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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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१४४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु वाले पर्जन्य-अस्त्र का प्रयोग करता तो दूसरे दल को ऐसा अस्त्र चलाना पड़ता, जिससे जल तत्काल मेघों में परिणत हो जाता । अतएव उपरोक्त वाक्य से प्रकट होता है कि श्रीकृष्ण शत्रु के बाणों का प्रतिकार करने में बड़े ही दक्ष हैं। इसी प्रकार रासलीला में जब प्रत्येक गोपी ने उनसे अपने ही साथ नृत्य करने की प्रार्थना की तो श्रीकृष्ण ने जितनी गोपियों थीं, उतने ही रूप धारण कर लिये । परिणामतः प्रत्येक गोपी ने उन्हें अपने साथ नाचते पाया । १७. कृतज्ञ जो मित्र के उपकार को मानता है और उसकी सेवा को कभी नहीं भूलता, उसे कृतज्ञ कहते हैं। महाभारत में श्रीकृष्ण का उद्गार है, चीरहरण के समय द्रौपदी ने जो दूर होने पर भी मुझे, 'हे गोविन्द !' कहकर पुकारा था, उसका यह ऋण मेरे हृदय से उतर नहीं सकता, निरन्तर बढ़ता ही जाता है ।" श्रीकृष्ण का यह वचन इस बात का प्रमाण है कि केवल 'हे कृष्ण । हे गोविन्द !', ऐसा कहने से उन्हें प्रसन्न किया जा सकता है। महामन्त्र हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे भी श्रीभगवान् और उनकी शक्ति का सम्बोधन है। जब एक बार पुकारने से भी भगवान् चिरऋणी हो जाते हैं तो जो नित्य- निरन्तर भगवान् और उनकी शक्ति का नाम लेता रहता है, उसके वे कितने ऋणी हो जाते हैं—इसकी तो कल्पना भी नहीं की जा सकती । भगवान् उस भक्त को कभी नहीं भूल सकते। श्लोक से स्पष्ट है कि भगवान् को पुकारने वाला तत्काल भगवान् के ध्यान को आकर्षित कर लेता है; वे उसके सदा के ऋणी बन जाते हैं। श्रीकृष्ण की कृतज्ञता का एक अन्य उदाहरण जाम्बवान् से उनके व्यवहार में दृष्टिगोचर होता है। जब वे रामरूप में प्रकट हुए थे तो ऋषराज जाम्बवान् ने उनकी बड़ी ही श्रद्धापूर्वक सेवा की थी। अतः फिर जब वे कृष्णरूप में प्रकट हुए तो उन्होंने जाम्बवान् की कन्या का पाणिग्रहण कर उसका गुरुजनों के सदृश सम्मान किया। साधुजन अपने प्रति किए अल्प उपकार को भी कभी नहीं भूलते; फिर साधुओं की कोटि के मुकुट- मणि श्रीकृष्ण का तो कहना ही क्या है, अर्थात् वे अपने सेवक को कैसे भुला सकते हैं । १८. सुदृढ़व्रत जिसके नियम और प्रतिज्ञा, दोनों सदा सत्य रहें, वह सुदृढ़व्रत है ।