भारतकोश
संग्रह पर लौटें

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

प्रेमभक्ति [ १२६ रुचि, आसक्ति, भाव का तथा अन्त में प्रेम का उदय होता है। शुद्ध भगवत्प्रेम के उद्बोधन की ये भिन्न-भिन्न अवस्थायें हैं। जिस परम सौभाग्यशाली के चित्त में यह अपूर्व प्रेमरूप दिनमणि उदित होता है, उसकी मुद्रा को भलीभाँति समझने में विद्वान् भी असफल रहते हैं। इसीलिए भगवान् शिव ने 'नारदपंचरात्र' में पार्वती से कहा है— “हे महेश्वरी ! भगवान् हरि के प्रेम में मत्त होकर परमानन्द में निमग्न हुए पुरुष को शरीर और मन के सुख-दुःख को कुछ भी अनुभव नहीं होता।" स्नेह आदि प्रेम के व्यवहार प्रेमरूप मूल वृक्ष के ही शाखारूप विलास हैं। इनका प्रकाश भी नाना भाँति से होता है; अतः इन भेदों का विशद विवेचन यहाँ नहीं किया गया। इनका वर्णन श्रील सनातन गोस्वामी ने भागवतामृत में किया है। यद्यपि स्नेह आदि प्रेम के विलासों का विषय अतिशय गूढ़ है, तथापि सनातन गोस्वामी ने इन्हें भली प्रकार से स्पष्ट कर दिया है। इस प्रकार भक्तिरसामृतसिन्धु के पूर्व विभाग का समापन करते हुए श्रील रूप गोस्वामी अपनी रचना को भक्तिसिद्धान्त की माधुरी के प्रतिष्ठाता सनातन गोस्वामी, तथा गोपाल भट्ट गोस्वामी श्रीरघुनाथ भट्ट गोस्वामी तथा रघुनाथदास गोस्वामी के दिव्य आस्वाद में समर्पित करते हैं। इस वाक्य से प्रतीत होता है कि महान् आचार्य श्रील जीव गोस्वामी भक्तिरसामृत सिन्धु के रचनाकाल तक प्रसिद्ध नहीं हुए थे। इति भक्तिरसामृतसिन्धौ रसोपयोगिस्थायिभावोपपादनो नाम पूर्वो विभागः ॥१॥ इति भक्तिवेदान्तभाष्ये पूर्वो विभागः ॥१॥

अथ दक्षिणो विभागः सामान्य भगवद्भक्तिरस

अध्याय २० रस भक्तिरसामृतसिन्धु के इस द्वितीय विभाग के प्रारम्भ में ग्रन्थकार 'श्रीसनातन' की सादर वन्दना करते हैं। इससे उन्होंने अपने आराध्यदेव श्रीकृष्ण तथा अपने अग्रज और गुरु सनातन गोस्वामी, दोनों का स्मरण किया है। उन्होंने श्रीकृष्ण को 'सनातन' कहकर उनकी वन्दना की है, क्योंकि वे स्वरूपतः परम सौन्दर्य मूर्ति हैं और अघासुर का नाश करने वाले हैं। इस पद से वे सनातन गोस्वामी का भी स्मरण करते हैं, जो रूप गोस्वामी के अतिशय प्रीतिपात्र हैं और उन (श्रील रूप) के द्वारा सदा सेवित हैं एवं जो सब प्रकार के पापकर्मों का अन्त करते हैं। भक्तिरसामृतसिन्धु के इस दक्षिण विभाग में रचयिता महोदय भगवद्भक्तिरस के सामान्य लक्षणों का निरूपण करना चाहते हैं। भक्तिरसामृतसिन्धु के इस विभाग में पाँच लहरियाँ हैं : १. विभाव- लहरी, २. अनुभाव लहरी, ३. सात्त्विकभाव लहरी, ४. व्यभिचारिभाव लहरी तथा ५. स्थायिभाव लहरी। भगवान् से प्रेम के आदान-प्रदान में जो दिव्य आस्वादन होता है, उसे रस कहते हैं। विविध प्रकार के रसों का मिलन होने पर दिव्य आनन्द की परम अवधि तक भक्तिरस का आस्वादन होता है। यद्यपि ऐसी स्थिति हमारे अनुभव से सर्वथा परे है, तथापि श्रील रूप गोस्वामी की अनुगति करते हुए इस प्रकरण में उसका यथाशक्ति वर्णन किया जायगा। अपनी क्रियाओं में किसी प्रकार के रस का अनुभव किए बिना कोई भी उन्हें नहीं कर सकता। इसी प्रकार कृष्णभावना और भक्तियोग के दिव्य जीवन में भी कोई रस-विशेष अवश्य है। सामान्यतः इस रस का अनुभव मन्दिर में श्रवण, कीर्तन और अर्चन करने तथा भगवत्सेवा के उन्मुख रहने से होता है। अतः जब कोई परमानन्द में निमग्न हो जाता जाता है तो समझना चाहिए कि वह रस का आस्वादन कर रहा है।

१३२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु अधिक स्पष्टतः, भक्तियोग के आचरण से उत्पन्न होने वाली आनन्द की विविध अनुभूतियों को 'भक्तिरस' की संज्ञा दी जा सकती है। भक्तियोग के रस का यह आस्वादन सब कोटि के मनुष्यों को नहीं हो सकता, क्योंकि इस मधुर प्रेममय वृत्ति की उद्भावना पूर्वजन्म के संस्कार से अथवा शुद्धभक्तों के सत्संग से ही होती है। पूर्ववर्णन के अनुसार, शुद्ध- भक्तों के सत्संग से ही भक्तियोग में श्रद्धा का श्रीगणेश होता है। किसी शुद्धभक्त के आश्रय में इस श्रद्धा को बढ़ाने पर या पूर्वजन्म के भक्ति-संस्कारों के कारण ही वास्तव में भक्तिरस का आस्वादन होता है। दूसरे शब्दों में, इस परमानन्द की उपलब्धि साधारण जनों को नहीं हो सकती; वे दुर्लभ भाग्यवाले ही इसका आस्वादन कर पाते हैं जो भक्तों के संगी हों अथवा पूर्वजन्म से भक्तियोग का अभ्यास करते आ रहे हों। भक्तियोग की शनैः-शनैः प्राप्ति के पथ का वर्णन श्रीमद्भागवत, प्रथम स्कन्ध में है, “इस पथ का आरम्भ उन भक्तों के संग में कृष्णकथा सुनने से होता है, जो स्वयं सत्संग के द्वारा हृदय की निर्मलता को प्राप्त हो गए हों। दिव्य भगवच्चरित की कथा का श्रोता निरन्तर परमानन्द में निमग्न रहता है।” भगवद्गीता में भी उल्लेख है कि वास्तव में ब्रह्मभूत हुए पुरुष का पहला लक्षण यह है कि वह सदा प्रसन्न रहता है। इस आनन्दमय जीवन की उपलब्धि भगवद्गीता या श्रीमद्भागवत का श्रवण करने से होती है अथवा उन पुरुषों का सत्संग करने से होती है, जो कृष्णभावना के दिव्य जीवन में बड़ी रुचि रखते हैं, विशेष रूप से वे जो श्रीकृष्ण (गोविन्द) के चरणकमलों की प्रेममयी सेवा के परायण रहकर उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए कृतसंकल्प हैं। इस भाव से उत्साहित होकर जो सदा भगवान् की प्रसन्नता का विधान करनेवाली विधिभक्ति के परायण रहता है, उसमें 'आलम्बन' और 'उद्दीपन' नामक दो प्रकार के विभाव का उदय होता है। इस प्रकार वह परमानन्द में निमज्जित हो जाता है। इस प्रेम-विभाव के सात हेतु हैं, जैसे स्वयं श्रीकृष्ण, कृष्णभक्त, कृष्ण का मुरलीनाद इत्यादि। इनका कार्य कभी स्मित होता है तो कभी स्तब्धता। भाव में शरीर पर आठ सात्त्विक लक्षण प्रकट होते हैं। वे सब पूर्वोक्त पाँच प्रकार के भाव-भेदों के मिश्रण से ही सम्भव होते हैं। इन पाँच प्रकार के भावों के किसी-न-किसी मिश्रण के बिना रसास्वादन नहीं हो सकता। रस के आस्वादन के जो कारण हैं, वे विभाव कहलाते विभाव के दो भेद हैं—आलम्बन और उद्दीपन। 'अग्निपुराण' में विभाव

