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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 174, कुल 380 में से

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पृष्ठ 174

श्रीकृष्ण के दिव्य गुण [ १४७ इस सन्दर्भ में धृतराष्ट्र को परिवार की आसक्ति से निवृत्त करने के लिए प्रयत्न करते हुए विदुर का वाक्य है, "हे अग्रज ! ऋषि-मुनि उत्तम श्लोकों में जिनकी धवल कीर्ति का गान करते हैं, उन पावनों के भी पावन भगवान् श्रीकृष्ण के चरणकमलों में ही अपने मन को एकाग्र करो। निःसन्देह शिव, ब्रह्मा, आदि बहुत से देवता हैं, परन्तु उनकी पावनता नित्य श्रीकृष्ण की कृपा पर ही निर्भर है।" विदुर ने धृतराष्ट्र को परामर्श दिया कि वह एकाग्रचित्त से केवल श्रीकृष्ण की आराधना करे। यदि कोई पावन कृष्णनाम का जप करे तो यह नामरूपी देदीप्यमान् सूर्य हृदय में उदित होकर तत्काल सम्पूर्ण पापरूप अंधकार को दूर कर देगा। अतः विदुर ने धृतराष्ट्र से निरन्तर कृष्ण का ही चिन्तन करने को कहा, जिससे पापपुंज तत्क्षण भस्म हो जाये। भगवद्गीता में अर्जुन भी श्रीकृष्ण को परं ब्रह्म परं धाम पवित्रम्—परम पवित्र कहता है। श्रीकृष्ण की परम पावनता के और भी अनेक उदाहरण उपलब्ध हैं। २२. वशी जिसने अपनी इन्द्रियों को जीत लिया है, उसे वशी, अर्थात् जिते- न्द्रिय कहा जाता है। श्रीमद्भागवत में उल्लेख है, "श्रीकृष्ण की सभी १६००० स्त्रियाँ इतनी अनिन्द्य सुन्दरी थीं कि उनके उद्दाम भाव, मनोहर हास और लज्जा को देखकर शिव आदि देवों का मन भी मोहित हो जाता था। परन्तु अपने इस कमनीय हाव-भाव से भी वे श्रीकृष्ण के चित्त को तनिक भी विचलित नहीं कर सकीं।" श्रीकृष्ण की १६००० स्त्रियों में से प्रत्येक यही समझती थी कि वे उसकी कमनीयता पर मुग्ध हैं; पर वास्तव में ऐसा न था। अतः श्रीकृष्ण सर्वोत्तम जितेन्द्रिय हैं और यह भगवद्गीता में भी स्वीकृत है; वहाँ उन्हें हृषिकेश—इन्द्रियों का स्वामी कहा गया है। २३. स्थिर जो अभीष्ट फल की प्राप्ति होने तक निरन्तर कार्यशील रहता है, वह स्थिर है। स्यमन्तमणि को खोजते समय श्रीकृष्ण न तो वन में घुसने से घबराए और न ऋक्षराज जाम्बवान् के स्थान में घुसने के भय से उन्हें चिन्ता हुई। वरन् स्थिरतापूर्वक मणि को प्राप्त करके की द्वारका को लौटे। २४. दान्त जो पुरुष उचित होने पर दुःसह कष्ट को भी सहन कर लेता है, वह दान्त है।

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