भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु जिस समय श्रीकृष्ण गुरुकुल में निवास कर रहे थे, तो कोमलांग होते हुए उन्होंने गुरुसेवा में होने वाले क्लेश को सहर्ष सहन किया । शिष्य का कर्तव्य है कि कष्टों को गिने बिना निश्छल भाव के साथ सब प्रकार से गुरु की सेवा करे । गुरुकुल में रहते हुए शिष्य को द्वार-द्वार से भिक्षा करके गुरु को समर्पित करनी होती है । प्रसाद ग्रहण के समय गुरु एक-एक शिष्य को पुकारते हैं । यदि किसी कारणवश वे किसी शिष्य को प्रसाद के लिए बुलाना भूल जायें तो शास्त्रों में विधान है कि अपने-आप भोजन करने के स्थान पर उस दिन उपवास ही करना चाहिए । ऐसे बहुत से विधान हैं । श्रीकृष्ण कभी-कभी वन में ईंधन लाने भी जाते थे । २५. क्षमाशील जो अपने विरोधी के सब अपराधों को सहन करता है, वह क्षमा- शील कहलाता है । भगवान् श्रीकृष्ण की क्षमा का वर्णन महाभारत में है, जब उन्होंने शिशुपाल का वध किया था । शिशुपाल चेदि का राजा था । श्रीकृष्ण का मौसेरा भाई होते हुए भी वह उनसे सदा द्वेष करता रहता । जब भी वे मिलते, शिशुपाल श्रीकृष्ण का अपमान करता और यथाशक्ति अपशब्द कहता । महाराज युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में भी उसने ऐसा ही किया; परन्तु श्रीकृष्ण ने उपेक्षापूर्वक उसे कोई उत्तर नहीं दिया । वहाँ उपस्थित कुछ लोग शिशुपाल का वध करने को उद्यत हुए तो भी श्रीकृष्ण ने उनका भी निषेध कर दिया । वे स्वभाव से ही क्षमाशील थे । प्रसिद्ध है कि सिंह मेघ की गर्जना को सुनकर हुंकार करता है, मूर्ख शृंगालों के शब्द को सुनकर नहीं । श्रीयामुनाचार्य श्रीकृष्ण की क्षमाशीलता की स्तुति करते हुए कहते हैं, "हे रघुवर ! शरणागत समझ कर आप जानकी के चरण में चोंच मारने वाले उस काक के प्रति भी दयालु बन गए ।" एक समय देवराज इन्द्र ने काक रूप में भगवान् राम की अर्धांगिनी जानकी के चरण में घाव कर दिया । जगन्माता सीता के इस अपमान को देखकर श्रीराम तत्काल उस उद्धत काक का वध करने को उद्यत हो गए । परन्तु वह त्राहि-त्राहि करता हुआ उनके चरणों में गिर पड़ा; अतः भगवान् ने उसे क्षमादान दिया । श्रीयामुना- चार्य आगे कहते हैं कि श्रीकृष्ण की क्षमाशीलता भगवान् राम से भी विशेष है । शिशुपाल तीन जन्मों से लगातार उनका अपमान कर रहा था; फिर भी श्रीकृष्ण इतने क्षमाशील हैं कि उन्हें शिशुपाल को सायुज्य