रस [ १३३ का वर्णन इस प्रकार है—"रति आदि की जिससे उत्पत्ति होती है, वह विभाव-आलम्बन और उद्दीपन—ऐसे दो प्रकार का होता है। अर्थात्, विभाव के दो भेद हैं। कृष्ण और उनके भक्त भक्तिरस के आलम्बन विभाव हैं। श्रीकृष्ण भक्ति के विषय-आलम्बन हैं और उनका शुद्धभक्त आश्रय- आलम्बन है। किसी वस्तु को देखकर होने वाले कृष्णस्मरण से उत्पन्न विभाव उद्दीपन कहा जाता है।" भगवान् श्रीकृष्ण, जो अचिन्त्य शक्तियों और ज्ञान, आनन्द, आदि सम्पूर्ण महागुणों के नित्य निधान हैं, वे ही भक्तिरस के आलम्बन कारण हैं। अपने अन्य रूपों और सब अवतारों से वे भक्तिरस के उद्दीपन भी बन जाते हैं। श्रीमद्भागवत में ब्रह्मविमोहनलीला के संदर्भ में एक वाक्य है जिससे भक्तिरस के इस उद्दीपनरूप का स्पष्टीकरण होता है। जब ब्रह्मा को मोहित करने के लिए भगवान् श्रीकृष्ण ने स्वयं सब गोपबालकों, गायों और गोवत्सों का रूप धारण कर लिया तो श्रीकृष्ण के अग्रज श्रीबलदेव (जो श्रीकृष्ण के स्वयंप्रकाश हैं) विस्मित होकर कहने लगे—"अहो ! यह कैसा आश्चर्य है कि इन सब गोपबालकों, गोवत्सों और गायों के प्रति मेरा कृष्णप्रेम उमड़ रहा है।" इसका निश्चय न कर सकने के कारण बलदेव विस्मय से स्तब्ध हो गए। यह एक उदाहरण है, जब श्रीकृष्ण उद्दीपन पक्ष से भक्तिरस के आश्रय-आलम्बन और विषय-आलम्बन दोनों बन जाते हैं।

अध्याय २१ श्रीकृष्ण के दिव्य गुण श्रीकृष्ण स्वरूप आवृत और प्रकट, दो प्रकार का है। जब श्रीकृष्ण अन्य वेष आदि में छिपे हैं तो उनका स्वरूप आवृत कहलाता है। श्रीमद्भागवत की द्वारकालीला में उनके आवृत स्वरूप का दृष्टान्त है। कभी-कभी श्रीकृष्ण स्त्री वेष को धारण करके क्रीड़ा करते थे। उनके इस रूप को देखकर उद्धव ने कहा, "अहो ! कैसा आश्चर्य है कि यह स्त्री ठीक श्रीकृष्ण के समान ही मेरे भक्तिरस को आकर्षित कर रही है। अच्छा समझ गया, कौतुक के लिए श्रीकृष्ण ने ही स्त्रीरूप धारण कर रखा है।" श्रीकृष्ण के प्रकट स्वरूप को देखकर एक भक्त उनकी रूपमाधुरी की स्तुति करता है, "भगवान् श्रीकृष्ण का स्वरूप कितना अतिशय मधुर है। उनकी शंख-सी ग्रीवा, कमल का मानमर्दन करने वाली नेत्र-लालिमा, श्यामतमाल शरीर, छत्रयुक्त शिर—यह सब बस देखते ही बनता है। उनके वक्षःस्थल पर श्रीवत्स हैं और हाथों में शंख-चक्र धारण किए हुए हैं। इस प्रकार सुन्दर रूप में प्रकट श्रीमाधव अपने दिव्य गुणों के दर्शनों से मुझे दिव्य आनन्द प्रदान कर रहे हैं।" श्रील रूप गोस्वामी ने नाना शास्त्रों के आधार पर श्रीकृष्ण के निम्नांकित दिव्य गुणों का उल्लेख किया है—१. सुन्दर अंग वाले, २. सम्पूर्ण शुभ लक्षणों से युक्त, ३. अतिशय रुचिर, ४. तेजोमय, ५. बलवान् ६. नित्य कैशौर्यमय, ७. विविध और अद्भुत भाषाओं के ज्ञाता, ८. सत्यवादी, ६. प्रियभाषी, १०. वावदूक (सब भाषाओं को बोलने में दक्ष), ११. परम पण्डित, १२. बुद्धिमान्, १३. अपूर्व प्रतिभाशाली, १४. विदग्ध (कलाओं में पारंगत) १५. चतुर, १६. परम दक्ष, १७. कृतज्ञ, १८. अत्यन्त दृढ़ व्रतधारी, १६. देश, काल और पात्र को अच्छी प्रकार से जानने वाले, २०. शास्त्रों को देखने-कहने वाले, २१. पवित्र, २२. आत्मसंयमी, २३. स्थिर रहने वाले, २४. सहनशील (जितेन्द्रिय), २५. क्षमाशील, २६. गम्भीर, २७. धैर्यवान्, २८. समदृष्टि वाले, २६. उदार, ३०. धार्मिक, ३१. शूरवीर, ३२. करुण,

