भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु अनुकृत रति दिखाये, तो उसे रत्याभास कहते हैं। कभी-कभी भोग के अभि- लाषी को भी दैवात् भगवन्नाम के कीर्तन परायण शुद्धभक्तों के सत्संग का अवसर मिलता है । भगवान् की कृपा से ऐसा व्यक्ति भी कीर्तन में सम्मि- लित हो सकता है। तब शुद्धभक्तों के हृदयाकाश में स्थित भावचन्द्रिका की छाया उस पर भी पड़ती है; तथा शुद्धभक्तों के प्रभाव से उसमें कुतूहलमयी चंचल रति की छाया सी उदित होती। जब इस रत्याभास से सम्पूर्ण प्राकृत दुःख दूर हो जाते हैं तो उसे परा रति कहते हैं। उपरोक्त रत्याभास अथवा परारति का उदय शुद्धभक्तों के सत्संग अथवा वृन्दावन-मथुरा आदि तीर्थ स्थानों की यात्रा से हुआ करता है। जो भाग्यवान् इस कृष्णरति को पा कर शुद्धभक्तों के संग में भक्ति-साधन करता है, वह भी शुद्धभक्ति कर सकता है। निष्कर्ष यह है कि परारति इतनी शक्तिशाली है कि यदि किसी साधारण मनुष्यों में इस का आभास भी हो, तो वह शुद्धभक्तों के संग से संसिद्धि-लाभ कर सकता है। शुद्धभक्तों के सत्संग रूपी पर्याप्त प्रसाद के बिना श्रीकृष्ण के लिए ऐसी रति अथवा भाव का उदय नहीं हो सकता। जैसे शुद्धभक्तों के सत्संग से रति का उदय होता है, वैसे ही शुद्ध- भक्तों के चरणकमलों का अपराध करने से रति का अभाव भी हो सकता है। अर्थात्, शुद्धभक्तों के संग से कृष्णरति उद्बुद्ध हो सकती है और यदि शुद्धभक्तों के चरणों का अपराध हो जाय तो रत्याभास अथवा परा रति का क्षय भी हो सकता है, उसी प्रकार जैसे पूर्ण चन्द्रमा क्रमशः क्षीण होकर अन्धकार में विलीन हो जाता है। अतः शुद्धभक्तों का संग करते हुए यह निरन्तर ध्यान रखना चाहिए कि उनके चरणों का अपराध न बन बैठे । शुद्धभक्तों के अपराध के अनुपात में रत्याभाव अथवा परारति का क्षय होता जाता है। यदि अपराध बहुत गम्भीर हो तो रति बिलकुल न्यून हो जाती है और यदि गम्भीर न हो तो रति की श्रेणी मध्यम अथवा कनिष्ठ हो जाती है। मोक्ष अथवा ब्रह्मज्योति में लीन होने के अभिलाषी का भाव या तो शनैः शनैः भावाभास को प्राप्त हो जाता है अथवा अहंग्रहोपासना में परि- वर्तित हो जाता है, जिससे जीव अपने को परमेश्वर से अभिन्न समझने लगता है। आत्मसाक्षात्कार की इस अवस्था का नाम अद्वैतवाद है। अद्वैत- वादी के मत में उसमें और परमेश्वर में भेद नहीं है; अतः वह समझता है कि अपनी उपासना से पूर्ण परतत्त्व की उपासना हो जाती है। कभी-कभी कोई कनिष्ठ भक्त बड़े उत्साह से श्रवण-कीर्तन और