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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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पृष्ठ 155

१२८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु मुक्ति से सर्वथा भिन्न है, जिसमें जीव भगवान् की ब्रह्मज्योति में लीन हो जाता है। 'नारदपंचरात्र' में शुद्ध अनन्य भक्ति को स्वार्थवासना से शून्य कहा गया है। भक्त का भगवान् के विषय में अन्य अभिप्राय से रहित निरन्तर प्रेममयी मनोवृत्ति बनाए रखना ही भगवान् को वश में करने वाली भक्ति है। अर्थात्, जो निरन्तर भगवान् श्रीकृष्ण के रूप का चिन्तन करता है, वह शुद्ध वैष्णव है। महिमाज्ञानयुक्त प्रभुप्रसाद प्रायः विधिमार्ग का अनुसरण करने वालो को होता है और रागानुगाभक्ति के अनुगामियों को प्रायः माहात्म्य ज्ञान रहित हेतुरहित भगवत्प्रसाद प्राप्त होता है। विधिभक्ति के द्वारा भगवत्कृपा को प्राप्त हुआ भक्त भगवान् की असमोर्ध्व महिमा, दिव्य रूप- माधुरी और रागानुगाभक्ति की ओर भी आकृष्ट हो सकता है। अर्थात्, विधिभक्ति के आचरण से वह भगवान् की दिव्य रूपमाधुरी का पूर्ण रूप से आस्वादन करने के योग्य हो जाता है। उपरोक्त दोनों ही प्रकार की उत्कृष्ट अवस्थायों की प्राप्ति केवल भक्त पर भगवान् की अति कृपा से सम्भव है। शुद्धभक्तों का सत्संग यद्यपि यहाँ तक प्रेम-प्राप्ति की नाना पद्धतियों का उल्लेख हो चुका है, श्रीरूप गोस्वामी अब इस दिव्य अवस्था को पाने की सामान्य प्रक्रिया का वर्णन करते हैं। प्रेमभक्ति का प्रारम्भ मूल रूप से श्रद्धा है। शुद्धभक्तों के बहुत से संघ और सत्संग हैं। यदि कोई लेशमात्र श्रद्धा के साथ इन संघों का संग करने लगे तो शुद्धभक्ति के मार्ग पर द्रुतगति से अग्रसर होगा। शुद्धभक्त का प्रभाव इतना अतिशय होता है कि यदि कोई अल्प श्रद्धा से भी उसका संग करने आए तो भगवद्गीता, श्रीमद्भागवत, आदि प्रामाणिक शास्त्रों से भगवत्कथा सुनने को मिलेगी। इस प्रकार अन्तर्यामी भगवान् की कृपा से उपरोक्त शास्त्रों में उसकी श्रद्धा दृढ़ होती जायगी। शुद्धभक्तों के सत्संग की यह पहली अवस्था है। फिर अधिक उन्नत और परिपक्व हो जाने पर शुद्धभक्त के आश्रय में विधि भक्ति का आचरण करने के लिए वह स्वतः आत्मसमर्पण करके उन्हें गुरु बना लेता है। इसके बाद, तीसरी अवस्था में गुरुदेव के मार्गदर्शन में वह विधिभक्ति का आचरण करता है और परिणामस्वरूप सम्पूर्ण अनर्थों से मुक्त हो जाता है। अनर्थ- निवृत्ति होने पर उसमें निष्ठा उत्पन्न होती है और फिर क्रमशः भक्ति में