श्रीकृष्ण के दिव्य गुण [ १३५ ३३. सम्मान करने वाले, ३४. विनीत, ३५. उदार, ३६. लज्जावान्, ३७. शरणागत जीवों के रक्षक, ३८. सुखी, ३६. भक्तों के हितैषी, ४०. प्रेम के वशीभूत, ४१. सर्वमंगलमय, ४२. परम प्रतापी, ४३. परम यशस्वी, ४४. लोकप्रिय, ४५. भक्तवत्सल; ४६. सब स्त्रियों के चितचोर, ४७. सब के आराध्य, ४८. सम्पूर्ण ऐश्वर्यों से युक्त, ४६. वरेण्य (सम्मान्य) तथा ५०. परम ईश्वर । भगवान् श्रीकृष्ण में ये सभी पचास गुण समुद्र की गाहता के समान पूर्ण रूप में विराजते हैं । भाव यह है कि उनके गुणों की अवधि-परिधि अचिन्त्य है । जीव भगवान् के भिन्न-अंश हैं, अतः यदि वे भगवान् के शुद्धभक्त बन जायें तो उनमें भी ये गुण बिन्दुरूप में आ सकते हैं । भाव यह है कि भक्तों में ये गुण अत्यन्त अल्प मात्रा में रह सकते हैं, जबकि पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण में ये सब परिपूर्ण रूप से विराजते हैं । इनके अतिरिक्त, कतिपय अन्य दिव्य गुण भी हैं जिनका वर्णन पद्मपुराण में शिवजी ने पार्वती से किया है। इनका विवरण पृथ्वी और धर्म के संवाद-प्रसंग में श्रीमद्भागवत भी है। श्रीमद्भागवत में उल्लेख है, “महापुरुष बनने के अभिलाषियों को सदा निम्नलिखित गुणों से विभूषित रहना चाहिए—सत्य, शौच, दया, सहनशीलता, त्याग, सन्तोष, सरलता इन्द्रियसंयम, मन का निग्रह, तप, समता, तितिक्षा, शान्ति, वैराग्य, विद्या, ज्ञान, ऐश्वर्य, शूरता, तेज, बल, स्मृति, मृदुता, करुणा, दक्षता, शील, दृढ़ता, स्वतन्त्रता, कौशल, कान्ति, धैर्य, कोमलता, बोलने की क्षमता, ऐश्वर्य, सम्पूर्ण ज्ञान में पूर्णता, गम्भीरता, स्थिरता, आस्तिक्य, यश, कीर्ति दूसरों का सम्मान, अहंकारहीनता । जिन्हें महत्त्व की अभिलाषा है, वे इन में से किसी भी गुणों के बिना नहीं हो सकते; अतएव यह निश्चित है कि ये गुण परम-आत्मा श्रीकृष्ण में अवश्य रहते हैं । उपरोक्त पचास गुणों के अतिरिक्त, भगवान् श्रीकृष्ण में पाँच अतिरिक्त गुण हैं, जो एक अंश में ब्रह्मा और शिव में भी प्रकाशित होते हैं ५१. सदा एकस्वरूप; ५२. सर्वज्ञ; ५३. नित्यनूतन; ५४. सच्चिदानन्द सांद्र अंग तथा ५५. समस्त सिद्धियों द्वारा सेवित । श्रीकृष्ण के पाँच गुण और भी हैं, जो नारायण विग्रह में प्रकाशित रहते हैं—५६. अचिन्त्य महाशक्ति से युक्त; ५७. जिनके विग्रह से कोटि- कोटि ब्रह्माण्ड प्रकट होते हैं : ५८. सब अवतारों के स्रोत; ५६. अपने द्वारा मारे गए शत्रुओं को मुक्ति के दाता; ६०. आत्मारामों को अपनी ओर आकर्षित करने वाले ।

१३६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु इन साठ दिव्य गुणों के अतिरिक्त श्रीकृष्ण में चार ऐसे गुण भी हैं जो देवों-जीवों में तो क्या, स्वयं नारायण में भी नहीं हैं। ये हैं— ६१. सब प्रकार की अद्भुत और चमत्कारमयी लीलाओं (विशेषतः बाललीला) के सागर; ६२. अतुल मधुर प्रेममण्डित प्रिय भक्तों से विभूषित; ६३. अपनी मुरली के कलकूजन से त्रिभुवनगत प्राणियों के चित्त को हरने वाले; ६४. जिससे अधिक अथवा जिसके तुल्य कोई रूप नहीं है, ऐसी रूपश्री से सम्पूर्ण चराचर जगत् को विस्मित करनेवाले—ये चार गुण (लीलामाधुरी, प्रेममाधुरी, वंशीमाधुरी तथा रूपमाधुरी) विशेषतः गोविन्द में विलक्षण रूप से पाये जाते हैं। पूर्वोक्त गुणों के साथ इन चार असाधारण गुणों की गणना करने पर श्रीकृष्ण के कुल गुण चौंसठ बनते हैं। श्रील रूप गोस्वामी ने श्री- परमेश्वर के स्वरूप में इन सब गुणों को सिद्ध करने हेतु नाना शास्त्रप्रमाण प्रस्तुत किए हैं। १. सुरम्यांग भगवान् के विग्रह के विविध अंगों की प्राकृत वस्तुओं में कोई उपमा नहीं है। भगवत्-रूप के उत्कर्ष को समझने में असमर्थ साधारण लोगों के बोध के लिए ही उन्हें लौकिक उपमा दी जाती है। कहा जाता है कि श्रीकृष्ण का मुखमण्डल चन्द्रमा के समान है; जंघायें गज जैसी बलवती हैं; भुजायें स्तम्भ जैसी हैं; दोनों कर कमलदल के समान विकसित हैं; वक्षः स्थल कपाट जैसा है; नितम्ब एक दूसरे से सटे हुए हैं तथा शरीर का मध्य- भाग पतला है। २. सब शुभ लक्षणों से युक्त शरीर के नाना अंगों में पाए जाने वाले सभी मंगल-लक्षण चिह्न भगवान् के विग्रह में हैं। इस सन्दर्भ में, भगवान् श्रीकृष्ण के शरीर में प्रकट शुभ लक्षणों के सम्बन्ध में नन्द महाराजा के एक मित्र ने कहा है, "हे सखे, गोपेन्द्र ! तुम्हारा बालक ३२ शुभ लक्षणों से युक्त है। ऐसा बालक गोपों में कहाँ हो सकता है ?" भगवान् श्रीकृष्ण जब भी राम आदि के रूप में अवतीर्ण होते हैं, प्रायः क्षत्रियकुल का वरण करते हैं और कभी-कभी ब्राह्मणकुल में भी प्रकट होते हैं। परन्तु श्रीकृष्ण ने नन्दमहाराज के पुत्ररूप में लीला की, जो वैश्य थे। वैश्य जाति का कार्य कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य है। अतः उनके ब्राह्मणकुल के मित्रों को बड़ा आश्चर्य हुआ कि

श्रीकृष्ण के दिव्य गुण [ १३७ ऐसा महापुरुष बालक वैश्य-परिवार में कैसे हो सकता है । उन्होंने नन्दजी से बालक के शरीर पर विद्यमान सभी शुभ लक्षणों का उल्लेख किया । वे बोले, "इस बालक के नेत्रप्रान्त, पाद, करतल, तालू, अधरोष्ठ, जिह्वा और नख-इन सात अंगों में मंगलसूचक रक्तता है । इसके वक्षःस्थल, कटि और ललाट, इन तीनों अंगों में विस्तार पाया जाता है । ग्रीवा, जंघा और लिंग में लघुता है, वाणी, बुद्धि और नाभि में गम्भीरता है, नासिका, स्कन्ध, कर्ण, ललाट, नख और कटि में तुंगता है; नासिका, भुजा, नेत्र, हनु, जंघाओं में लम्बाई है तथा त्वचा, केश, अंगुलि, दन्त और अंगुलिपर्व में सूक्ष्मता पाई जाती है । इन सम्पूर्ण लक्षणों का प्रकाश केवल महापुरुषों में होता है ।" हाथ आदि में रेखाओं से बने हुए चक्रादि चिह्न भी मंगल लक्षण हैं । एक वृद्धा गोपी नन्दजी से कहती है - "हे गोपेश ! अपने पुत्र के करों में स्पष्ट रेखाओं से बने हुए कमलों और चक्रों को तथा पदपल्लवों में ध्वज, वज्र, मीन, कुश, और कमल के मंगलमय चिह्नों को देखिए ।" ३. रुचिर नेत्रों को आनन्द प्रदान करने वाले सौन्दर्य को रुचिर कहते हैं । श्रीकृष्ण का स्वरूप अतिशय रुचिर है । श्रीमद्भागवत (३.२.१३) में उल्लेख है, "भगवान् श्रीकृष्ण अपने नेत्रानन्ददायी रूप में महाराज युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में पधारे । वहाँ उपस्थित ब्रह्माण्ड के सारे महापुरुषों ने उन्हें देखकर समझा कि श्रीकृष्ण के इस विग्रह की रचना में विधाता की सारी शिल्प कुशलता समाप्त हो गई है ।" कहा जाता है कि श्रीकृष्ण का विग्रह—मुख, दो नेत्र, दो हाथ, नाभि तथा दो पैर—इन आठ कमलों से युक्त है । इन में से किसी एक अंग-कमल पर गोपीजन अथवा व्रजवासियों की भ्रमरपंक्ति एक बार पड़ने पर फिर द्युतिमधु से पंकिल उस नीलकमल (कृष्णा) से उठ नहीं पाती थी । ४. तेजोमय सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड जगत् में व्याप्त तेज भगवान् श्रीकृष्ण की ही किरण राशि है । श्रीकृष्ण का परमधाम ब्रह्मज्योति विकीर्ण करता रहता है, जो उनके विग्रह से निःसृत है । श्रीहरि के वक्षःस्थल पर स्थित सूर्य की कान्ति का तिरस्कार करने वाली कौस्तुभ मणि की प्रभा भी भगवान् के श्रीविग्रह की दीप्ति के सामने आकाश में तारे के समान ही मन्द-मन्द स्फुरित होती है । अतः श्रीकृष्ण का

