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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 172, कुल 380 में से

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पृष्ठ 172

श्रीकृष्ण के दिव्य गुण [ १४५ श्रीकृष्ण के सत्यप्रतिज्ञ होने का उदाहरण हरिवंश में है। इसका सम्बन्ध श्रीकृष्ण और इन्द्र के उस युद्ध से है, जब श्रीकृष्ण ने नन्दनकानन से बलपूर्वक पारिजात का हरण किया था। एक समय सत्यभामा ने पारिजात के पुष्पों की इच्छा की तो श्रीकृष्ण ने वचन दिया कि वे उसे अवश्य लायेंगे। परन्तु इन्द्र ने पारिजात को देना स्वीकार नहीं किया। इस पर घोर युद्ध हुआ। पाण्डवों सहित श्रीकृष्ण एक ओर थे और दूसरी ओर सारे देवता थे। अन्त में श्रीकृष्ण उन सब को हरा कर पारिजात को ले गए तथा रानी सत्यभामा को भेंट किया। इसी घटना के सम्बन्ध में श्रीकृष्ण नारदजी से कहते हैं, “हे देवर्षि नारदजी ! तुम सब भक्तों में और अभक्तों में यह घोषणा कर दो कि पारिजात-हरण में सब देवताओं ने मुझे हराने का प्रयत्न किया, परन्तु अपनी रानी को दिए मेरे वचन को कोई भी असत्य नहीं कर सका। वास्तव में मेरी प्रतिज्ञा को मिथ्या करने में न गन्धर्व समर्थ हो सकते हैं, न राक्षस, न यक्ष, न असुर और न पन्नग ही समर्थ हो सकते हैं।” भगवद्गीता में श्रीकृष्ण की यह प्रतिज्ञा भी है कि उनके भक्त का कभी नाश नहीं होता। अतः निरन्तर भगवत्सेवा में लगे सच्चे भक्त को दृढ़ विश्वास रखना चाहिए कि श्रीकृष्ण अपनी प्रतिज्ञा को कदापि भंग नहीं करेंगे। चाहे जो हो, वे सदा अपने भक्त की रक्षा करेंगे। सत्यभामा को पारिजात भेंट कर, द्रौपदी की लाज बचाकर तथा अर्जुन की सब शत्रुओं से रक्षा करके श्रीकृष्ण ने इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण दिए हैं कि वे सत्यप्रतिज्ञ हैं। गोवर्धनलीला में परास्त हो जाने पर इन्द्र ने भी भगवान् की इस प्रतिज्ञा को सत्य स्वीकार किया है कि उनके भक्त का कदापि नाश नहीं होता। जब श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को इन्द्र की उपासना से रोका तो इन्द्र क्रुद्ध होकर वृन्दावन को मूसलाधार वर्षा से प्लावित करने लगा। परन्तु गोवर्धन पर्वत को छत्र के समान हाथ में उठाकर श्रीकृष्ण ने वृन्दा- वन के सारे वासियों और पशुओं को बचा लिया। इस घटना के बाद इन्द्र उनकी शरण में आकर नाना प्रकार से स्तुति करने लगा। उसने कहा, “गोवर्धन पर्वत को धारण कर ब्रजवासियों की रक्षा करके आपने अपनी इस प्रतिज्ञा को सत्य किया है कि मेरे भक्तों का कभी नाश नहीं होता। १६. देशकालसुपात्रज्ञ श्रीकृष्ण देश, काल, सामग्री और पात्र के अनुसार लोगों से व्यवहार