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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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पृष्ठ 153

अध्याय १६ प्रेमभक्ति जब अपने विशेष सम्बन्ध में श्रीकृष्ण की प्रीति का भाव अतिशय तीव्र हो जाता है तो उसे शुद्ध प्रेम कहते हैं। प्रारम्भ में भक्त गुरु-आज्ञा के अनुसार विधिभक्ति में तत्पर रहता है। फिर इस साधन के द्वारा सम्पूर्ण प्राकृत विकारों से पूर्ण शुद्ध हो जाने पर भक्ति में रुचि और आसक्ति का उदय होता है। यही रुचि और आसक्ति शनैः-शनैः तीव्र होकर कालान्तर में 'प्रेम' का रूप धरती है। 'प्रेम' शब्द का प्रयोग वास्तव में केवल भगवान् के सम्बन्ध में ही हो सकता है प्राकृत-जगत् में तो प्रेम का प्रश्न ही नहीं बनता । वहाँ जिसे भ्रमपूर्वक प्रेम समझा जाता है वह केवल काम है। प्रेम और काम में स्वर्ण और लोहे का सा भेद है। 'नारदपंचरात्र' में स्पष्ट उल्लेख है कि जब काम और ममता पूर्ण रूप से भगवान् में होते हैं, उस भक्ति को ही भीष्म, प्रह्लाद, उद्धव और नारद आदि आचार्यों ने प्रेम कहा है। भीष्म जैसे महाभागवतों ने अन्य सभी व्यक्तियों में ममता त्याग देने को भगवत्प्रेम बताया है। उनके अनुसार, अन्य सब से सम्बन्ध-विच्छेद करके केवल एक ही पुरुष (भगवान्) में अपने सम्पूर्ण ममत्व को स्थापित कर देना प्रेम है। वह प्रेम भाव से उत्पन्न और भगवान् की अहैतुकी कृपा से उत्पन्न, ऐसे दो प्रकार का होता है। भावोत्थ सद्गुरु के मार्गदर्शन में शास्त्रों में वर्णित विधिभक्ति करने मात्र से भावोत्थ प्रेम हो जाता है। विधिभक्ति से उत्पन्न भाव से हुई प्रेमभक्ति का उदाहरण श्रीमद्भागवत (११.२.४०) में इस प्रकार है, “विधिभक्ति करते-करते भक्त अपनी स्वाभाविक कृष्णभावना को प्राप्त हो जाता है। नामकीर्तन का अनुरागी और द्रवीभूत चित्त होकर वह कभी हँसता है, कभी रोने लगता है, कभी चिल्लाता है, कभी गाता है और कभी लोक- लज्जा के बिना उन्मत्त की भाँति नाच उठता है।”