१३८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु दिव्य प्रभाव इतना अतिशय है कि सब को जीत लेता है। जब श्रीकृष्ण अपने शत्रु कंस के यज्ञ में गए तो वहाँ के मल्ल कोमल अंग वाले उन कृष्ण को देखते हुए भी उनके साथ युद्ध करने के विचार से भयभीत और संत्रस्त हो उठे। ५. बलवान् असाधारण पौरुष वाला बलीयान् कहलाता है। श्रीकृष्ण द्वारा अरिष्टासुर का वध करने पर कुछ गोपियाँ कहने लगीं, "हे सखि ! देखो कृष्ण ने पर्वत से भी भयंकर अरिष्टासुर को रुई के पिण्ड के समान उड़ा कर मार डाला।" एक अन्य पद्य है, "हे कृष्णभक्तो ! कमलनयन श्रीकृष्ण का वह वाम भुजदण्ड तुम्हारी सब भयों से रक्षा करे, जिसने गोवर्धन पर्वत को खेल-खेल में गेंद की भाँति उठा लिया था।" ६. नित्य किशोर श्रीकृष्ण शैशव, कौमार, पौगण्ड, कैशोर, आदि सभी आयु-वर्गों में सुन्दर और मधुर हैं। परन्तु इन सब में भी कैशोर ही अखिल रसराज है और इसमें भक्ति के नित्य नाना विलास होते हैं। किशोरावस्था में श्रीकृष्ण सम्पूर्ण चिन्मय गुणों से परिपूर्ण लीलारस-निरत रहते हैं। अतः भक्तों ने उनके पूर्व-कैशोर को प्रेम में सर्वाकर्षक माना है। श्रीकृष्ण की इस वय का वर्णन इस प्रकार है, "श्रीकृष्ण के तारुण्य का बल उनकी मधुर मुसकराहट से मिलकर पूर्ण चन्द्र के मद को भी विमर्दित करने वाला हो गया। वे कामदेव को भी विनिन्दित करनेवाले सौन्दर्य-लावण्य के श्रृंगार से विभूषित रहते और निरन्तर गोपियों के मन को उन्मत्त करते हुए प्रेमामृत का पान करा रहे थे।" ७. विविध-अद्भुत भाषाविद् श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं कि जो पुरुष नाना देशों की भाषाओं, विशेषतः देवभाषा संस्कृत, प्राकृत आदि भाषाओं को तथा पशुओं तक की बोली जानता हो, वह अद्भुत भाषाविद् कहा जाता है। इस वाक्य से इंगित होता है कि श्रीकृष्ण पशुओं की भाषाओं को भी बोल-समझ सकते हैं। श्रीकृष्ण के लीलाविहार को देखकर वृन्दावन की एक वृद्धा गोपी आश्चर्य व्यक्त करती हुई बोली, "अहो ! व्रजगोपियों के हृदयवल्लभ श्रीकृष्ण गोपियों से भलीभाँति व्रजभाषा में बोलते हैं, देवताओं से संस्कृत में वार्तालाप करते हैं, यहाँ तक कि पशुओं की भाषा में गाय-भैंस से भी

श्रीकृष्ण के दिव्य गुण [ १३६ बोल सकते हैं। इसी प्रकार काश्मीरी में, शुक आदि विहंगों की भाषा में और प्राकृत में भी कृष्ण बड़े ही वाचाल हैं।" उसने गोपियों से विस्मय व्यक्त किया कि इतनी भाषाओं को बोलने में श्रीकृष्ण इतने दक्ष कैसे हो गए। ८. सत्यवाक् जिस पुरुष का वचन कभी झूठा सिद्ध न हो, वह सत्यवाक् कहा जाता है। कृष्ण ने एक बार पाण्डवों की माता को वचन दिया था कि वे उसके पाँचों पुत्रों को कुरुक्षेत्र की रणभूमि से जीवित लौटा लायेंगे। युद्ध के अन्त में पाँचों पाण्डवों के घर वापस आ जाने पर कुन्ती ने अपने वचन को सत्य करने के लिए श्रीकृष्ण की स्तुति की। वह बोली, "सूर्य भले ही शीतल हो जाय और चन्द्रमा भले ही उष्ण हो जाय पर फिर भी हे मुरारि ! आपका वचन असत्य नहीं हो सकता।" इसी प्रकार जब श्रीकृष्ण भीम- अर्जुन के साथ जरासन्ध से युद्ध करने गये तो उन्होंने उसे स्पष्ट कह दिया कि दो पाण्डवों सहित छद्मवेष में वहाँ उपस्थित हुए वे स्वयं सनातन पुरुषोत्तम कृष्ण हैं। श्रीकृष्ण तथा भीम-अर्जुन क्षत्रिय थे। जरासन्ध भी क्षत्रिय था और इसलिए ब्राह्मणों को उदारता से दान देता था। अतः जरासन्ध के वध की योजना बनाकर श्रीकृष्ण भीम-अर्जुन के साथ ब्राह्मण वेष में उसके पास गए। उदारदानी जरासन्ध ने उनसे अपना अभीष्ट माँगने को कहा तो उन्होंने उससे युद्ध करने की इच्छा व्यक्त की। उसी समय श्रीकृष्ण ने घोषित किया कि ब्राह्मण-वेष में वे उसके सदा के शत्रु ही आए हैं। ६. प्रियभाषी जो अपने शत्रु को भी प्रिय वचनों से शान्त कर सकता है, वह पुरुष प्रियभाषी है। श्रीकृष्ण तो प्रियभाषण की अवधि ही हैं। यमुना जल में कालिय नाग का मान-मर्दन करके उन्होंने कहा- "हे नागराज ! यद्यपि मैंने आपको कष्ट पहुँचाया है, फिर भी मुझमें दोष-दृष्टि न करें। देवताओं के लिए भी आराध्य गोधन की रक्षा मेरा कर्तव्य है। आपकी उपस्थिति से गायों की रक्षा के लिए ही मैं आपको यहाँ से निष्कासित कर रहा हूँ।" कालिय के निवास के कारण यमुनाजल विष से दूषित हो गया था। उसे पीकर कितनी ही गायें कालकवलित हो गई थीं। अतः बालकृष्ण

