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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 154, कुल 380 में से

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पृष्ठ 154

प्रेमभक्ति [ १२७ पद्मपुराण में रागानुगाभक्ति से उत्पन्न भाव द्वारा हुए प्रेम का दृष्टान्त है। चन्द्रकांति नामक सुमुखी ने श्रीकृष्ण को पतिरूप में पाने के लिए कठोरता से ब्रह्मचर्यव्रत रखा। वह निरन्तर उन्हीं की दिव्य मूर्ति के ध्यान और कीर्तन में तन्मय रहती। श्रीकृष्ण से भिन्न किसी अन्य को पतिरूप में वरण न करने का उसका दृढ़ निश्चय था। भगवान् की अशेष-विशेष कृपा से उत्पन्न प्रेम जब कोई प्रेमभाव सहित निरन्तर भगवान् के संग में रहता है तो यह समझना चाहिए कि अपनी अहैतुकी विलक्षण कृपा से प्रेरित होकर भगवान् ने स्वयं उसे इस अवस्था का दान किया है। ऐसी विलक्षण कृपा का उदाहरण श्रीमद्भागवत (११.१२.७) में है। भगवान् श्रीकृष्ण उद्धव से कहते हैं, “वृन्दावन में गोपियों ने मेरी प्राप्ति के लिए न वेदों का स्वाध्याय किया, न तीर्थाटन किया, न किसी विधि-विधान अथवा तप का आचरण किया। केवल मेरे सत्संग से ही उन्हें भक्ति की परम संसिद्धि प्राप्त हो गयी।” पद्मपुराण में चन्द्रकान्ति और श्रीमद्भागवत में गोपियों के उदाहरण से प्रतीत होता है कि जो भक्त अपनी परिस्थिति की चिन्ता किए बिना नित्य-निरन्तर श्रीकृष्ण का चिन्तन करता है और प्रेमभाव से उनकी कीर्ति का गान करता है, वह भगवान् श्रीकृष्ण की अति कृपा के फलस्वरूप अनन्य भक्ति की परम संसिद्धि को प्राप्त हो जायगा। यह स्वयं श्रीमद्- भागवत से प्रमाणित है, “जो भगवान् हरि को उपासता, भजता और प्रेम करता है, वह तप, त्याग आदि स्वरूप-साक्षात्कार के सभी साधनों को कर चुका है। दूसरी ओर, यदि सब प्रकार के तप, त्याग और योग करने पर भी हृदय में हरि के लिए ऐसा प्रेम नहीं होता तो सारा साधन समय का अपव्यय मात्र है। जो निरन्तर बाहर-भीतर श्रीकृष्ण को देखता है, उसने स्वरूप-साक्षात्कार के सब तप-त्याग का उल्लंघन कर लिया है और यदि सब प्रकार का तप-त्याग करने से बाद भी श्रीकृष्ण का भीतर-बाहर दर्शन न हो तो सब साधन निष्फल है।” श्रीकृष्ण की अति कृपा से उदित प्रेम दो प्रकार का होता है— १. भगवान् के माहात्म्य ज्ञान से युक्त तथा २. किसी बाह्य हेतु के बिना श्रीकृष्ण में स्वतः अनुरक्त हो जाना। ‘नारदपंचरात्र’ में कहा है कि यदि भगवान् के माहात्म्य-ज्ञान के कारण भगवान् में अतिशय स्नेह और अचल प्रेम हो जाय तो चार प्रकार की वैष्णव मुक्तियों (सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य और सार्ष्टि) की प्राप्ति निश्चित है। वैष्णव मुक्ति उस मायावादी