भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाव के लक्षण (अनुभाव) [ १२३ सदा दिव्य आनन्द का आस्वादन करते हैं। वस्तुतः यदि कोई वृन्दावन जाय तो तत्काल श्रीकृष्ण के विरहसागर में डूब जायगा, क्योंकि अपने अवतरणकाल में उन्होंने वहाँ कैसे अद्भुत लीलारस का परिवेषण किया था। श्रीकृष्ण के लीला-स्मरण में ऐसी रति वास्तव में कृष्णरति ही है। परन्तु बहुत से ऐसे निर्विशेषवादी और योगी हैं जो बाह्य रूप से भक्ति तो करते हैं, पर उसके द्वारा अन्त में भगवान् में लीन हो जाना चाहते हैं। कदाचित् वे श्रीकृष्ण के लीलास्थलों को जाने सम्बन्धी शुद्धभक्तों में भाव का अनुकरण भी करते पाये जाते हैं। फिर भी उनकी क्रियाओं को रति नहीं माना जा सकता है, क्योंकि वे यह सब केवल सायुज्य मुक्ति के लिए करते हैं। श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं श्रीकृष्ण के लिए शुद्धभक्तों में प्रकट होने वाली रति कर्मियों और ज्ञानियों के हृदय में सिद्ध नहीं हो सकती। वास्तव में शुद्धकृष्णभावना में होने वाली यह रति बड़ी दुर्लभ है, मुक्तजन भी इसे खोजते फिरते हैं। जैसा भगवद्गीता का सिद्धान्त है, भवबन्धन से मुक्ति होना वह अवस्था है, जब भक्ति की उपलब्धि हो सकती है। जो केवल मुक्त होकर ब्रह्मज्योति में लीन होना चाहता है, उसके लिए कृष्ण- रति की प्राप्ति असम्भव है। श्रीकृष्ण इस रति को अतिशय छिपाकर रखते हैं और केवल शुद्धभक्तों को देते हैं। साधारण भक्त भी शुद्ध कृष्णरति नहीं पा सकते। फिर मुक्ति और भुक्ति की कामना से दूषित हृदय वाले सकामकर्मी और ज्ञानियों को तो भगवान् की वह रति कैसे मिल सकती है। बहुत से नाममात्र के भक्त श्रीकृष्ण की अष्टकालिक लीला का ध्यान करते हैं। ऐसे लोगों का मिथ्या अनुकरण करते हुए कभी-कभी अन्य व्यक्ति भी यह दम्भ करने लगते हैं कि श्रीकृष्ण बालरूप में उनसे बोल रहे हैं अथवा राधाकृष्ण दोनों आकर उनसे वार्तालाप कर रहे हैं। निर्विशेष- वादी भी इन लक्षणों का कपट करके उन भोले-भाले लोगों को मोह लेते हैं जिन्हें भक्तिविद्या का ज्ञान नहीं होता। परन्तु अनुभवी भक्त तो इन सब विकृतियों को देखते ही समझ जाता है कि यह केवल कपट-व्यापार है। ऐसे कपटी में जो रति दृष्टिगोचर होती है, वह रत्याभास है, यथार्थ रति नहीं। रत्याभास वाले कपटी के लिए यह आशा अवश्य है कि काला- न्तर में कभी वह शुद्धभक्ति के स्तर पर आरूढ़ हो सकता है। इस अनुकृत रति के दो भेद हैं—रत्याभास और परा रति। यदि कोई विधिभक्ति के आचरण अथवा सद्गुरु के मार्गदर्शन के बिना ऐसी