१४० ] भक्तिरसामृतसिन्धु ने जल में प्रवेश किया और कालिय का शासन करके उसे वहाँ से अन्यत्र चले जाने का आदेश दिया । इस अवसर पर श्रीकृष्ण ने गोधन को देवों के लिए भी आराध्य कहा और साथ में गोरक्षा का आदर्श भी स्थापित किया । कम से कम कृष्णभावनाभावित पुरुषों को तो उनकी अनुगति में गोधन की सब प्रकार से रक्षा करनी चाहिए । गायें देवों की ही आराध्य नहीं हैं, स्वयं श्रीकृष्ण ने गोपाष्टमी, गोवर्धनपूजा आदि अवसरों पर गोपूजन किया है । १०. वावदूक कानों को प्रिय लगने वाले और विनय आदि वाणी के सम्पूर्ण गुणों से युक्त वचन कहने वाला वावदूक अर्थात् बोलने में निपुण कहलाता है । श्रीकृष्ण की श्रुतिप्रिय विनीत वाणी का उदाहरण श्रीमद्भागवत में है । जब श्रीकृष्ण ने नन्द बाबा से वर्षा के देवता इन्द्र का यज्ञ न करने का विनम्र निवेदन किया तो एक गोपगृहिणी मुग्ध हो उठी । बाद में कहने लगी, "हे सखी ! जो सरस और कोमल पदावली से युक्त होने के कारण मनोहर है और जिसके एक-एक अक्षर से अक्षय अमृतधारा झरती है, सब लोगों के कानों के लिए रसायन जैसी श्रीकृष्ण की वाणी ने किस का मन नही हर लिया ?" श्रीकृष्ण की वाणी ब्रह्माण्डभर के सारे वाग्गुणों से विभूषित है; इस के प्रमाण में उद्धव का यह वाक्य है—"शत्रुओं के हृदय को भी तत्काल बदल देने वाली, संसार के सारे संशय-दुःखों का अन्त करने वाली तथा मात्रा में अल्प होने पर विविध अर्थ वाली श्रीकृष्ण की वाणी मेरे हृदय को अतिशय प्रिय है ।" ११. सुपण्डित विद्वान् और नीतिज्ञ पुरुष को सुपण्डित कहा जाता है । अखिल विद्याओं का ज्ञाता विद्वान् कहलाता है और यथोचित कार्य करने वाला नीतिज्ञ है । इन दोनों गुणों के समुच्चय का नाम सुपाण्डित्य है । श्रीकृष्ण के सान्दीपनि मुनि से शिक्षा ग्रहण करने का वर्णन नारद जी ने इस प्रकार किया है, "ब्रह्मादिक उन मेघों के समान हैं, जो कृष्णरूप महासागर के जल से बने हैं । सागर से जैसे मेघ को जल मिलता है, वैसे सर्वप्रथम ब्रह्माजी ने श्रीकृष्ण से वैदिक ज्ञान पाया । ब्रह्मा द्वारा जगत् में प्रवर्तित वही वैदिक ज्ञान फिर सान्दीपनि मुनि रूप शैल में रहा । सान्दीपनि का श्रीकृष्ण को उपदेश करना पर्वत से उस नदीरूप में जल

श्रीकृष्ण के दिव्य गुण [ १४१ प्रवाहित होने जैसा है, जो वापस जाकर सागररूपी श्रीकृष्ण को प्राप्त हो जाय।" भाव यह है कि वास्तव में श्रीकृष्ण को कोई उपदेश नहीं कर सकता, जैसे सागर को प्राप्त होने वाली सारी जलराशि का मूल स्रोत सागर स्वयं है। देखने में प्रतीत होता है कि नदियाँ सागर को जल से भर रही हैं। श्रीकृष्ण ने ब्रह्मा में वैदिक ज्ञान का संचार किया और ब्रह्मा से आगे शिष्य- परम्परा के द्वारा इस ज्ञान का प्रसारण हुआ। इसलिए सान्दीपनि मुनि के विद्या-उपदेश को उस नदी की उपमा दी गई है जो वापस जाकर कृष्णरूपी मूल सागर में मिल जाती है। सिद्धचारण श्रीकृष्ण की वन्दना करते हुए कहते हैं, "हे गोविन्द ! विद्या के चौदह गुणों से अलंकृत, जिसकी बुद्धि चारों वेदों में व्यापिनी है, जो मनु आदि की स्मृतियों से सदा युक्त हैं, जो शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष - वेद के इन छः अंगरूप परिधान से विभूषित है, पुराण जिसके सुहृद हैं, ऐसी मीमांसा से मण्डित सरस्वती को गुरुकुल में आप का संग सुलभ हो गया है। अब यह आपकी सेवा में संलग्न है।" भगवान् श्रीकृष्ण को किसी विद्या का अभाव नहीं है, वे तो केवल विद्यादेवी सरस्वती को अपनी सेवा का अवसर प्रदान करते हैं। श्रीकृष्ण पूर्णकाम हैं; अतः यद्यपि उनके असंख्य भक्त हैं, फिर भी उन्हें किसी भी जीव की सेवा अपेक्षित नहीं है। यह उनकी अहैतुकी करुणा और कृपा ही है कि वे सब को अपनी सेवा करने का अवसर देते हैं, मानो उन्हें अपने भक्तों से अपनी सेवा कराने की आवश्यकता हो। उनकी नीतिज्ञता के सम्बन्ध में श्रीमद्भागवत में कहा है, "तस्करों के लिए मृत्यु के समान, पुण्यात्मा पुरुषों के लिए आनन्ददायी वसन्त वायु के समान, रमणियों में परम मनोहर कामदेव के समान, बन्धु-बान्धवों के लिए आह्लादकारी पूर्ण चन्द्र के समान, दीनों में कल्याण के कल्पवृक्ष के समान, शत्रुओं के लिए भगवान् शिव के मुख की कालाग्नि के समान, व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण मथुरा पुरी का शासन कर रहे हैं।" अस्तु, नाना प्रकार के लोगों के साथ व्यवहार करने में श्रीकृष्ण पूरे नीतिज्ञ हैं। जब उन्हें चोरों के लिए कालरूप कहा जाता है तो इसका अर्थ नहीं कि वे नीतिरहित अथवा निर्दयी हैं। वे तब भी कृपामय ही हैं क्योंकि अपराधियों को मृत्यु-दण्ड देना सब प्रकार से नीतिसंगत है। भगवद्गीता में भी श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो उनसे जैसा व्यवहार करता है, वे भी उसके साथ वैसा ही करते हैं। उनका व्यवहार भक्तों और अभक्तों के साथ भिन्न- भिन्न होता है, परन्तु ये दोनों बराबर मंगलमय हैं। श्रीकृष्ण मंगलायतन

