भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
पृष्ठ 156, कुल 380 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रेमभक्ति [ १२६ रुचि, आसक्ति, भाव का तथा अन्त में प्रेम का उदय होता है। शुद्ध भगवत्प्रेम के उद्बोधन की ये भिन्न-भिन्न अवस्थायें हैं। जिस परम सौभाग्यशाली के चित्त में यह अपूर्व प्रेमरूप दिनमणि उदित होता है, उसकी मुद्रा को भलीभाँति समझने में विद्वान् भी असफल रहते हैं। इसीलिए भगवान् शिव ने 'नारदपंचरात्र' में पार्वती से कहा है— “हे महेश्वरी ! भगवान् हरि के प्रेम में मत्त होकर परमानन्द में निमग्न हुए पुरुष को शरीर और मन के सुख-दुःख को कुछ भी अनुभव नहीं होता।" स्नेह आदि प्रेम के व्यवहार प्रेमरूप मूल वृक्ष के ही शाखारूप विलास हैं। इनका प्रकाश भी नाना भाँति से होता है; अतः इन भेदों का विशद विवेचन यहाँ नहीं किया गया। इनका वर्णन श्रील सनातन गोस्वामी ने भागवतामृत में किया है। यद्यपि स्नेह आदि प्रेम के विलासों का विषय अतिशय गूढ़ है, तथापि सनातन गोस्वामी ने इन्हें भली प्रकार से स्पष्ट कर दिया है। इस प्रकार भक्तिरसामृतसिन्धु के पूर्व विभाग का समापन करते हुए श्रील रूप गोस्वामी अपनी रचना को भक्तिसिद्धान्त की माधुरी के प्रतिष्ठाता सनातन गोस्वामी, तथा गोपाल भट्ट गोस्वामी श्रीरघुनाथ भट्ट गोस्वामी तथा रघुनाथदास गोस्वामी के दिव्य आस्वाद में समर्पित करते हैं। इस वाक्य से प्रतीत होता है कि महान् आचार्य श्रील जीव गोस्वामी भक्तिरसामृत सिन्धु के रचनाकाल तक प्रसिद्ध नहीं हुए थे। इति भक्तिरसामृतसिन्धौ रसोपयोगिस्थायिभावोपपादनो नाम पूर्वो विभागः ॥१॥ इति भक्तिवेदान्तभाष्ये पूर्वो विभागः ॥१॥