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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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पृष्ठ 173

१४६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु करने में अतिशय कुशल हैं। वे देश, काल और पात्र से किस प्रकार पूर्ण लाभ लेते, इसका एक उदाहरण श्रीमद्भागवत में उद्धव से गोपियों के सम्बन्ध में कहा गया स्वयं उनका एक वाक्य है, “हे सखे ! आज की शारदीय पूर्णिमा की रात्रि जैसा उत्तम समय नहीं हो सकता; त्रिभुवन में वृन्दावन से बढ़कर कोई स्थान नहीं मिल सकता तथा गोपियां अप्रतिम सुन्दरी हैं। इसलिए हे उद्धव ! मेरा मन रासोत्सव के लिए बारम्बार उत्कण्ठित हो रहा है।” २०. शास्त्रचक्षु जो शास्त्र के अनुसार ही सब कर्म करता है, वह शास्त्रचक्षु है, —जो प्रामाणिक शास्त्रों की दृष्टि से देखे। वास्तव में किसी भी ज्ञानी तथा अनुभवी व्यक्ति को सम्पूर्ण तत्त्व इन्हीं ग्रन्थों की दृष्टि से देखना चाहिए। उदाहरण के लिए, साधारण नेत्रों से देखने पर सूर्यमण्डल केवल एक छोटा सा देदीप्यमान् पिण्ड प्रतीत होता है; परन्तु प्रामाणिक वैज्ञानिक पुस्तकों की दृष्टि से ज्ञात होता है कि सूर्य इस पृथ्वी से अनेक गुणा बड़ा और शक्तिशाली है। अतः चर्म-चक्षुओं से देखना यथार्थ देखना नहीं है। प्रामाणिक पुस्तक अथवा प्रामाणिक शिक्षक के माध्यम से देखना ही यथार्थ देखना है। इसलिए यद्यपि श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् हैं और भूत, वर्तमान् और भविष्य को पूर्ण रूप से जानते हैं, फिर भी लोकशिक्षा के हेतु वे सदा शास्त्र का आश्रय लेते हैं। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने जो कुछ कहा है, वह अधिकारी के रूप में कहा है। फिर भी उन्होंने वेदान्तसूत्र का प्रमाण दिया। श्रीमद्भागवत में किसी का परिहास है कि कंस के शत्रु श्रीकृष्ण को शास्त्रचक्षु कहा जाता है। परन्तु अपनी प्रामाणिकता को स्थापित करने के लिए वे गोपियों को ही देख रहे हैं, जिससे उन गोपियों को उन्माद हो चला है। २१. शुचि शुचिता दो प्रकार की होती है। एक अपनी शुचिता से दूसरों के पाप का नाश करके उन्हें शुद्ध बना देना और दूसरा प्रकार स्वयं पापों से रहित होना। इनमें से किसी भी कोटि का शुचि व्यक्ति पावन कहा जाता है। श्रीकृष्ण में ये दोनों गुण हैं। वे सारे पापात्मा बद्ध जीवों का उद्धार कर सकते हैं और साथ ही स्वयं कभी कोई पापकर्म नहीं करते ।