१४२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु हैं, इसलिए सब के साथ उनके व्यवहार में भी मंगल ही मंगल है। १२. बुद्धिमान् तीक्ष्ण स्मृति और सूक्ष्म बुद्धि वाले को बुद्धिमान् कहा जाता है। श्रीकृष्ण की स्मृति की तीक्ष्णता के विषय में कथन है कि अवन्तीपुर में स्थित सान्दीपनि मुनि के आश्रम में अध्ययन करते हुए श्रीकृष्ण गुरु से एक बार जो शिक्षा सुन लेते थे, तत्काल उस विषय में पूर्ण निष्णात् हो जाते थे। वास्तव में तो सान्दीपनि के गुरुकुल में जाकर वे जगत् के सामने यह आदर्श रखना चाहते थे कि चाहे कोई कितना भी महान् अथवा दक्ष क्यों न हो, पर विद्या के लिए किसी बड़े के पास अवश्य जाना पड़ेगा। महान् से महान् व्यक्ति के लिए भी गुरुशरण में जाना अनिवार्य है। श्रीकृष्ण की सूक्ष्म बुद्धि तब प्रकट हुई जब वे मथुरापुरी पर आक्रमण- कारी म्लेच्छराज से युद्ध कर रहे थे। वैदिक विधान है कि क्षत्रिय राजाओं को म्लेच्छों को मारने के लिए भी स्पर्श नहीं करना चाहिए। अतः जब उस म्लेच्छराज ने मथुरा को घेर लिया तो श्रीकृष्ण ने उसे अपने हाथों मारना अच्छा नहीं समझा। पर उसे मारना भी अवश्य है; इसलिए अपनी सूक्ष्म बुद्धि का परिचय देते हुए श्रीकृष्ण ने युद्धभूमि से भागने का निश्चय किया, जिससे यवनराज उनका पीछा करे। तब वे उसे उस कन्दरा में ले गए जहाँ मुचुकुन्द निद्रामग्न था। मुचुकुन्द को शिवजी से यह वर था कि निद्राभग्न होने पर उसकी दृष्टि जिस पर पड़ जायगी, वह तत्क्षण भस्म हो जायगा। अतः श्रीकृष्ण बुद्धिमानी से म्लेच्छराज को उस कन्दरा में ले गए जहाँ मुचुकुन्द निद्रामग्न था और इस प्रकार उसे भस्म करा दिया। १३. प्रतिभाशाली जो तुरन्त नए-नए तर्कों से किसी भी विपक्ष का प्रतिकार करने में कुशल हो, उसे प्रतिभाशाली कहते हैं। इस सन्दर्भ में पद्यावली में श्रीराधा- कृष्ण का यह संवाद है। एक दिन प्रातः जब श्रीकृष्ण राधारानी के पास गए तो वे पूछने लगीं- "हे केशव ! आजकल तुम्हारा वास कहाँ है?" संस्कृत में 'वास' शब्द के तीन अर्थ हैं-निवास, सुगन्ध तथा वस्त्र। श्रीराधारानी का अभिप्राय था, "हे कृष्ण ! तुम्हारा वस्त्र कहाँ है ?" परन्तु श्रीकृष्ण ने उसे निवास मानकर उत्तर दिया- "हे प्रिये ! इस क्षण मेरा वास तुम्हारे चंचल नेत्रों में है।" इस पर राधारानी ने कहा- "अरे शठ ! मैं निवास-स्थान को नहीं, तुम्हारे वास (वस्त्र) को पूछ रही हूँ।"

श्रीकृष्ण के दिव्य गुण [ १४३ अब श्रीकृष्ण 'वास' का अर्थ सुगंध समझकर बोले—"हे सुभगे ! तुम्हारे अंगों के संसर्ग से मुझे यह सुवास प्राप्त हुआ है।" श्रीमती राधारानी ने श्रीकृष्ण से फिर पूछा—"हे धूर्त ! तुमने रात्रि कहाँ बितायी ?" (यामिन्यामुषितः यामिन्याम् = रात्रि; उषितः = व्यतीत की)। परन्तु श्रीकृष्ण ने उस 'यामिन्यामुषितः' का प्रकारान्तर से 'यामिन्या मुषितः' पदच्छेद किया, जिसका अर्थ यह हो गया कि रात्रि ने उनका हरण किया। वे कहने लगे—"हे राधे ! भला क्या रात्रि भी चोरी करती है ?" इस प्रकार राधारानी के सब प्रश्नों का छलपूर्वक उत्तर देते हुए श्रीकृष्ण इस परमप्रिया गोपी को आनन्दित कर रहे थे। १४. विदग्ध कला तथा विलास में अतिशय कुशल को विदग्ध कहा जाता है। यह विशेष गुण श्रीकृष्ण के स्वरूप में प्रकाशित है, राधारानी कहती हैं, "हे सखि ! कृष्ण कभी गीत रचते हैं, कभी विनोद करते हैं, कभी वंशी बजाते हैं, कभी नाचते हैं, मालायें गूंथते हैं और कभी ऐसा मधुर श्रृंगार करते हैं मानो उन्होंने द्यूत में सब खिलाड़ियों को जीत लिया हो। इस प्रकार परमोच्च कला का विलास करते हुए श्रीहरि अद्भुत क्रीड़ा कर रहे हैं।" १५. चतुर एक साथ अनेक कार्य करने की सामर्थ्य वाले को चतुर कहते हैं। एक गोपी कहती है, "हे सखियो ! कृष्ण की चातुरी भरी क्रियाओं को तो देखो। वे नाना गोपगीतों की रचना करके गोधन को आह्लादित कर रहे हैं तथा नेत्रप्रान्तों के संचालन से गोपियों को प्रसन्न और अरिष्ट आदि असुरों को भयभीत कर रहे हैं। इस प्रकार नाना जीवों के साथ नाना प्रकार से वे पूरा आनन्द उठा रहे हैं।" १६. दक्ष कठिन कार्य को भी सरलता से तत्काल कर देने वाला दक्ष है। श्रीकृष्ण की दक्षता के सम्बन्ध में शुकदेवजी श्रीमद्भागवत में परीक्षित से कहते हैं, "हे कुरुश्रेष्ठ ! श्रीकृष्ण ने सब योद्धाओं के नाना अस्त्रों को खण्ड- खण्ड कर दिया।" प्राचीन काल में जब धनुष-बाण से युद्ध होते थे, एक दल बाण चलाता और विपक्ष अन्य बाण से उसका प्रतिकार करके परास्त करता। उदाहरण के लिए, यदि एक दल आकाश से जल की वर्षा करने

