूप) के द्वारा सदा सेवित हैं एवं जो सब प्रकार के पापकर्मों का अन्त करते हैं। भक्तिरसामृतसिन्धु के इस दक्षिण विभाग में रचयिता महोदय भगवद्भक्तिरस के सामान्य लक्षणों का निरूपण करना चाहते हैं। भक्तिरसामृतसिन्धु के इस विभाग में पाँच लहरियाँ हैं : १. विभाव- लहरी, २. अनुभाव लहरी, ३. सात्त्विकभाव लहरी, ४. व्यभिचारिभाव लहरी तथा ५. स्थायिभाव लहरी। भगवान् से प्रेम के आदान-प्रदान में जो दिव्य आस्वादन होता है, उसे रस कहते हैं। विविध प्रकार के रसों का मिलन होने पर दिव्य आनन्द की परम अवधि तक भक्तिरस का आस्वादन होता है। यद्यपि ऐसी स्थिति हमारे अनुभव से सर्वथा परे है, तथापि श्रील रूप गोस्वामी की अनुगति करते हुए इस प्रकरण में उसका यथाशक्ति वर्णन किया जायगा। अपनी क्रियाओं में किसी प्रकार के रस का अनुभव किए बिना कोई भी उन्हें नहीं कर सकता। इसी प्रकार कृष्णभावना और भक्तियोग के दिव्य जीवन में भी कोई रस-विशेष अवश्य है। सामान्यतः इस रस का अनुभव मन्दिर में श्रवण, कीर्तन और अर्चन करने तथा भगवत्सेवा के उन्मुख रहने से होता है। अतः जब कोई परमानन्द में निमग्न हो जाता जाता है तो समझना चाहिए कि वह रस का आस्वादन कर रहा है।