भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाव के लक्षण (अनुभाव) [ १२५
नृत्य में भाग लेता हुआ पाया जाता है; परन्तु उसके हृदय की धारणा यही रहती है कि मैं परमब्रह्म से एक हो गया हूँ। यह अद्वैत धारणा शुद्धभक्ति से बिल्कुल भिन्न है। जिसके भीतर विधि-साधन किए बिना ही अकस्मात् भाव दिखाई देने लगता है, उसने पूर्वजन्म में भक्ति का साधन किया था, ऐसा समझना चाहिए। किसी विघ्नवश, प्रायः भक्त-अपराध के कारण वह कुछकाल के लिए प्रतिहत-शक्ति हो गया होगा। अब फिर अवसर आने पर प्रकट हो गया है। निष्कर्ष यह है कि शुद्धभक्तों के संग से ही भक्तिपथ पर उत्तरोत्तर अग्रसर हुआ जा सकता है। लोकोत्तर चमत्कारकारी और सब शक्तियों को प्रदान करने वाले भाव की प्राप्ति श्रीकृष्णकी अहैतुकी कृपा से ही होती है। जिस पुरुष में भाव का उदय हो गया है और जो विषयों से पूर्णतः विरक्त हो गया है, उसमें यदि भक्ति के आदर्श के विरुद्ध कोई विगुणता पाई जाय तो भी उससे द्वेष न करे। भगवद्गीता में प्रमाण है कि जिसकी भगवान् में अनन्य श्रद्धा- भक्ति है, वह यदि कभी अकस्मात् शुद्धभक्ति के लक्षणों से गिर भी जाय, तो भी उसे शुद्ध ही समझना चाहिए। भक्ति, भगवान् और गुरु में अनन्य श्रद्धालु पुरुष भक्ति की क्रियाओं में उच्च स्थान पाता है। 'नृसिंहपुराण' का वाक्य है "जो मन, वाणी और शरीर से अनन्य भाव के साथ भगवान् की सेवा के परायण है, वह यदि बाह्य रूप से मलिन क्रियाओं में प्रवृत्त दिखाई दे, तो भी उसकी बलवती भक्ति के प्रभाव से ऐसी दूषित क्रियायें अति शीघ्र समाप्त हो जायेंगी।" पूर्ण चन्द्र पर कुछ काले धब्बे दिखाई देते हैं, फिर भी पूर्ण चन्द्रमा की ज्योत्स्ना प्रतिहत नहीं होती। इसी प्रकार, भक्ति के भण्डार के सामने छोटी सी भूल भूल नहीं समझी जाती। कृष्णरति दिव्य आनन्दरूपा और आह्लादिनी है। अनन्त दिव्य आह्लाद के बीच छोटे प्राकृत दोष का कुछ भी प्रभाव नहीं होता।