१४४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु वाले पर्जन्य-अस्त्र का प्रयोग करता तो दूसरे दल को ऐसा अस्त्र चलाना पड़ता, जिससे जल तत्काल मेघों में परिणत हो जाता । अतएव उपरोक्त वाक्य से प्रकट होता है कि श्रीकृष्ण शत्रु के बाणों का प्रतिकार करने में बड़े ही दक्ष हैं। इसी प्रकार रासलीला में जब प्रत्येक गोपी ने उनसे अपने ही साथ नृत्य करने की प्रार्थना की तो श्रीकृष्ण ने जितनी गोपियों थीं, उतने ही रूप धारण कर लिये । परिणामतः प्रत्येक गोपी ने उन्हें अपने साथ नाचते पाया । १७. कृतज्ञ जो मित्र के उपकार को मानता है और उसकी सेवा को कभी नहीं भूलता, उसे कृतज्ञ कहते हैं। महाभारत में श्रीकृष्ण का उद्गार है, चीरहरण के समय द्रौपदी ने जो दूर होने पर भी मुझे, 'हे गोविन्द !' कहकर पुकारा था, उसका यह ऋण मेरे हृदय से उतर नहीं सकता, निरन्तर बढ़ता ही जाता है ।" श्रीकृष्ण का यह वचन इस बात का प्रमाण है कि केवल 'हे कृष्ण । हे गोविन्द !', ऐसा कहने से उन्हें प्रसन्न किया जा सकता है। महामन्त्र हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे भी श्रीभगवान् और उनकी शक्ति का सम्बोधन है। जब एक बार पुकारने से भी भगवान् चिरऋणी हो जाते हैं तो जो नित्य- निरन्तर भगवान् और उनकी शक्ति का नाम लेता रहता है, उसके वे कितने ऋणी हो जाते हैं—इसकी तो कल्पना भी नहीं की जा सकती । भगवान् उस भक्त को कभी नहीं भूल सकते। श्लोक से स्पष्ट है कि भगवान् को पुकारने वाला तत्काल भगवान् के ध्यान को आकर्षित कर लेता है; वे उसके सदा के ऋणी बन जाते हैं। श्रीकृष्ण की कृतज्ञता का एक अन्य उदाहरण जाम्बवान् से उनके व्यवहार में दृष्टिगोचर होता है। जब वे रामरूप में प्रकट हुए थे तो ऋषराज जाम्बवान् ने उनकी बड़ी ही श्रद्धापूर्वक सेवा की थी। अतः फिर जब वे कृष्णरूप में प्रकट हुए तो उन्होंने जाम्बवान् की कन्या का पाणिग्रहण कर उसका गुरुजनों के सदृश सम्मान किया। साधुजन अपने प्रति किए अल्प उपकार को भी कभी नहीं भूलते; फिर साधुओं की कोटि के मुकुट- मणि श्रीकृष्ण का तो कहना ही क्या है, अर्थात् वे अपने सेवक को कैसे भुला सकते हैं । १८. सुदृढ़व्रत जिसके नियम और प्रतिज्ञा, दोनों सदा सत्य रहें, वह सुदृढ़व्रत है ।

श्रीकृष्ण के दिव्य गुण [ १४५ श्रीकृष्ण के सत्यप्रतिज्ञ होने का उदाहरण हरिवंश में है। इसका सम्बन्ध श्रीकृष्ण और इन्द्र के उस युद्ध से है, जब श्रीकृष्ण ने नन्दनकानन से बलपूर्वक पारिजात का हरण किया था। एक समय सत्यभामा ने पारिजात के पुष्पों की इच्छा की तो श्रीकृष्ण ने वचन दिया कि वे उसे अवश्य लायेंगे। परन्तु इन्द्र ने पारिजात को देना स्वीकार नहीं किया। इस पर घोर युद्ध हुआ। पाण्डवों सहित श्रीकृष्ण एक ओर थे और दूसरी ओर सारे देवता थे। अन्त में श्रीकृष्ण उन सब को हरा कर पारिजात को ले गए तथा रानी सत्यभामा को भेंट किया। इसी घटना के सम्बन्ध में श्रीकृष्ण नारदजी से कहते हैं, “हे देवर्षि नारदजी ! तुम सब भक्तों में और अभक्तों में यह घोषणा कर दो कि पारिजात-हरण में सब देवताओं ने मुझे हराने का प्रयत्न किया, परन्तु अपनी रानी को दिए मेरे वचन को कोई भी असत्य नहीं कर सका। वास्तव में मेरी प्रतिज्ञा को मिथ्या करने में न गन्धर्व समर्थ हो सकते हैं, न राक्षस, न यक्ष, न असुर और न पन्नग ही समर्थ हो सकते हैं।” भगवद्गीता में श्रीकृष्ण की यह प्रतिज्ञा भी है कि उनके भक्त का कभी नाश नहीं होता। अतः निरन्तर भगवत्सेवा में लगे सच्चे भक्त को दृढ़ विश्वास रखना चाहिए कि श्रीकृष्ण अपनी प्रतिज्ञा को कदापि भंग नहीं करेंगे। चाहे जो हो, वे सदा अपने भक्त की रक्षा करेंगे। सत्यभामा को पारिजात भेंट कर, द्रौपदी की लाज बचाकर तथा अर्जुन की सब शत्रुओं से रक्षा करके श्रीकृष्ण ने इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण दिए हैं कि वे सत्यप्रतिज्ञ हैं। गोवर्धनलीला में परास्त हो जाने पर इन्द्र ने भी भगवान् की इस प्रतिज्ञा को सत्य स्वीकार किया है कि उनके भक्त का कदापि नाश नहीं होता। जब श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को इन्द्र की उपासना से रोका तो इन्द्र क्रुद्ध होकर वृन्दावन को मूसलाधार वर्षा से प्लावित करने लगा। परन्तु गोवर्धन पर्वत को छत्र के समान हाथ में उठाकर श्रीकृष्ण ने वृन्दा- वन के सारे वासियों और पशुओं को बचा लिया। इस घटना के बाद इन्द्र उनकी शरण में आकर नाना प्रकार से स्तुति करने लगा। उसने कहा, “गोवर्धन पर्वत को धारण कर ब्रजवासियों की रक्षा करके आपने अपनी इस प्रतिज्ञा को सत्य किया है कि मेरे भक्तों का कभी नाश नहीं होता। १६. देशकालसुपात्रज्ञ श्रीकृष्ण देश, काल, सामग्री और पात्र के अनुसार लोगों से व्यवहार

१४६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु करने में अतिशय कुशल हैं। वे देश, काल और पात्र से किस प्रकार पूर्ण लाभ लेते, इसका एक उदाहरण श्रीमद्भागवत में उद्धव से गोपियों के सम्बन्ध में कहा गया स्वयं उनका एक वाक्य है, “हे सखे ! आज की शारदीय पूर्णिमा की रात्रि जैसा उत्तम समय नहीं हो सकता; त्रिभुवन में वृन्दावन से बढ़कर कोई स्थान नहीं मिल सकता तथा गोपियां अप्रतिम सुन्दरी हैं। इसलिए हे उद्धव ! मेरा मन रासोत्सव के लिए बारम्बार उत्कण्ठित हो रहा है।” २०. शास्त्रचक्षु जो शास्त्र के अनुसार ही सब कर्म करता है, वह शास्त्रचक्षु है, —जो प्रामाणिक शास्त्रों की दृष्टि से देखे। वास्तव में किसी भी ज्ञानी तथा अनुभवी व्यक्ति को सम्पूर्ण तत्त्व इन्हीं ग्रन्थों की दृष्टि से देखना चाहिए। उदाहरण के लिए, साधारण नेत्रों से देखने पर सूर्यमण्डल केवल एक छोटा सा देदीप्यमान् पिण्ड प्रतीत होता है; परन्तु प्रामाणिक वैज्ञानिक पुस्तकों की दृष्टि से ज्ञात होता है कि सूर्य इस पृथ्वी से अनेक गुणा बड़ा और शक्तिशाली है। अतः चर्म-चक्षुओं से देखना यथार्थ देखना नहीं है। प्रामाणिक पुस्तक अथवा प्रामाणिक शिक्षक के माध्यम से देखना ही यथार्थ देखना है। इसलिए यद्यपि श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् हैं और भूत, वर्तमान् और भविष्य को पूर्ण रूप से जानते हैं, फिर भी लोकशिक्षा के हेतु वे सदा शास्त्र का आश्रय लेते हैं। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने जो कुछ कहा है, वह अधिकारी के रूप में कहा है। फिर भी उन्होंने वेदान्तसूत्र का प्रमाण दिया। श्रीमद्भागवत में किसी का परिहास है कि कंस के शत्रु श्रीकृष्ण को शास्त्रचक्षु कहा जाता है। परन्तु अपनी प्रामाणिकता को स्थापित करने के लिए वे गोपियों को ही देख रहे हैं, जिससे उन गोपियों को उन्माद हो चला है। २१. शुचि शुचिता दो प्रकार की होती है। एक अपनी शुचिता से दूसरों के पाप का नाश करके उन्हें शुद्ध बना देना और दूसरा प्रकार स्वयं पापों से रहित होना। इनमें से किसी भी कोटि का शुचि व्यक्ति पावन कहा जाता है। श्रीकृष्ण में ये दोनों गुण हैं। वे सारे पापात्मा बद्ध जीवों का उद्धार कर सकते हैं और साथ ही स्वयं कभी कोई पापकर्म नहीं करते ।

