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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 161, कुल 380 में से

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पृष्ठ 161

अध्याय २१ श्रीकृष्ण के दिव्य गुण श्रीकृष्ण स्वरूप आवृत और प्रकट, दो प्रकार का है। जब श्रीकृष्ण अन्य वेष आदि में छिपे हैं तो उनका स्वरूप आवृत कहलाता है। श्रीमद्भागवत की द्वारकालीला में उनके आवृत स्वरूप का दृष्टान्त है। कभी-कभी श्रीकृष्ण स्त्री वेष को धारण करके क्रीड़ा करते थे। उनके इस रूप को देखकर उद्धव ने कहा, "अहो ! कैसा आश्चर्य है कि यह स्त्री ठीक श्रीकृष्ण के समान ही मेरे भक्तिरस को आकर्षित कर रही है। अच्छा समझ गया, कौतुक के लिए श्रीकृष्ण ने ही स्त्रीरूप धारण कर रखा है।" श्रीकृष्ण के प्रकट स्वरूप को देखकर एक भक्त उनकी रूपमाधुरी की स्तुति करता है, "भगवान् श्रीकृष्ण का स्वरूप कितना अतिशय मधुर है। उनकी शंख-सी ग्रीवा, कमल का मानमर्दन करने वाली नेत्र-लालिमा, श्यामतमाल शरीर, छत्रयुक्त शिर—यह सब बस देखते ही बनता है। उनके वक्षःस्थल पर श्रीवत्स हैं और हाथों में शंख-चक्र धारण किए हुए हैं। इस प्रकार सुन्दर रूप में प्रकट श्रीमाधव अपने दिव्य गुणों के दर्शनों से मुझे दिव्य आनन्द प्रदान कर रहे हैं।" श्रील रूप गोस्वामी ने नाना शास्त्रों के आधार पर श्रीकृष्ण के निम्नांकित दिव्य गुणों का उल्लेख किया है—१. सुन्दर अंग वाले, २. सम्पूर्ण शुभ लक्षणों से युक्त, ३. अतिशय रुचिर, ४. तेजोमय, ५. बलवान् ६. नित्य कैशौर्यमय, ७. विविध और अद्भुत भाषाओं के ज्ञाता, ८. सत्यवादी, ६. प्रियभाषी, १०. वावदूक (सब भाषाओं को बोलने में दक्ष), ११. परम पण्डित, १२. बुद्धिमान्, १३. अपूर्व प्रतिभाशाली, १४. विदग्ध (कलाओं में पारंगत) १५. चतुर, १६. परम दक्ष, १७. कृतज्ञ, १८. अत्यन्त दृढ़ व्रतधारी, १६. देश, काल और पात्र को अच्छी प्रकार से जानने वाले, २०. शास्त्रों को देखने-कहने वाले, २१. पवित्र, २२. आत्मसंयमी, २३. स्थिर रहने वाले, २४. सहनशील (जितेन्द्रिय), २५. क्षमाशील, २६. गम्भीर, २७. धैर्यवान्, २८. समदृष्टि वाले, २६. उदार, ३०. धार्मिक, ३१. शूरवीर, ३२. करुण,