भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
पृष्ठ 162, कुल 380 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्ण के दिव्य गुण [ १३५ ३३. सम्मान करने वाले, ३४. विनीत, ३५. उदार, ३६. लज्जावान्, ३७. शरणागत जीवों के रक्षक, ३८. सुखी, ३६. भक्तों के हितैषी, ४०. प्रेम के वशीभूत, ४१. सर्वमंगलमय, ४२. परम प्रतापी, ४३. परम यशस्वी, ४४. लोकप्रिय, ४५. भक्तवत्सल; ४६. सब स्त्रियों के चितचोर, ४७. सब के आराध्य, ४८. सम्पूर्ण ऐश्वर्यों से युक्त, ४६. वरेण्य (सम्मान्य) तथा ५०. परम ईश्वर । भगवान् श्रीकृष्ण में ये सभी पचास गुण समुद्र की गाहता के समान पूर्ण रूप में विराजते हैं । भाव यह है कि उनके गुणों की अवधि-परिधि अचिन्त्य है । जीव भगवान् के भिन्न-अंश हैं, अतः यदि वे भगवान् के शुद्धभक्त बन जायें तो उनमें भी ये गुण बिन्दुरूप में आ सकते हैं । भाव यह है कि भक्तों में ये गुण अत्यन्त अल्प मात्रा में रह सकते हैं, जबकि पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण में ये सब परिपूर्ण रूप से विराजते हैं । इनके अतिरिक्त, कतिपय अन्य दिव्य गुण भी हैं जिनका वर्णन पद्मपुराण में शिवजी ने पार्वती से किया है। इनका विवरण पृथ्वी और धर्म के संवाद-प्रसंग में श्रीमद्भागवत भी है। श्रीमद्भागवत में उल्लेख है, “महापुरुष बनने के अभिलाषियों को सदा निम्नलिखित गुणों से विभूषित रहना चाहिए—सत्य, शौच, दया, सहनशीलता, त्याग, सन्तोष, सरलता इन्द्रियसंयम, मन का निग्रह, तप, समता, तितिक्षा, शान्ति, वैराग्य, विद्या, ज्ञान, ऐश्वर्य, शूरता, तेज, बल, स्मृति, मृदुता, करुणा, दक्षता, शील, दृढ़ता, स्वतन्त्रता, कौशल, कान्ति, धैर्य, कोमलता, बोलने की क्षमता, ऐश्वर्य, सम्पूर्ण ज्ञान में पूर्णता, गम्भीरता, स्थिरता, आस्तिक्य, यश, कीर्ति दूसरों का सम्मान, अहंकारहीनता । जिन्हें महत्त्व की अभिलाषा है, वे इन में से किसी भी गुणों के बिना नहीं हो सकते; अतएव यह निश्चित है कि ये गुण परम-आत्मा श्रीकृष्ण में अवश्य रहते हैं । उपरोक्त पचास गुणों के अतिरिक्त, भगवान् श्रीकृष्ण में पाँच अतिरिक्त गुण हैं, जो एक अंश में ब्रह्मा और शिव में भी प्रकाशित होते हैं ५१. सदा एकस्वरूप; ५२. सर्वज्ञ; ५३. नित्यनूतन; ५४. सच्चिदानन्द सांद्र अंग तथा ५५. समस्त सिद्धियों द्वारा सेवित । श्रीकृष्ण के पाँच गुण और भी हैं, जो नारायण विग्रह में प्रकाशित रहते हैं—५६. अचिन्त्य महाशक्ति से युक्त; ५७. जिनके विग्रह से कोटि- कोटि ब्रह्माण्ड प्रकट होते हैं : ५८. सब अवतारों के स्रोत; ५६. अपने द्वारा मारे गए शत्रुओं को मुक्ति के दाता; ६०. आत्मारामों को अपनी ओर आकर्षित करने वाले ।