श्रीकृष्ण के दिव्य गुण [ १४७ इस सन्दर्भ में धृतराष्ट्र को परिवार की आसक्ति से निवृत्त करने के लिए प्रयत्न करते हुए विदुर का वाक्य है, "हे अग्रज ! ऋषि-मुनि उत्तम श्लोकों में जिनकी धवल कीर्ति का गान करते हैं, उन पावनों के भी पावन भगवान् श्रीकृष्ण के चरणकमलों में ही अपने मन को एकाग्र करो। निःसन्देह शिव, ब्रह्मा, आदि बहुत से देवता हैं, परन्तु उनकी पावनता नित्य श्रीकृष्ण की कृपा पर ही निर्भर है।" विदुर ने धृतराष्ट्र को परामर्श दिया कि वह एकाग्रचित्त से केवल श्रीकृष्ण की आराधना करे। यदि कोई पावन कृष्णनाम का जप करे तो यह नामरूपी देदीप्यमान् सूर्य हृदय में उदित होकर तत्काल सम्पूर्ण पापरूप अंधकार को दूर कर देगा। अतः विदुर ने धृतराष्ट्र से निरन्तर कृष्ण का ही चिन्तन करने को कहा, जिससे पापपुंज तत्क्षण भस्म हो जाये। भगवद्गीता में अर्जुन भी श्रीकृष्ण को परं ब्रह्म परं धाम पवित्रम्—परम पवित्र कहता है। श्रीकृष्ण की परम पावनता के और भी अनेक उदाहरण उपलब्ध हैं। २२. वशी जिसने अपनी इन्द्रियों को जीत लिया है, उसे वशी, अर्थात् जिते- न्द्रिय कहा जाता है। श्रीमद्भागवत में उल्लेख है, "श्रीकृष्ण की सभी १६००० स्त्रियाँ इतनी अनिन्द्य सुन्दरी थीं कि उनके उद्दाम भाव, मनोहर हास और लज्जा को देखकर शिव आदि देवों का मन भी मोहित हो जाता था। परन्तु अपने इस कमनीय हाव-भाव से भी वे श्रीकृष्ण के चित्त को तनिक भी विचलित नहीं कर सकीं।" श्रीकृष्ण की १६००० स्त्रियों में से प्रत्येक यही समझती थी कि वे उसकी कमनीयता पर मुग्ध हैं; पर वास्तव में ऐसा न था। अतः श्रीकृष्ण सर्वोत्तम जितेन्द्रिय हैं और यह भगवद्गीता में भी स्वीकृत है; वहाँ उन्हें हृषिकेश—इन्द्रियों का स्वामी कहा गया है। २३. स्थिर जो अभीष्ट फल की प्राप्ति होने तक निरन्तर कार्यशील रहता है, वह स्थिर है। स्यमन्तमणि को खोजते समय श्रीकृष्ण न तो वन में घुसने से घबराए और न ऋक्षराज जाम्बवान् के स्थान में घुसने के भय से उन्हें चिन्ता हुई। वरन् स्थिरतापूर्वक मणि को प्राप्त करके की द्वारका को लौटे। २४. दान्त जो पुरुष उचित होने पर दुःसह कष्ट को भी सहन कर लेता है, वह दान्त है।

१४८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु जिस समय श्रीकृष्ण गुरुकुल में निवास कर रहे थे, तो कोमलांग होते हुए उन्होंने गुरुसेवा में होने वाले क्लेश को सहर्ष सहन किया । शिष्य का कर्तव्य है कि कष्टों को गिने बिना निश्छल भाव के साथ सब प्रकार से गुरु की सेवा करे । गुरुकुल में रहते हुए शिष्य को द्वार-द्वार से भिक्षा करके गुरु को समर्पित करनी होती है । प्रसाद ग्रहण के समय गुरु एक-एक शिष्य को पुकारते हैं । यदि किसी कारणवश वे किसी शिष्य को प्रसाद के लिए बुलाना भूल जायें तो शास्त्रों में विधान है कि अपने-आप भोजन करने के स्थान पर उस दिन उपवास ही करना चाहिए । ऐसे बहुत से विधान हैं । श्रीकृष्ण कभी-कभी वन में ईंधन लाने भी जाते थे । २५. क्षमाशील जो अपने विरोधी के सब अपराधों को सहन करता है, वह क्षमा- शील कहलाता है । भगवान् श्रीकृष्ण की क्षमा का वर्णन महाभारत में है, जब उन्होंने शिशुपाल का वध किया था । शिशुपाल चेदि का राजा था । श्रीकृष्ण का मौसेरा भाई होते हुए भी वह उनसे सदा द्वेष करता रहता । जब भी वे मिलते, शिशुपाल श्रीकृष्ण का अपमान करता और यथाशक्ति अपशब्द कहता । महाराज युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में भी उसने ऐसा ही किया; परन्तु श्रीकृष्ण ने उपेक्षापूर्वक उसे कोई उत्तर नहीं दिया । वहाँ उपस्थित कुछ लोग शिशुपाल का वध करने को उद्यत हुए तो भी श्रीकृष्ण ने उनका भी निषेध कर दिया । वे स्वभाव से ही क्षमाशील थे । प्रसिद्ध है कि सिंह मेघ की गर्जना को सुनकर हुंकार करता है, मूर्ख शृंगालों के शब्द को सुनकर नहीं । श्रीयामुनाचार्य श्रीकृष्ण की क्षमाशीलता की स्तुति करते हुए कहते हैं, "हे रघुवर ! शरणागत समझ कर आप जानकी के चरण में चोंच मारने वाले उस काक के प्रति भी दयालु बन गए ।" एक समय देवराज इन्द्र ने काक रूप में भगवान् राम की अर्धांगिनी जानकी के चरण में घाव कर दिया । जगन्माता सीता के इस अपमान को देखकर श्रीराम तत्काल उस उद्धत काक का वध करने को उद्यत हो गए । परन्तु वह त्राहि-त्राहि करता हुआ उनके चरणों में गिर पड़ा; अतः भगवान् ने उसे क्षमादान दिया । श्रीयामुना- चार्य आगे कहते हैं कि श्रीकृष्ण की क्षमाशीलता भगवान् राम से भी विशेष है । शिशुपाल तीन जन्मों से लगातार उनका अपमान कर रहा था; फिर भी श्रीकृष्ण इतने क्षमाशील हैं कि उन्हें शिशुपाल को सायुज्य